खिलते हैं फूल
बिखेरते हैं रंग
गाँव-गाँव
गली-गली
उड़ती है पतंग
इसके होते ही शुरू
होता है शरद का अंत
इस पर लिख कर गए
कवि निराला और पंत
मंदबुद्धि मैं
और आप अकलमंद
आप ही सुलझाए
मेरे मन का ये द्वंद
बस के पीछे तो होता है
बस काला धुआँ
फिर इसका नामकरण
क्यों ऐसा हुआ?
व और ब में कभी होता होगा फ़र्क
आज तो भाषा का पूरा बेड़ा है गर्क
गंगा को गङ्गा को लिखने वाले बचे हैं कम
ङ और ञ को कर गई बिंदी हजम
हिंदी और हिंदीभाषी का होगा शीघ्र ही अंत
ऐसी घोषणा कर रहे हैं ज्ञानी-ध्यानी-महंत
ब-नाम से हम-तुम आज पहचानते जिसे
बोलो क्या कहते थे ॠषि व संत उसे?
सिएटल,
28 जनवरी 2009
=========================
इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।
मदद के लिए यहाँ क्लिक करें -
http://mere--words.blogspot.com/2008/02/1.html
Wednesday, January 28, 2009
पहेली 28
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:02 PM
आपका क्या कहना है??
6 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

6 comments:
बसतं.............
ब-नाम से हम-तुम आज पहचानते जिसे
बोलो क्या कहते थे ॠषि व संत उसे?
"बसतं"
regards
बसंत.....
बहुत सुन्दर
rajeev ji vasant ho ya ho vasant man me phool khilne chahiye bas ....ant
बसतं.............
Post a Comment