Monday, April 5, 2010

मैंने मोहब्बत की है

मैंने मोहब्बत की है और अनेकों से की है
जिसकी सज़ा मुझे बरोबर मिली है

कहता था मैं महबूब जिनको
पाता हूँ आज मैं दूर उनको

ऐसा नहीं कि मोहब्बत में कमी थी
बस फ़क़त एक की वो जागीर नहीं थी

दुनिया को मोहब्बत से भली रंजिश लगी है
इसीलिए तो हो एक से ऐसी बंदिश नहीं है

झूठ कहती है दुनिया कि मोहब्बत निभाओ
नियम तो यह है कि जिसे ब्याहो, बस उसे ही चाहो

दिल दिया कुदरत न मुझको
फिर नियम क्यूँ इंसां के मानूँ?
कब कहाँ बैठे उठे ये
किताब पढ़ कर क्यूँ ये जानूँ?

झूठी दुनिया
झूठे लोग
इनके रोके
कब रूका ये रोग

इश्क़ हुआ है
और इश्क़ होगा
एक नहीं
कई बार होगा

सिएटल । 425-445-0827
5 अप्रैल 2010

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3 comments:

Shekhar kumawat said...

wakay me sahi he

pyar usi se jis se sadi ho


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

Suman said...

nice

sanjay singh said...

sir,
ur words are so simple n so divine.great.pyar kia nahi jata ho jata hai.