Monday, September 16, 2019

ख़ला जो ख़ालिद है

ख़ला जो ख़ालिद है
ख़ला जो वालिद है
उसी में जीवन
ढूँढने की ज़िद है

चाँद चूमना
तो फ़क़त एक बहाना है
चाँद से भी दूर
दूर तलक जाना है

सोम से मंगल
मंगल से बुध
बुध से गुरू
गुरू से शुक्र-शनि
रवि पर भी जाना है
रवि पर भी रूककर
आराम कहाँ फ़रमाना है

किसी एक के 
गुरुत्वाकर्षण में 
किसी एक के
आगेश में
ठहरे वो 
जो सयाना है

अपना क्या?
न कोई अपना
न कोई बेगाना है
आज यहाँ तो 
कल कहीं जाना है
जीवन जीने का 
तरीक़ा यही जाना है

(अमेरिका में पदार्पण की 33वीं वर्षगाँठ पर)
राहुल उपाध्याय । 15 सितम्बर 2019 । सिएटल
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ख़ला = शून्य, अन्तरिक्ष 
ख़ालिद = अनश्वर, अमर
वालिद = पिता

Friday, September 13, 2019

मिलन की रात

मेरा नाम प्रज्ञान है
मैं कोई बुद्धू थोड़े ही हूँ
जो मिलन की रात भी 
फ़ोन उठाऊँ 
बात करूँ 
आँखों देखा हाल सुनाऊँ 
लाईव फ़ीड भेजूँ

राहुल उपाध्याय । 13 सितम्बर 2019 । सिएटल

Saturday, September 7, 2019

बिल्ली ने काट लिया होगा किसी का रास्ता

बिल्ली ने काट लिया होगा किसी का रास्ता
अण्डे का कर लिया होगा किसी ने नाश्ता
ऐन मौक़े पर आ गई होगी किसी को छींक
रोक दिया होगा किसी ने संदेश जो होना चाहिए था ग्यारह को फ़ॉरवर्ड 
सवा-रूपये-नारियल का वादा करके कोई गया होगा भूल
सत्यनारायण की पूजा से कोई उठ गया होगा बिना लिए प्रसाद
एकादशी को किसी ने खा लिया होगा अन्न

करोड़ों की तादाद में कुछ तो होंगे ऐसे
जिन्होंने किए होंगे अपशकुन ऐसे-वैसे
जिससे
श्रावण सोमवार को चले को
लग गई शनि की दशा
और हो गया दिशा भ्रम

राहुल उपाध्याय । 7 सितम्बर 2019 । सिएटल

Friday, August 9, 2019

जितना मंजन किया

जितना मंजन किया
उतना वंदन किया

फिर भी दाँत झड़े
दु:ख न घटे
डॉक्टर ढूँढे 
पण्डित ढूँढे 
सबने घुटने
टेक दिए

कहने लगे
ढलती उम्र का इलाज नहीं
जीवन के चढ़ाव-उतार से निजात नहीं

फिर क्यूँ माँजूँ?
नाम भजूँ?
जिसका कोई स्थायी स्वभाव नहीं?

क्योंकि माँजे बिना मुस्कान नहीं
गुणगान बिना हर्ष-ओ-उल्लास नहीं

राहुल उपाध्याय । 9 अगस्त 2019 । सिएटल

Sunday, August 4, 2019

यार नहीं होते तो



नैया है सबकी, सब हैं खिवैया
ज़िम्मेदारी सबकी, सब हैं मुखिया
यार नहीं होते तो पतवार नहीं होती
पतवार नहीं होती तो मँझधार ले डूबोते

श्रम से भरा है जीवन, जीवन इक बगिया 
काट-छाँट खाद डालो, महके तब बगिया
यार नहीं होते तो इतवार नहीं होते
इतवार नहीं होते तो थक-हार गए होते

यार की है यारी न्यारी, इसका न जोड़ कोई
संग-संग सदा चले, आ जाए मोड़ कोई
यार नहीं होते तो संवाद नहीं होते
संवाद नहीं होते तो बेज़ार हो के रोते 

यार नहीं होते तो ...

राहुल उपाध्याय । 4 अगस्त 2019 । सिएटल

Tuesday, May 21, 2019

करोड़ों-करोड़ों मत गिनने में वक़्त तो लगता है

करोड़ों-करोड़ों मत गिनने में वक़्त तो लगता है
लड्डू पहले से जो खा ले भक्त तो लगता है

मुद्दों की कोई बात नहीं की, भगवा ही फहराना था
भगवे में मिल गया कहीं-कहीं रक्त तो लगता है

हैं तपस्वी और त्यागी भी, दया का कोई भाव नहीं है
लीन हैं ध्यान में फिर भी चेहरा सख़्त तो लगता है

फूल नहीं हैं, पात नहीं हैं, फल की भी गुंजाईश नहीं है
क्यूँ सींचूँ ऐसे दरख़्त को, गो सशक्त तो लगता है

राहुल उपाध्याय । 21 मई 2019 । सिएटल

Saturday, April 27, 2019

पहेली

इतवारी पहेली:

जो करते हैं धर्म-परिवर्तन पर ***
उनसे आग्रह है कि कभी तो ** **

उपरोक्त दोनों पंक्तियों के अंतिम शब्द सुनने में एक जैसे ही लगते हैं। लेकिन जोड़-तोड़ कर लिखने में अर्थ बदल जाते हैं। हर * एक अक्षर है। 

जैसे कि:
हे हनुमान, राम, जानकी
रक्षा करो मेरी जान की

ऐसे कई और उदाहरण/पहेलियाँ हैं। जिन्हें आप यहाँ देख सकते हैं। 


आज की पहेली का हल आप मुझे भेज सकते हैं। या यहाँ लिख सकते हैं। 

सही उत्तर न आने पर मैं अगले रविवार - 5 मई को - उत्तर बता दूँगा। 

राहुल उपाध्याय । 27 अप्रैल 2019 । सिएटल

हल: चर्चा / चर्च आ