Friday, August 28, 2026

बेर

मैं बेर तोड़ने गया था

मित्र हाथ आ गया 


वह अजनबी था

मैंने बेर तोड़ना सिखाया 

वह मित्र बन गया 



आज कुछ 

मीठी 

रसीली

नरम

ब्लैक बेरियाँ

काँटों से छुड़ाई 

उन्हें उनके चंगुल से

आज़ाद किया 


यह अलग बात है कि 

अब मैं उन्हें अपने 

अंग लगाऊँगा 


अपने शरीर का

ख़ून बढ़ाऊँगा 

उन्हें 

खा जाऊँगा


अक्सर 

आज़ादी की क़ीमत

ऐसे ही चुकाई जाती है 


राहुल उपाध्याय । 28 अगस्त 2026 । सिएटल 






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