Monday, February 4, 2019

दो साल में चार दिन ही बचे थे

दो साल में चार दिन ही बचे थे
और सारा देश
ख़ुशी से झूम उठा

क्या राष्ट्रपिता की हत्या का दु: 
इतना अल्पकालिक था?

अल्पकालिक?
महाशय, आपका दिमाग तो सही है?
यहाँ तो चौथे/तेरहवीं पर ही लोग
इधर-उधर की बातें करने लग जाते हैं 
आगामी चुनाव,
पिछले भ्रष्टाचार की
बखिया उधेड़ने लग जाते हैं
व्हाट्सैप पर आए वीडियो
चटखारे लेकर देखने-दिखाने लग जाते हैं

दिन, महीनों, सालों की अवधियों का
अब मोल ही क्या रहा
एक क्षण आप दु: से चूर हैं
तो दूसरे ही क्षण ठहाकों की गूँज है

एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट
दूसरी से तीसरी
चक्र चलता रहता है
बेतहाशा 

हम इंसान नहीं 
एक बिसात है
जिसकी पल-पल 
बदलती चाल है

4 फ़रवरी 2019
(बाऊजी की पचासवीं मासिक पुण्यतिथि)
सिएटल
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बिसात = chessboard 

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1 comments:

Kailash Sharma said...

बहुत सटीक अभिव्यक्ति...