Wednesday, October 17, 2007

आत्मकथ्य


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लिख नहीं पाता हूं राजी खुशी की दो-चार लाईने तक माँ-बाप को
और लिख रहा हूं लम्बे-लम्बे blog जिसे भेजता हूं रोज आप को

Atoms की feed
RSS की feed
बो रही है
क्रांति के seed
सोचता हूं
मैं भी उजागर करूं एकाध आस्तीन के सांप को
लिख नहीं पाता हूं…

छपते ही किताब
धूल खाती है जनाब
छपते ही blog
Aggregators जाते हैं जाग
Bits और bytes के बीच
छोड़ जाना चाहता हूं अपनी अमिट छाप को
लिख नहीं पाता हूं…

क्या क्या खोया
क्या क्या पाया
वक्त मुझे
कहाँ ले आया
बड़ी धूम से
दर्शाता हूं blog पर हर एक पुण्य और पाप को
लिख नहीं पाता हूं…

17 अक्टूबर 2007

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2 comments:

Udan Tashtari said...

क्या बात कह गये, राहूल भाई. बहुत खूब.

अनिल रघुराज said...

अपने हुए पराए। छोटे से आत्म कथ्य में बड़ा-सा दर्द कुरेद गए आप...सैलानी राहुल भाई