Thursday, October 22, 2026

हैं ग़ालिब कहाँ

हैं ग़ालिब यहाँ 

कि हैं ग़ालिब वहाँ 

किसको पता 

हैं ग़ालिब कहाँ 


लिखने लगो 

तो लिखते रहो 

समझे ने समझे 

कोई तेरी ज़ुबाँ


ये ज़मीं बँट गई 

आसमाँ बँट गया 

कितने खेमों में 

बँट गया जहाँ 


है बंजर कहीं 

कहीं मंज़र नया

ज़मीं पे छाया 

ये कैसा समाँ 


आँसू भी कहाँ 

हैं अपने मेरे

ये भी अपनों ने

दिए हैं हाँ 


राहुल उपाध्याय । 22 अक्टूबर 2026 । सिएटल 


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