Sunday, August 23, 2009

धर्मरक्षक

मैं एक इंजीनियर हूँ
और भारत से बाहर रहता हूँ
लेकिन मुझमें भारतीय संस्कार अभी भी बरकरार है

अभी कुछ दिन पहले की बात है
एक मंदिर बनाने के लिए धन इकट्ठा किया जा रहा था
मैंने भी तुरंत डेड़ सौ डालर का चैक काट कर दे दिया
अरे भई हम अपने धर्म की रक्षा नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

और मंदिर में अपने नाम की एक टाईल भी लगवा ली
उसके लिए अलग से 250 डालर दिए
साथ में अपनी पत्नी और बच्चों का भी नाम लिखवा दिया
अरे नाम तो मैं अपने माता-पिता का भी लिखवा देता
लेकिन क्या करूँ

वे अभी ज़िंदा हैं


******

अब मैं हर रविवार मंदिर जाता हूँ
आरती में
कीर्तन में
हिस्सा लेता हूँ
अपने बच्चों को भी साथ ले जाता हूँ
ताकि अपनी संस्कृति की पहचान अगली पीढ़ी में बनी रहे

अपने घर में
पूजा पाठ कहाँ हो पाती है?
पहले ही जीवन में भागदौड़ इतनी है
कि अब पूजा-पाठ की मुसीबत कौन सर पर ले?
उन्हें नहलायो-धुलायों, पोशाक पहनाओं, तिलक लगाओं
दीप जलाओ, अगरबत्ती लगाओ
ऊफ़! कितनी आफ़त है
और उपर से दीपक और अगरबत्ती से कारपेट पर कालिख और बढ़ जाती है
साफ़ ही नहीं होती

मंदिर में पुजारी जी है
जो सब सम्हाल लेते हैं
उन्हें समय से उठाते हैं, सुलाते हैं, खिलाते हैं
हम हफ़्ते में एक दिन जाकर माथा टेक आते हैं
हुंडी में कुछ दान-दक्षिणा डाल आते हैं
वे भी खुश
हम भी खुश

और जैसा कि मैंने आपसे कहा
बावजूद इसके कि
मैं एक इंजीनियर हूँ
और भारत से बाहर रहता हूँ
मुझमें भारतीय संस्कार अभी भी मौजूद है

और तो और
मैं अपने माता-पिता को ईश्वर का दर्जा देता हूँ

मैं हर साल भारत जाता हूँ
कभी क्रिसमस की छुट्टी पर
तो कभी गर्मी की छुट्टी पर
उनसे मिल कर आता हूँ
अपने बच्चों को भी साथ ले जाता हूँ
ताकि अपने पूर्वजों की पहचान अगली पीढ़ी में बनी रहे

इस परदेस में
उनकी देख-रेख कहाँ हो पाती?
पहले ही जीवन में भागदौड़ इतनी है
कि अब उनकी मुसीबत कौन सर पर ले?
उनके साथ बात करो, उन्हें डाक्टर के पास ले जाओ, उनके लिए अलग भोजन बनाओ
ऊफ़! कितनी आफ़त है
और उपर से रोज़ रोज साड़ी, धोती वाशिंग मशीन में कहाँ धुल पाती हैं
और बाथटब में धोओ तो रंग अलग से निकलता है
बाथरूम इतने गंदे हो जाते हैं
कि साफ़ ही नहीं होते

भारत में एक आया है
जो सब सम्हाल लेती है
उन्हें समय से खिलाती है, पिलाती है, दवाई देती है, मालिश करती है
हम साल में एक बार जाकर उनसे आशीर्वाद ले आते हैं
आया को उपहार दे आते हैं
वह भी खुश
हम भी खुश

सिएटल 425-898-9325
23 अगस्त 2009

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10 comments:

Atmaram Sharma said...

कविता के मर्म में गहरा व्यंग्य छुपा है. दोबारा पढ़ने पर बेहतर तरीके से समझ आता है. साधुवाद.

दिल दुखता है... said...

jai ho.......

वाणी गीत said...

व्यंग्य को शब्दों की चाशनी में ऐसा लपेटा ही की क्या कहना ..!!
सचमुच हमसब अपने घरों में ऐसा ही तो करते हैं ...बहुत बढ़िया ..!!

mridula pradhan said...

very nice poem.
cogratulations.

Anonymous said...

Aap ko kya batau,
aap saache hai,
par akal ke kache hai,

aapne apni pidi ko thukraya,
aapko agli pidi thukrayegi,

jis sanskar/dharm ki raksha ka pariman aap deke hai,
wahi aapko kha jayegi!!!

kya dharma hai usko pehchaniye,
aur apne jeevan ko sarthak banaiye....

Yogesh said...

Nice poem rahul ji,

ek baar clarify keejiyega, mujhe 100% se pehli waali poem samaj nahi aaai..

Bataiayega, jo main samjha, theek samjha ke nahi..

Mujhe jo samaj aya, vo ye

ham log, apni biwi bacho ke naam par aksar daan pun kar dete hain, but when it comes to parents, ham nahi karte, kyo ke vo abhi zinda hain, unke marne ke baad karte hain..

Ryt??

Shobha Rajpurohit said...

sach mei bhutt badhiya..

Dinesh Arya said...

Rahul Ji, Ati sundar. bahut badiya vyang aaj ke hamari jindgi par aur hamari apane hee liye bahaane baze par.

Dinesh Arya said...

Bahut acchaa likha hai Rahul Ji. Ati sundar vyang hai aaj kE hamaare jeevan par aur hamaari apne se hi bahanebazi par.

Rahul Upadhyaya said...

योगेश जी - जो आपने समझा वह सही समझा। मेरा यही अभिप्राय था।

मैंने मंदिरों में प्राय: दो तरह की टाईल देखी हैं। एक तो यह कि मुझ पर, मेरी पत्नी पर और मेरे बच्चो पर ईश्वर की अनुकम्पा रहे। और दूसरी यह कि माता-पिता की पुण्य-स्मृति में। बीवी-बच्चों के साथ माता-पिता का नाम बहुत कम बार देखा गया है।

और यही हाल तस्वीरों का भी है। घर में, दफ़्तर में, पर्स में प्राय: बीवी-बच्चों के ही फोटो मिलते हैं। माता-पिता फ़्रेम में तब जड़े जाते हैं जब वे दिवंगत हो जाते हैं।

सद्बाव सहित,
राहुल