Thursday, April 1, 2010

बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे


बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे
नए हैं तेवर और नए ही रंग हैं मेरे

शुद्ध भाषा के शीशमहल में न रख सकोगे कैद मुझे
मैं तुम्हे आगाह कर देता हूँ कि संग संग हैं मेरे

ये तेरी-मेरी भाषा का साम्प्रदायिक तर्क तर्क दो
जैसे सुंदर हैं तुम्हारे वैसे ही सुंदर अंग हैं मेरे

कहीं संकीर्णता का जंग खोखला न कर दे साहित्य को
इसलिए हर महफ़िल में छिड़ते हैं हर रोज़ जंग मेरे

संस्कृत से है माँ का रिश्ता और उर्दू बहन है मेरी
खिलाती-पिलाती है अंग्रेज़ी और बॉस फ़िरंग हैं मेरे

माँ-बहन को एक करना चाहता है 'राहुल'
नासमझ समझेंगे कि ये नए हुड़दंग हैं मेरे

सिएटल । 425-445-0827
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संग (उर्दू) - stone; संग (हिंदी) - with
तर्क (उर्दू) - abandon; तर्क (हिंदी) - arguments
जंग (उर्दू) - war; जंग (हिंदी) - rust

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world of poetry


2 comments:

Jandunia said...

बहुत सुंदर रचना। पसंद आई।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

अच्छी रचना