देखा है तुमको ख़ुश मैंने जबसे
रहने लगा हूँ मैं दुखी तबसे
आते नहीं हैं फ़ोन अब तुम्हारे
मिलते नहीं क्यों दिल अब हमारे
कह दो, हाँ, कह दो
आख़िर क्या कमी है
सुनने को तत्पर कान मेरे कबसे
लड़ते नहीं थे, लड़ने लगे हैं
भिड़ते नहीं थे, भिड़ने लगे हैं
मिला ये मोहब्बत का
रंग कैसा घटिया
पूछने लगा हूँ आजकल रब से
कहना बहुत है आज मुझे तुमसे
जज़्बात तूफ़ाँ और शब्द गुमसुम हैं
शब्दों के जाल में
कहाँ तक घुमाऊँ
निकलते नहीं लफ़्ज़ आज मेरे लब से
राहुल उपाध्याय । 24 मार्च 2026 । सिएटल
