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Tuesday, September 1, 2020

राम रचि राखा

यह सब क्या हो रहा है?


एक राष्ट्रपति

इलाज के लिए

अस्पताल जाता है

और संक्रमित हो जाता है


कैसे?

क्या योद्धाओं से

कोई भूल हुई?


गृहमंत्री

मुख्यमंत्री

महानायक 

सब के सब

संक्रमित


कैसे?

क्या सारी हिदायतें 

कोरी लफ़्फ़ाज़ी हैं?


होइहि सोइ जो राम रचि राखा ...


राहुल उपाध्याय । 1 सितम्बर 2020 । सिएटल


Friday, August 21, 2020

ग़रीब रहा ग़रीब

कहीं पर हवन 

कहीं पर अगन 

संघर्ष जीवन का 

कितना सघन 


कहीं पर फूल 

कहीं पर शूल 

ज़िंदगी का ये 

कैसा उसूल 


कहीं पर पत्थर 

कहीं पर सर 

आज की ख़बर 

और हैं सब बे-ख़बर 


कहीं पर गणेश 

कहीं पर नरेश 

संवेदना का नहीं 

कहीं प्रवेश 


गरीब रहा गरीब 

और उधर 

दुगना पा गया 

इंजीनियर मगर


राहुल उपाध्याय । 21 अगस्त 2020 । सिएटल 


Wednesday, August 5, 2020

एक मन्दिर मेरा घर बन गया

एक मन्दिर मेरा घर बन गया

देखो, देखो सबको ख़ुश कर गया

सदियों पुराना आज काम बन गया

देखो, देखो सबको ख़ुश कर गया


मेरे प्रभु राम की है ये राजधानी

यहीं से शुरू हुई उनकी कहानी

आज मेरे होंठों पे ये गीत बन गया


झूम रहे हैं लाखों देशवासी

छा रहीं ख़ुशियाँ, मिटी है उदासी

चारों ओर राम का रंग चढ़ गया


उसी के हैं भक्त सारे, उसी के हैं बन्दे

उसको ही नमन करें, उसको ही सजदे 

सबको अपना राम मिल गया


राहुल उपाध्याय । 5 अगस्त 2020 । सिएटल


Tuesday, August 4, 2020

जो है

जो है

उसकी कोई पूछ नहीं 

जो नहीं है

उसे बनाने की धूम मची है


सच तो यही है कि

चाहे बच्चे हो या बड़े

चीज़ वही अच्छी लगती है

जिसे दूसरा चाहता हो

ख़ासकर तब

जब लड़-मर कर ली गई हो


सुना है

पूजा में 

सर झुक जाता है

यहाँ तो

घमण्ड इतना है कि

पूजा ख़ाक होगी


राहुल उपाध्याय । 4 अगस्त 2020 । सिएटल 


Sunday, August 2, 2020

जो बनता है वह सच कहाँ होता है

दिन, रात होते

तो न दिन-रात होते 

न मौसम होते 

न गुल-ए-गुलज़ार होते


जो बनता है

वह सच कहाँ होता है 

संग राम होते 

तो न संग्राम होते


चादर रहती

बेसिलवट

जो न हम-तुम

साथ होते 


'गर होती 

समझ

न प्रयाग होते 

न इलाहाबाद होते


'गर होती 

समझ

न प्रयाग,

इलाहाबाद होते


राहुल उपाध्याय । 2 अगस्त 2020 । सिएटल 


Thursday, July 30, 2020

मेरे घर पर ताला नहीं

मेरे घर पर 

ताला नहीं है 

फिर भी कोई 

आता नहीं है


चोर आए

चोरी करे

नक़ाबपोश भी

मुँह दिखाता नहीं है


संग्राम भी है

संग राम भी है

चारागर मगर

मिल पाता नहीं है


सब हैं

अपनी-अपनी ही धुन में

अब कोई किसी को

कुछ समझाता नहीं है


हर घड़ी अलार्म

बज रहा है 'राहुल'

फिर भी कोई

जग पाता नहीं है


राहुल उपाध्याय । 30 जुलाई 2020 । सिएटल


Tuesday, July 14, 2020

होटल में क़ैद

ग़नीमत है 

लोग

घरों में आज भी आज़ाद हैं

और होटलों में क़ैद 


जो खुद स्वतंत्र नहीं हैं

यह तय करने के लिए

कि वे किसके साथ हैं 

वे जनता का साथ क्या देंगे


मैं तो कहता हूँ 

कि एक क़ानून बनना चाहिए 

संविधान में संशोधन होना चाहिए 

कि

जिस शहर में आपका घर हो

वहाँ आप होटल में न रह सके 


इससे 

दो बातें होंगी

एक तो लोग 

ज़बरदस्ती 

खूँटे से बंधने से बच जाएँगे 

और 

दूसरा 

अवैध सम्बंध कम स्थापित होंगे 


राहुल उपाध्याय । 13 जुलाई 2020 । सिएटल 


Sunday, July 12, 2020

तसव्वुर-ए-कोरोना किए हुए

सब को हो गया 

दादी को छोड़कर 


या तो

दादी किसी से प्यार नहीं करतीं

या

फिर दादी से कोई प्यार नहीं करता

या

फिर दादी बहुत अनुशासन बरततीं है

या

फिर दादी मोदी की सुनतीं हैं 

या

फिर दादी अक़्लमन्द हैं 

या

फिर दादी स्वार्थी हैं


यूँही 

गुज़ार रहें हैं हम

फ़ुर्सत के रात-दिन

तसव्वुर-ए-कोरोना किए हुए


राहुल उपाध्याय । 12 जुलाई 2020 । सिएटल 


Thursday, July 9, 2020

मार दिया जाए

मार दिया जाए

या क़ानून के हवाले कर दिया जाए

बोल तेरे साथ 

क्या सलूक किया जाए

यह सवाल सुनना हो

तो किसी और मुल्क जाया जाए


निजीकरण के युग में 

सब कुछ निजी है


कैसे किसी ख़ूँख़ार हत्यारे के प्रति

सहानुभूति जगाई जाए

इसका पाठ पढ़ना हो

तो आज का अख़बार ज़रूर पढ़ें


क़ानून के हाथ अवश्य लम्बे हैं

लेकिन

या तो फ़्यूज़ बहुत ही छोटा है

या फिर हथकड़ी बहुत कमज़ोर


राहुल उपाध्याय । 9 जुलाई 2020 । सिएटल


Saturday, July 4, 2020

मैं अब कविता नहीं लिखता

मैं 

अब दिल छूने वाली कविता नहीं लिखता 

ताकि कहीं कोई संक्रमित न हो जाए 


मैं 

अब हँसने-हँसाने वाली कविता नहीं लिखता 

ताकि ठहाका मारने के लिए 

कहीं कोई मास्क उतारे

और लेने के देने पड़ जाए 


मैं 

अब रोने-रुलाने वाली कविता भी नहीं लिखता 

ताकि आँसू पोंछने के लिए

कहीं कोई अनधोए हाथ

आँखों को न छू लें


मैं 

अब कविता ही नहीं लिखता 

ताकि कहीं कुछ हो 

और मेरी कविता 

उसकी ज़िम्मेदार

ठहराई जाए 


राहुल उपाध्याय | 4 जुलाई 2020 | सिएटल 


Thursday, June 25, 2020

गाज

दो गज की दूरी
गाज ने कब मानी
होती हो तो हो
किसी की भी हानि

(बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी
तेरी नींद उड़े ते उड़ जाए)

गाज वैसी ही होती है
जैसी ईश्वर की कृपा
सबके लिए बराबर
न अमीर, न ग़रीब
न पूरब, न पश्चिम 
कुछ नहीं देखती
सबके लिए बराबर 

कुछ चपेटें में आ जाते हैं
कुछ बच जाते हैं

क्यों?
क्योंकि 
जहाँ परिवार बढ़ते है
खेत छोटे हो जाते हैं
और मशीनीकरण नहीं हो पाता है

और हाथ ज़्यादा होंगे 
तो ज़ाहिर है मशीनें तो
दरकिनार हो ही जाएगी

मेहनत का फल मीठा होता है?

तो डायबीटीज़ वाले क्या कुछ न करें?


राहुल उपाध्याय । 25 जून 2020 । सिएटल

Monday, June 15, 2020

चिता की गर्म आँच से

जग जाता है जग
चिता की गर्म आँच से
देह का कोई असर नहीं 
चाहे भरी हो गर्म साँस से

आँसू पूछते थे उसे
पोंछने वाले किधर गए?
क्या कहता वो उनसे
जो रूके नहीं और निकल गए?

हर तरफ़ है शुभचिन्तक 
हर तरफ़ उमड़ रहा प्यार है
ज़िन्दगी से जो हार गया
हार पा रहा उपहार है

यही हमारी रीत है
यही हमारा रिवाज है
जीते जी जो पसन्द नहीं
मरने पर रोते दहाड़ मार है

आओ रहें हम शांत क्यूँ
हम भी स्टेटस लगाएँगे
दो-चार दिन की बात है
फिर कुत्ते-बिल्ली लगाएँगे 

राहुल उपाध्याय । 15 जून 2020 । सिएटल

Sunday, June 14, 2020

आत्महत्या एक जुर्म है

कितने नादां है लोग
जो आत्महत्या को घिनौना क़रार देते हैं
आत्महत्या एक जुर्म है
कि आड़ में
न जाने क्या-क्या कह जाते हैं

इन्हें 
सहानुभूति क्या होती है
नहीं मालूम

क्या करे कोई इन्सान 
जब हर कोई भाषण
देने को तैयार हो

इतने दुखी क्यों हो?
कौन सा क़हर आ पड़ा है?
मुझे देखो
मैंने कैसे संघर्षों का सामना किया
सर उठा कर जी रहा हूँ
तलाक़ हो गया?
तो किसका नहीं होता है?
शीला को देखो
श्याम को देखो
सब मस्ती से जी रहे हैं
शादी नहीं हो रही?
कितने कुँवारे कितने बड़े-बड़े काम कर रहे हैं
फ़ेल हो गए?
ये लो, अरे मैं खुद नवीं में फ़ेल हुआ हूँ
ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई?
देखो आज मैं कितना ख़ुश हूँ
बंधु! गीता में लिखा है
कर्म किए जा 
फल की इच्छा मत रख
थोड़ा जज़्बा रख
यह क्या कायर और बुज़दिल बना घूम रहा है
मर्द बन
रीढ़ की हड्डी दिखा

कितने नादां हैं लोग
यह भी नहीं जानते 
कि वे मदद नहीं 
एक धक्का और दे रहे हैं
कगार से कूदने पर
विवश होने के लिए

राहुल उपाध्याय । 14 जून 2020 । सिएटल

Sunday, May 31, 2020

न्याय

न्याय यदि कोई एप होता
तो मैं कब का डाउनलोड कर चुका होता
और किसी को न बताता
ताकि किसी और को न मिल सके

किसी को पता लग भी जाता
तो उसे बरगलाता

यह भी कोई एप है?
हज़ारों इसमें ऐब हैं
निहायत ही अंधा है
न बाप 
न बेटा
न माँ 
न बहन
न प्रधान मंत्री
न चपरासी
न अमीर
न ग़रीब 
किसी में कोई फ़र्क़ ही नहीं 
सबको बराबर समझता है
सबको एक ही न्याय
भला ऐसा भी कहीं होता है
किसे चाहिए ऐसा न्याय?

और इसीलिए
आंदोलन होते हैं
होते रहते हैं

सबकी रोज़ी-रोटी चलती है
कोई ख़बर बनता है
कोई ख़बर बनाता है
कोई कविता लिखता है
कोई लेख
कोई फ़ोटो खींचता है
कोई चित्र बनाता है

उस न्याय की तलाश में
जो किसी को नहीं चाहिए

राहुल उपाध्याय । 31 मई 2020 । सिएटल

Friday, May 8, 2020

न खिड़कियाँ खुलतीं न दरवाज़े बन्द होते

दो दिन 
अपने ग़म में ऐसा डूबा
कि पता ही नहीं चला कि
कैसे कुछ लोग पटरी पर सोने के जुर्म में 
ट्रेन से कुचल दिए गए
और कैसे कुछ लोगों के लिए
साँस लेना
जानलेवा साबित हुआ

दुनिया ऐसी ही है
अपनी-अपनी ख़ुशियाँ 
अपने-अपने ग़म 

यदि दुनिया कर्मयोगी होती
तो सब एक होते हैं
सब स्थितप्रज्ञ होते
न ग़म होता न ख़ुशी 

विषमताएँ न होतीं
तो नीरसता ही हाथ आती

हाथ की चारों उँगलियाँ 
और अँगूठा 
एक जैसे होते 
तो न खिड़कियाँ खुलतीं
न दरवाज़े बन्द होते

राहुल उपाध्याय । 8 मई 2020 । सिएटल

Wednesday, April 29, 2020

ऐसा भी कहीं होता है क्या?

मैं सोने जा रहा था
और तुम सो गए चिरनिद्रा में
मेरी नींद उड़ा कर
ऐसा भी कहीं होता है क्या?

अभी दो-चार दिन पहले
तुम्हारी माँ गुज़री
तुम्हारा कोई अता-पता न था
मेरा माथा ठनका था तभी
ऐसा भी कहीं होता है क्या?

और तुम्हारी फिल्म भी तो अभी आई थी
तुम भी हाल ही में ठीक होकर आए थे
कोविड के होते हुए 
कोविड ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा
फिर भी तुम चल दिए
ऐसा भी कहीं होता है क्या?

राहुल उपाध्याय । 29 अप्रैल 2020 । सिएटल

Wednesday, April 22, 2020

तेल का दाम शून्य से कम

तेल का दाम
शून्य से कम?
कई लोग
इसे समझने में
असमर्थ हैं

लेकिन हिन्दी का कवि
इस अर्थव्यवस्था से
भलीभाँति परिचित है

अपने ही पैसों से किताब छपवाना
अपने ही ख़र्चे पर लोकार्पण 
एक नहीं 
कई बार करवाना
चाय पिलाना
समोसा खिलाना
फिर भेंट में हस्ताक्षरित प्रति देना
जो कि पढ़ी तो कभी जाती नहीं है
लेकिन नज़र भी कभी नहीं आती है

यह सब करना
उसे अत्यंत सुख देता है
मानो कविता छपी नहीं 
तो वह सड़ जाएगी

तेल वालों की भी वही दुविधा है
तेल निकलता न रहा
तो मशीन में जंग लग जाएगी
पूरा धंधा चौपट हो जाएगा

सामने वाले के काम न आए
तो वह क्यूँ ले?
बस ऐसे ही
लेने के देने पड़ जाते हैं

कविता लिख दी
और भेजे जा रहे हैं
एक ढीठ की तरह
चाहे सामने वाला
कितना ही मना क्यों न करे

राहुल उपाध्याय । 22 अप्रैल 2020 । सिएटल

Thursday, December 19, 2019

मैं कुछ कहना चाहता हूँ

मैं कुछ कहना चाहता हूँ
लेकिन कहता नहीं 

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ
लेकिन लिखता नहीं 

मैं कुछ भेजना चाहता हूँ
लेकिन भेजता नहीं 

मैं ग़ुलाम हूँ अपने भविष्य का

—:—:—:—:—:—:—:—:

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ

विमान भी है
रोका भी किसी ने नहीं 
धन भी है

करने में फिर भी असमर्थ हूँ
रह जाता हूँ मन मसोस कर
नाक-कान-आँख बंद कर

चादर सर तक ओढ़ कर
हर अख़बार से मुँह मोड़कर
ताले में स्वाभिमान रखकर

हूँ लेकिन नहीं भी

राहुल उपाध्याय  19 दिसम्बर 2019  सिएटल

Thursday, November 14, 2019

मन्दिर तो बन जाएगा

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन जूतों का क्या होगा
जो इधर-उधर बिखरे रहते हैं
लाख हिदायत देने पर भी
सुव्यवस्थित नहीं रखे जाते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन मवेशियों का क्या होगा
जो इधर-उधर मुँह मारते रहते हैं
जिन्हें जो गुड़-रोटी खिलाना चाहते हैं
वे भी डंडे मारने से नहीं चूकते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन फूलों का क्या होगा
जो बाग़ से उजाड़ दिए जाते हैं
कुछ पल पंडित के हाथ लगते ही
नाली में बहने लगते हैं

मन्दिर तो बन जाएगा
पर उन मिठाइयों का क्या होगा
जिनसे मोटापा बढ़ता रहता है
डायबिटीज़ का घाटा होता है
 खाने पर भगवान का प्रकोप बढ़ता है

मन्दिर तो बन जाएगा
पर वैष्णोदेवी-तिरूपति को टक्कर नहीं दे पाएगा
कृष्ण जन्मभूमि अविवादित है
पर कौन वहाँ के मन्दिर की मान्यता के गुण गाता है

मन्दिर तो बन जाएगा
पर मन कहाँ ख़ुश हो पाएगा?

राहुल उपाध्याय  14 नवम्बर 2019  सिएटल