Tuesday, January 6, 2009

आग

मॉल में माल का

अम्बार लगा है

हर ज़रुरत का

बाज़ार लगा है

चारों ओर कमी

किसी बात की नहीं

है सब कुछ यहाँ

मगर शांति नहीं

 

मैं हूँ यहाँ

मेरा दिल है कहीं

मैं खुश रह सकूँ

ऐसी 'पिल' है कहीं?

शायद नहीं, मगर

आत्मा मानती नहीं

दर दर की खाक

वरना छानती नहीं

 

दिल हो कहीं

और दिमाग हो कहीं

जैसे सुर हो कहीं

और साज़ हो कहीं

ऐसी सरगम

किसी काम की नहीं

शाश्वत सत्य है ये

इसमें भ्रांति नहीं


जानवर और इंसां में है

आग का फ़र्क

सालों से सुना है

यही एक तर्क

कि आग न होती तो

खिचड़ी पकती नहीं

दुनिया में बसती

एक भी बस्ती नहीं

 

चाहे मानो सच इसे

चाहे मानो झूठ

आग और राख का है

रिश्ता अटूट

ऐसी कोई हस्ती नहीं

जिसपे ये हँसती नहीं

ऐसी कोई शह नहीं

जो राख बनती नहीं

 

सभ्यता जन्मी थी

जब आग थी मिली

या वैमनस्य की

नई राह थी मिली?

आग न होती तो

होती क्रांति नहीं

मन होता शांत

होती क्लांति नहीं

 

सिएटल,

6 जनवरी 2008

============

मॉल = mall

पिल = pill

इंसां = इंसान

वैमनस्य = दुश्मनी

क्लांति = थकावट

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4 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक साथ इतना कुछ कह गए। सच। बहुत खूब।

COMMON MAN said...

बहुत अच्छे राहुल भैया.गागर में सागर

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

सभ्यता जन्मी थी

जब आग थी मिली

या वैमनस्य की

नई राह थी मिली?

राहुल जी सच कहा आपने....आपकी सोच की इस दिशा से कुछ हमें भी अलग सा मगर अच्छा सा महसूस हुआ......!!

महेंद्र मिश्रा said...

आग न होती तो
होती क्रांति नहीं
मन होता शांत
होती क्लांति नहीं

बहुत बढ़िया भावपूर्ण रचना . आभार