Wednesday, September 16, 2020

अमरत्व

मुझे 

अहसास है 

अपने अमरत्व का

इसीलिए 

तुमसे 

करता हूँ बातें

देता हूँ सदाएँ 


इस ब्रह्माण्ड में

सब कुछ

परिवर्तित होता है

विलीन नहीं


राहुल उपाध्याय । 16 सितम्बर 2020 । सिएटल 


Sunday, September 13, 2020

एक मंत्री को देखा तो ऐसा लगा

एक मंत्री को देखा तो ऐसा लगा, 

जैसे चढ़ता बुख़ार, 

जैसे डरता बीमार, 

जैसे कल की दाल, 

जैसे ठरकी साँड़, 

जैसे चुभती फाँस, 

जैसे बुझता चिराग़, 

जैसे दंगल में हो कोई खोजता ज़ुबां, 


एक मंत्री को देखा तो ऐसा लगा, 

जैसे डूबता जहाज़, 

जैसे सूखता गुलाब, 

जैसे झड़ती बहार, 

जैसे चीख़ती पुकार, 

जैसे खोखली दहाड़, 

जैसे टूटता मकान, 

जैसे जंगल में हो कोई खौलता कुआँ


एक मंत्री को देखा तो ऐसा लगा, 

जैसे गिरती गाज, 

जैसे उड़ती राख, 

जैसे फटा पजामा, 

जैसे सड़ता पपीता, 

जैसे खटारा हो बस, 

जैसे बहता हो पस, 

जैसे आहिस्ता आहिस्ता फैलता धुआँ


https://youtu.be/ZcxJlbg9Ds4 

(जावेद अख़्तर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 10 सितम्बर 2020 । सिएटल 


तुम भाषा नहीं बीवी हो

तुम भाषा नहीं बीवी हो

कि एक से ज़्यादा आ गई

तो जीवन में परेशानियाँ बढ़ जाएँगी


देखो नई वाली कितनी अच्छी है

सब काम फटाफट

बिना रोक-टोक के हो जाते हैं

घर-बाहर, ऑफ़िस-स्कूल, आस-पड़ोस 

सब जगह फ़िट हो जाती है


तुम?

तुम सिर्फ घर में काम आती हो

और वहाँ भी कहाँ

बच्चे तुम्हें पहचानने से 

साफ़ इंकार करते हैं

और मैं?

मैं भी कहाँ ठीक से बोल पाता हूँ

समाचार नहीं न्यूज़ बोलता हूँ

नगद बोले हुए तो जमाना हो गया

बोतल नहीं बॉटल कहता हूँ

चुनाव नहीं इलेक्शन कहता हूँ

और लिखने की तो बात ही मत करो

अपना नाम तक तो मैं लिख नहीं पाता

फिर वर्तनी, लिंग, व्याकरण, उपकरण

यानी आ बैल मुझे मार!


हाँ, जवानी में तुम काम आई

इसके लिए तुम्हारा धन्यवाद

कुछ गीत-नज़्म आज भी याद हैं

फ़िल्मे भी अच्छी थीं

पर क्या है ना 

सारी अंग्रेज़ी की नक़ल थीं

तो ओरिजनल देखना ही बेटर है ना?


तुम भाषा नहीं बीवी हो

नई के आते ही

पुरानी से रिश्ता 

तोड़ना पड़ता है


राहुल उपाध्याय । 13 सितम्बर 2020 । सिएटल


किसी के बाप का (की) हिंदुस्तान (मुम्बई) थोड़ी है

हो राहत या कंगना

सबका एक ही है कहना

आलोचना करना क्या जुर्म है

जो बात-बात पर कह देते हो

जाओ कहीं ओर 


यही राहत ने कहा

यही कंगना है कहती

यह जगह तुम्हारे बाप की थोड़ी है

किरायेदार हो, जाती मकान थोड़ी है


एक को धिक्कारना

एक को पुचकारना

ये दोगलापन क्यों?


अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है

बस्तियाँ छोड़ के जाने को कहा जाता है


पत्तियाँ रोज़ गिरा जातीं हैं ज़हरीली हवा

और हमें पेड़ लगाने को कहा जाता है


मैं नूर बनकर ज़माने में फैल जाऊँगा (जाऊँगी)

तुम आफ़ताब में कीड़े निकालते रहना

[आफ़ताब = सूरज]


साथ चलना है तो तलवार उठा मेरी तरह

मुझसे बुज़दिल की हिमायत नहीं होने वाली


अबके जो फ़ैसला होगा वो यहीं पर होगा

हमसे दूसरी हिजरत नहीं होने वाली

[हिजरत=वतन छोड़ना, विभाजन]


उठा शमशीर, दिखा अपना हुनर, क्या लेगा?

ये रही जान, ये गर्दन, ये सर, क्या लेगा?

[शमशीर=तलवार]


सिर्फ एक शेर (ट्वीट) उड़ा देगा परख्ते तेरे

तू समझता है कि शायर (लड़की) एक कर क्या लेगा (लेगी)?


अगर ख़िलाफ़ हैं, होने दो, जान थोड़ी है

ये सब धुँआ है, कोई आसमान थोड़ी है


लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में

यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है

[ज़द = निशाना]


हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है

हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

[सदाक़त = सच्चाई]


मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं

लेकिन हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है


जो आज साहिब-ए-मसनद हैं कल नहीं होंगे

किराएदार हैं, जाती मकान थोड़ी है

[साहिब-ए-मसनद = गद्दी पर बैठे]


सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में

किसी के बाप का (की) हिंदुस्तान (मुम्बई) थोड़ी है


राहुल उपाध्याय । 13 सितम्बर 2020 । सिएटल 

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Saturday, September 12, 2020

इतवारी पहेली: 2020/09/13


इतवारी पहेली:


कंगना ने कह दिया #%## ##

और बन बैठे वो #%## #


दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर # एक अक्षर है। हर % आधा अक्षर। 


जैसे कि:


हे हनुमान, राम, जानकी

रक्षा करो मेरी जान की


ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


Https://tinyurl.com/RahulPaheliya 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 


सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 20 सितम्बर को - उत्तर बता दूँगा। 


राहुल उपाध्याय । 13 सितम्बर 2020 । सिएटल


हल: जंगल इसे/जंगली से


Wednesday, September 9, 2020

ऐ मेरे दोस्त कहीं और भेज

ऐ मेरे दोस्त कहीं और भेज

फ़ॉरवर्ड से व्हाट्सएप मेरा भर गया

ढूँढ ले अब कोई ग्रुप नया


पक गया झूठे नारों से मैं 

झूठी आशा-ओ-वादों से मैं 

इन वीडियों से क्या फ़ायदा

जिसमें दिल की कली जल गई

ज़ख़्म फिर से हरा हो गया


चार आँसू कोई रो दिया

गीत कोई किसी ने गा दिया

लुट रहा था किसी का जहां

देखती रह गई भीड़ जमी

बन गया बेरहम वीडियो


(शैलेंद्र से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 8 सितम्बर 2020 । सिएटल

https://youtu.be/rOdQoLYkpYA 


Sunday, September 6, 2020

मत आ प्रिये

मत आ प्रिये कि फिर ये हसीं रात हो न हो

शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो


हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ ज़ूम पे

जी भर के देख लीजिये हमको दूर से

फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो


दूर रहिए वरना हम हो जाएँगे बीमार

बुखार में तड़प के हम रोए ज़ार-ज़ार

आँखों में फिर ये प्यार के जज़्बात हो न हो


(राजा मेहंदी अली खान से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 6 सितम्बर 2020 । सिएटल

https://youtu.be/JdLD3fCMVQA