Friday, March 20, 2026

पाँव कहीं के कहीं

पाँव कहीं के कहीं पड़ते हैं उसके

टेक्स्ट भी करती है तो करती है डरके 

कहीं और कोई कुछ समझ तो न लेगा? जो समझ रही हूँ मैं वो समझ तो न लेगा?


ये भावनाएँ मेरी ऐसी हैं क्यों?

क्यों नहीं कहती हूँ सब दिल खोल के मैं?

वो दूर है तो क्या सुरक्षित हूँ मैं?

ये दूरी ही क्या है क़रीबी का सबब?


ये धड़कन कम्बख़्त क्यूँ घटती नहीं? 

ये पसीने की बूंदें क्यूँ छुपती नहीं? 

ये दुपट्टा सँभालूँ कि दूध गैस से उतारूँ? 

क्या-क्या करूँ,  क्या-क्या सँभालूँ?


ये प्यार ऐसे तो होता नहीं है 

किताबों में तो ऐसा कभी पढ़ा नहीं है 

सामने हो इंसान तो समझ में भी आए आवाज़ की बेसिस पे तो ये होता नहीं है

लच्छेदार बातों की एक होती हूँ उम्र 

साल-दर-साल ये चलता नहीं 


क्यों होता है प्यार, क्यों होता है प्यार मिलता है सुकून, मिलता करार

और यही प्यार छीन लेता है सब्र-ओ-करार 


राहुल उपाध्याय । 20 मार्च 2026 । सिएटल 

Thursday, March 19, 2026

हसीनाओं से बच के

हसीनाओं से बच के कहाँ हम जिएँगे 

उन्हीं से जिएँगे, उन्हीं पे मरेंगे 


ये बात और है कि वो बेवफ़ा हैं

बेगैरत हैं हम तो, उम्मीद तो रखेंगे


कहते हैं हमसे कि हम ना मिलेंगे 

मिल के भी हम तो मर ही मिटेंगे


ये जुदाई नहीं है, यही तो मिलन है 

ताउम्र तुमको ख्वाबों में तकेंगे


तुम्हीं से है जन्नत, तुम्हीं से ख़ुदाई 

तुम्हें ही नाखुदा और खुदा हम कहेंगे


राहुल उपाध्याय । 19 मार्च 2026 । सिएटल 


बसंत

बसंत पे कविता मैं लिखता नहीं 

बसंत मेरे गमले में खिलता नहीं 


मेरी अपनी राह है मंज़िल मेरी

जहाँ भीड़ हो वहाँ मैं जुड़ता नहीं 


लिखने दो घिसा-पिटा जो लिखा करे

ऐसी रचनाओं को क़तई मैं पढ़ता नहीं 


चरागों को रोशनी देना ही है

चरागों की प्रशंसा मैं करता नहीं 


राहुल का अर्थ कुछ भी होता रहे

सच है कि मैं सब जैसा करता नहीं 


राहुल उपाध्याय । 19 मार्च 2026 । सिएटल 



Wednesday, March 18, 2026

मेरा प्यार

मुझे फ़ोन वो करती है 

मेरा ध्यान वो रखती है 

हर त्यौहार बिन भूले 

मुझे याद वो करती है 

कहीं-कहीं से वो

मेरा प्यार भी लगती है 


हर पल वो हँसती है

चिड़िया सी चहकती है 

कुछ भी पहन ले वो

हर हाल चमकती है 

कहीं-कहीं से वो

गुलज़ार भी लगती है 


ज़मीं न छूती है

हवा पे चलती है 

है पास नहीं कुछ भी 

पर मौज में रहती है

कहीं-कहीं से वो

दमदार भी लगती है 


कोई पिकनिक हो जैसे 

कोई पिक्चर हो जैसे 

किसी झील किनारे की

कोई छाँव हो जैसे 

कहीं-कहीं से वो

इतवार भी लगती है 


राहुल उपाध्याय । 18 मार्च 2026 । सिएटल 




पढ़-लिख के डिग्री भले साध ली

पढ़-लिख के डिग्री भले साध ली 

जवानी मगर मैंने बर्बाद की 


न आँखों से बोला, न मुँह से कहा 

कोई होता तो होती कोई बात भी 


तन्हा सा रहता था सहरा में मैं 

क्या जाने कैसी घड़ी साथ थी 


न जी भर के रोया, न टूटा ये दिल

किस्मत ने कैसी ये सौग़ात दी


मैं जैसा था वैसे का वैसा रहा

आज भी हैं नियम मेरे सारथी


राहुल उपाध्याय । 18 मार्च 2026 । सिएटल 

Tuesday, March 17, 2026

सुनना सँभल के

जवानी की बातें सुनना संभल के 

शराबी की बातें सुनना संभल के 


इलाज कई हैं हमारे यहाँ पर

दवाई की बातें सुनना संभल के 


आते ही रहते हैं लोग हर दिशा से

मुनादी की बातें सुनना संभल के 


चोरी नहीं है माफ़ी के क़ाबिल 

ख़ज़ांची की बातें सुनना संभल के


'गर देखो तमाशा, तमाशा न बनना

मदारी की बातें सुनना संभल के


राहुल उपाध्याय । 17 मार्च 2026 । सिएटल 



Monday, March 16, 2026

सिलेंडर

ये कैसा है मंजर 

के ग़ायब सिलेंडर 


सब कुछ है बाहर 

कुछ भी न अंदर

कब से खड़े हैं 

आया न नम्बर


बस चुनाव जीतो 

यही एक मंतर 

जनता का क्या

वह चुनती निरंतर


जीना था हमें 

अपने ही दम पर

जी रहे हैं आज

कर के सरेंडर


विश्व गुरु का टैग 

लगाना ना हम पर

ए-आई ने कर दिया 

हमें डम्ब और डम्बर


पाओगे ऑफ़र 

बम्पर पे बम्पर 

बन जाओ 'गर 

तुम एक प्लम्बर


आए न तूफ़ान 

उठे न बवंडर 

इसलिए नाम 

होता न रेंडर


आर्टिस्ट हूँ तो 

रहता हूँ सहमकर 

हो न जाए कहीं 

हमला ही जमकर


न राम बचाए 

न बचाए शंकर 

समस्या बड़ी 

विकट और भयंकर


कहाँ है गांधी 

कहाँ अम्बेडकर 

जिन्हें मानते थे हम 

देश के एंकर 


राहुल उपाध्याय । 16 मार्च 2026 । सिएटल