दिल तो न था पर जाना पड़ा
ख़ामियाज़ा किसी को उठाना पड़ा
जर्जर है महल शायद बदलेगा कल फ़िलहाल तो जालों को हटाना पड़ा
ये तिनका था पीठ पे किसी ऊँट के
बढ़ गया बोझ तो बिठाना पड़ा
बरसों से दुनिया में बदला ही क्या है ग़रीबों को जान से जाना पड़ा
लीक से हटकर कभी कुछ किया ही नहीं बार-बार अनशन को आज़माना पड़ा
राहुल उपाध्याय । 25 जुलाई 2026 । सिएटल
