चांद था तो मिली थी हमें रोशनी
चांदनी के बिना है कहाँ जिंदगी
दिन का सूरज उगलता बड़ी आग है
आग समझेगी क्या है, कहां है ख़ुशी
दिन ढले रात हो, रात ही रात हो
हाथ उठे तो मैंने दुआ ये ही की
आज तय कर लिया मैंने अपना भविष्य
वसीयत में किसी को फूटी कौड़ी न दी
दुख होगा मुझे क्यूँ और किस बात का
बिजलियाँ भी गिरीं तो कुछ दे कर गईं
राहुल उपाध्याय । 15 मई 2026 । सिएटल
