Monday, July 18, 2011

तुम सोचती होगी

तुम सोचती होगी
कि मेरा बुखार उतर गया होगा
तुम्हारा सोचना वाजिब भी है
पिछले आठ महीनों से मैंने तुम्हें फोन जो नहीं किया
और ना ही जन्मदिन की बधाई दी
या नव-वर्ष की

लेकिन
शायद तुम यह नहीं जानती
कि जब दर्द हद से गुज़र जाता है
तो दर्द ही दवा बन जाता है

अब मुझे
न तुम्हारी
न तुम्हारी आवाज़ की
न तुम्हारी तस्वीर की
किसी की भी ज़रूरत नहीं है

अब मैं हूँ तुम
और तुम हो मैं

सुबह से लेकर शाम तक
शाम से लेकर सुबह तक
तुम
हर पल
मेरे साथ हो

हाँ, बाबा, हाँ
सच, और पूरा सच
देखो,
तुम्हारा अहसास
कोई नाक पे रखा चश्मा तो है नहीं
कि रात को सोते वक़्त उसे उतार के रख दूँ!

और हाँ
मैं तुम्हें भूला नहीं
और न ही भूला सकता हूँ
लेकिन गाहे-बगाहे फिर भी याद ज़रूर कर लेता हूँ
उस बुद्धू की तरह
जो चश्मा पहने हुए है
फिर भी चश्मा ढूँढता रहता है

18 जुलाई 2011
सिएटल

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9 comments:

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

जो चश्मा पहने हुए है और फिर भी उसे ढूंढते है...और नाक पर रखा चश्मा तो नहीं है जो रात को सोते वक्त उतार दूँ..... ये दोनों उदाहरण बहुत जंचे. हमारे आस पास की छोटी छोटी चीजों कई बार बड़ी बातें सीखने को मिल जाती है.

shephali said...

dil ko chu jaane wali rachna

badhai

प्रवीण कुमार दुबे said...

जो चश्मा पहने हुए है और फिर भी उसे ढूंढते है.....wahhhhhhhhhhhhh

Rahul said...

Very nice style of writing Rahul Ji, aaj hi apke blog pe aana hua.

Neerja said...

कभी कभी एक बार नहीं ,बहुत बार ऐसी रचना को रूह से महसूस करना पड़ता है ,कहीं यह मेरी .....

Vaanbhatt said...

दिल बहल तो जायेगा इस ख्याल से...
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से...

अगले के फोटो-वोटो से भला क्या सरोकार...

Anonymous said...

गहरी रचना। दिल को छू जाने वाली...
ऐसा लगता है मानो मेरे किसी अपने ने लिखा है नाम बदल कर

ranjana said...

tumhara ahsas koi naak pe rakha chasma to nahi ki rat ko sote waqt use utar ke rakh du...bahot acchi dil ko chu lenewli rachana

Prarthana gupta said...

bahut sundar abhwaykti!!!!!!!