हैं ग़ालिब यहाँ
कि हैं ग़ालिब वहाँ
किसको पता
हैं ग़ालिब कहाँ
लिखने लगो
तो लिखते रहो
समझे ने समझे
कोई तेरी ज़ुबाँ
ये ज़मीं बँट गई
आसमाँ बँट गया
कितने खेमों में
बँट गया जहाँ
है बंजर कहीं
कहीं मंज़र नया
ज़मीं पे छाया
ये कैसा समाँ
आँसू भी कहाँ
हैं अपने मेरे
ये भी अपनों ने
दिए हैं हाँ
राहुल उपाध्याय । 22 अक्टूबर 2026 । सिएटल

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