चराग ढूंढ लिया
बुझते चिराग ने
दुनिया ये जल रही है
बुझते चिराग से
सुन के हज़ार क़िस्से
हमने ये आज माना
हर बार ही नए हैं
क़िस्से ये प्यार के
मुझसे ख़फ़ा है आज जो
बरसो के मीत है
कहते हैं आप ही क्यूँ
दुख औरों के काटते
कहता नहीं था लेकिन
कहता हूँ आज सब से
करना है प्यार कर लो
रख के दिमाग़ घर पे
पति और पत्नी दोनों बस
काम के लिए हैं
इक आशिक़ी वो शय है
जो झोली में प्यार भर दे
राहुल उपाध्याय । 4 अप्रैल 2026 । रोग रिवर (बाग़ी नदी), ओरेगन
