Tuesday, November 15, 2016

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ



किसी की आँख का नूर हूँ
किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम सके

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ


मेरा रंग-रूप बिगड़ गया

मेरा गाँधी मुझसे बिछड़ गया

जो तिजोरी में रह सड़ गया

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ


मुझे बटुए में ले के जाए क्यूँ 

मुझे उधार ले के जाए क्यूँ 

जिसे उठाईगिरे भी उठाए ना

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ


कभी 'छुट्टा नहीं' सुन के ख़ुश था

आज छुट्टी हुई तो हताश हूँ

जिसकी औक़ात सामने गई

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ


मेरा मान-मूल्य जो भी था

उसका दारोमदार कोई और था

इक हवा चली और जो ध्वस्त था

मैं वो एक रूपया हज़ार हूँ


(मुज़्तर ख़ैराबादी से क्षमायाचना सहित)

15 नवम्बर 2016

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems 


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1 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.11.2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2529 में दिया जाएगा
धन्यवाद