पता नहीं
क्या पहनती थीं
सेंडल
चप्पल
या जूतियाँ
सूट
टॉप
या साड़ियाँ
पता नहीं
कैसे बाँधती थीं बाल
लगाती थी लिपस्टिक
या पहनती थीं बालियाँ
पता नहीं
कैसी दिखती थी वो
(देखने को तो देख लूँ
हज़ारों सेल्फियां
बचा के रखी हैं
जो गूगल पे मैंने
दिखा देगा मुझको
एक-एक पिक्सल वो उसके
और उगा देगा
काँटों का बगीचा
यादों का सैलाब
कहाँ की गलती
कहाँ थे ग़लत)
याद है लेकिन
उसकी मुस्कान
रूठना उसका
और टप-टप
बहते वो आँसू
पता नहीं कैसी
होगी वो आज
क्या लड़ रही होगी
आज भी उखड़ी प्रथाओं से
क्या जूझ भी रही होगी
कुछ अपनी व्यथाओं से
क्या प्यार होगा उसे
आज भी उससे
जिसकी बाँहों में उसे
प्यार मिला था
जीवन जीने का
आधार मिला था
परित्यक्त थी
मैंने राह दिखाई
जीवन जीने की
ज्योत जगाई
आई थी मेरे जीवन में धम से
छू के मुझे
मुझको बदलने
छू के चल दी
उन्मुक्त गगन में
याद है गीत मुझे
पहले मिलन का
क्या यही प्यार है?
राहुल उपाध्याय । 20 जनवरी 2026 । दिल्ली

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