वह जब मिलती है
तो सजता-धजता हूँ
वरना यूं ही चलता रहता हूँ
वह साज है मेरी जिंदगी का
जिसकी धुन पे मैं मचलता हूँ
वह नूर है मेरी आंखों का
उसे मैं ही तो समझता हूँ
मुझे मौत का क्यों ही खौफ हो
मैं जो रोज़ उस पे मरता हूँ
बिछड़ भी गए, कभी किसी मोड़ पर किसी मोड़ पर फिर उससे मिलता हूँ
ये जो ब्लॉग आदि मैं लिखता हूँ
ये सब इसलिए कि
वो भी जान ले कि
दिन भर मैं क्या करता हूँ
ये जो रील आदि मैं बनाता हूँ
ये सब इसलिए कि
वो भी देख ले कि
दिन भर मैं कहाँ घूमता हूँ
राहुल उपाध्याय । 22 मई 2026 । सिएटल
