Sunday, March 25, 2018

महज़ बातों ही से क्या मन की बात होती है

महज़ बातों ही से क्या
मन की बात होती है
हवा दो तो जवाँ 
आग राख होती है

आज भी याद है वो
वो रात फूलों की
दिखा जो चाँद कभी
ख़ुशबू साथ होती है

तराने जो भी सुने
नग़मे जो भी चुने
उन्हें गाने की तबियत
हज़ार होती है

तू ख़ुश रहे
तू सदा होके आबाद रहे
इन्हीं दुआओं के संग
सुबह-शाम होती है

वफ़ाएँ छोड़ भी दीं
जफ़ाएँ ओढ़ भी लीं
रूह तो रूह है 'राहुल'
किसकी जान होती है

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4 comments:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 27/03/2018 को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

शुभा said...

वाह!!बहुत खूब !!

Renu said...

बहुत मर्मस्पर्शी और सुंदर रचना है आदरणीय राहुल जी --------
शुभकामना |

लोकेश नदीश said...

बहुत खूब