Monday, April 26, 2010

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए
इक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैं

हमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगा
रोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैं

कहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिन
और हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैं

पीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती संभाले
रोज-रोज नए मॉडल का इंतज़ार करते हैं

हर गलती में हमारा भी कुछ हाथ होगा
इस सम्भावना से हम कहाँ इंकार करते हैं

चलो अच्छा ही हुआ हमने सच सुन लिया
वरना हम तो समझते थे कि हम तुमसे प्यार करते हैं

सिएटल । 425-445-0827
26 अप्रैल 2010
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अलार्म = alarm; मॉडल = model;

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5 comments:

rajeevspoetry said...

कहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिन
और हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैं

Achcha hai.

Udan Tashtari said...

हाय!! क्या याद दिला दिया आपने!! धूप में दाढ़ी बनाये तो अरसा बीता. :)

दिलीप said...

waah sirji bahut khoob

मनोज कुमार said...

वाह! मज़ा आ गया! सिर्फ़ याद करके .. वो भी दिन क्या थे, खटिया पर आंगन में बैठ कर धूप में बनाते थे दाढ़ी। और ये शे’र .. क्या गूढ़ अर्थ है
कहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिन
और हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैं

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत बढ़िया है ...
हमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगा
रोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैं
क्या बात है !