Monday, January 19, 2026

पता नहीं

पता नहीं 

क्या पहनती थीं

सेंडल

चप्पल 

या जूतियाँ 

सूट

टॉप

या साड़ियाँ 


पता नहीं 

कैसे बाँधती थीं बाल 

लगाती थी लिपस्टिक 

या पहनती थीं बालियाँ 


पता नहीं 

कैसी दिखती थी वो


(देखने को तो देख लूँ 

हज़ारों सेल्फियां

बचा के रखी हैं

जो गूगल पे मैंने 

दिखा देगा मुझको

एक-एक पिक्सल वो उसके

और उगा देगा

काँटों का बगीचा 

यादों का सैलाब 

कहाँ की गलती 

कहाँ थे ग़लत) 


याद है लेकिन 

उसकी मुस्कान 

रूठना उसका

और टप-टप 

बहते वो आँसू 


पता नहीं कैसी 

होगी वो आज


क्या लड़ रही होगी 

आज भी उखड़ी प्रथाओं से

क्या जूझ भी रही होगी

कुछ अपनी व्यथाओं से

क्या प्यार होगा उसे

आज भी उससे 

जिसकी बाँहों में उसे

प्यार मिला था 

जीवन जीने का

आधार मिला था 


परित्यक्त थी

मैंने राह दिखाई 

जीवन जीने की

ज्योत जगाई


आई थी मेरे जीवन में धम से

छू के मुझे 

मुझको बदलने

छू के चल दी

उन्मुक्त गगन में 


याद है गीत मुझे 

पहले मिलन का


क्या यही प्यार है?


राहुल उपाध्याय । 20 जनवरी 2026 । दिल्ली 


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