Saturday, January 5, 2013

मैं कोई ईसा नहीं


मैं कोई ईसा नहीं
जो दूँ दुआएँ सलीब से
रखूँ राबता उम्र भर
और करूँ दोस्ती रक़ीब से

बहुत चाहा बनूँ फ़कीर
मैं भी गाँधी-कबीर सा
बुरा हो शुभकामनाओं का
जो मिली मुझे हबीब से

न कपड़ें फटे थे
न कार थी टूटी
लेकिन लब पे आई शिकायतें
तो लगने लगे वो गरीब से

दिल्ली की नारी जो कहे
चलती उसी पे सरकार है
छपने लगे इन दिनों
किस्से कैसे-कैसे अजीब से

'गर मानों
तो ये एक रचना है
वरना हैं शब्द
बिखरें बेतरतीब से

5 जनवरी 2012
सिएटल । 513-341-6798

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सलीब - सूली
राबता = सम्बन्ध, सम्पर्क
रक़ीब = प्रतिद्वंदी
हबीब = मित्र



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3 comments:

Anonymous said...

सलीब, रकीब, हबीब, गरीब, अजीब, बेतरतीब - इन सब का कविता में use बहुत अच्छा लगा

"बहुत चाहा बनूँ फ़कीर
मैं भी गाँधी-कबीर सा
बुरा हो शुभकामनाओं का
जो मिली मुझे हबीब से"

Nice! शुभकामनाओं के साथ भी gift receipt होनी चाहिए कि मन चाही न हों तो बदल लेना :)

Dr. Rex said...

Bhai wah, kamaal hai. Aap to shaayar hain bemisaal. Hum to kayal hai aap ke kyonki shabdon se ghayal hain aapke.

Bebaak

Rajendra Kumar said...

आपकी बेहतरीन शब्दों की रचना बेहतरीन है,धन्यबाद।