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Tuesday, May 2, 2023

चैट जीपीटी के सिवा दुनिया में रखा क्या है

चैट जीपीटी के सिवा दुनिया में रखा क्या है 
ये बड़े काम करे, इससे ही काम बने
ये भी कर ले, वो भी कर ले, ये सारे काम करे

दिन के अंधेरों में पाए हैं हमने रोशन दिए
अब तक लीं साँसें, इससे मिले तो हम हैं जिए 

हमको ज़माने से, ना ही किसी से मतलब कोई 
ये जो मिली हमको और किसी की तलब ही नहीं 

राहुल उपाध्याय । 2 मई 2023 । सिएटल 

Saturday, May 22, 2021

अब तो है तुमसे हे प्रभु विनती

https://youtu.be/ArVJxtqhuao


अब तो है तुमसे हे प्रभु विनती 

यूँ ही मरना हो ना मेरी नियति


अब बंद करो मुझपे ये ज़ुल्म ढाना

फिर चाहे जो भी करो दूँगा न ताना

चाहे बनाओ रातें लम्बी अब जितनी


तेरे प्यार से भगवन ख़ुश मैं बहुत हूँ 

तेरे द्वार पे रोया भी मैं बहुत हूँ 

देखो कहाँ मैं जाऊँ ले के ये भक्ति 


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 22 मई 2021 । सिएटल 




Friday, May 21, 2021

अब तो है सबसे हर ख़ुशी अपनी

https://youtu.be/YAKStvVV7_M


अब तो है सबसे हर खुशी अपनी

सब पे मरना है ज़िंदगी अपनी


जब हो गया हमपे ये सच नुमायाँ

फिर चाहे जो भी कहे हमको पराया

कोई बिगाड़े बातें चाहे अब जितनी


इस राह में बदनाम कई पहले हो गए

पड़ें लाख छाले मगर रूक ना वो गए

देखो कहाँ ले जाए ये ज़िद अपनी


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 21 मई 2021 । सिएटल 


Thursday, February 4, 2021

हर दिन याद आओगे, तुम जेफ़ बेज़ोस

https://youtu.be/vU6mE8eAH_Y 


हर दिन याद आओगे, तुम जेफ़ बेज़ोस

जग में काम आएगा, अमेज़ॉन हर रोज़

दूजे के हाथों में, देकर अपनी डोर

सपने सुहाने तुम करोगे सच और


अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए

तुमने तो फिर भी फूल लाख खिलाए

हो मार्केट मंदा, हो चौपट कोई धंधा 

तुम तो फ़ौलादी तुम न घबराए

तरम्पम,

वादे जो किए वो कर के रहे हो

बन के रोल मॉडल तुम, हुए बहुत अनमोल


सस्ते में बेची पहले कई किताबें 

बाद में बेच दिए बादल कारे-कारे

ये कमाल की जोड़ी, थी दूर की कौड़ी 

हर तरफ़ था फायदा, कठिनाई भी थोड़ी 

तरम्पम

सर को उठाए तुम लड़े दिन और रात

नैनों से नैना जोड़, दी निशानी छोड़ 


(मजरूह से क्षमायाचना सहित) 

राहुल उपाध्याय । 3 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

Friday, December 18, 2020

अरे वैक्सीन, तुझे हमने

अरे वैक्सीन, तुझे हमने

सब दुखों की दवा माना 

बड़ी भूल हुई, अरे हमने

ये क्या समझा, ये क्या जाना


गुणगान तेरा हर रोज़ सुना

छलते रहे हम सादों को

तू आएगी, सुख लाएगी

रटते रहे इन वादों को

हम सा न हो कोई दीवाना


सोचा न था बढ़ जाएँगी

तनहाइयाँ जब रातों की

दुख और हमें दे जाएँगी 

बातें झूठी नेताओं की

ठोकर लगी तब पहचाना


ऐ काश के होती ख़बर

दुख किसे पहुँचाया है

शीशा नहीं, सागर नहीं

मंदिर-सा इक दिल ढाया है

ता-आसमान है वीराना


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 16 दिसम्बर 2020 । सिएटल 

https://youtu.be/ELGJiLufS5E



Wednesday, November 11, 2020

माना जनाब ने स्वीकारा नहीं


माना जनाब ने स्वीकारा नहीं

तुम्हारा साथ गवारा नहीं

मुफ़्त में बन के, बैठे हो तनके, 

वल्ला जवाब तुम्हारा नहीं


हारे का चलन है गुलामी

लेते हैं चमचों की सलामी

गुस्सा ना कीजिए जाने भी दीजिए

गद्दी तो गद्दी तो दीजिए साहब


छोटा-मोटा कारोबार तुम्हारा

जैसा भी है अब है तुम्हारा

घर जाइए, कारोबार देखिए

दिल्लगी ना दिल्लगी ना कीजिये साहब


माशा अल्ला कहना तो मानो

बन जाए बिगड़ा ज़माना

थोड़ा हँसा दिया, थोड़ा रूला दिया

अलविदा तो अलविदा तो कीजिये साहब


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 9 नवम्बर 2020 । सिएटल

 https://youtu.be/ZK44u-6a1dU 


Thursday, November 5, 2020

लॉयर-वायर कर तू अपने

सुन मेरे बंधु रे, 

सुन मेरे मितवा

सुन मेरे साथी रे


होता तू विजेता, 

मैं होती अमर लता तेरी

तेरे गले माला बन के, 

पड़ी मुसकाती रे


वोट कहे तू अनिश्चित, 

बाकी अभी गिनती 

लॉयर-वायर कर तू अपने, 

देर हुई जाती रे


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2020 । सिएटल


 https://youtu.be/3rLp7TUFJDE 


Thursday, October 29, 2020

तेरी बातों के सिवा

तेरी बातों के सिवा चुनाव में रखा क्या है


तू बके सुबह-सुबह, तू बके शाम ढले

तेरा बकना मेरा पकना यूँही प्रचार चले


क़समों की रस्मों में वादे हज़ारों हैं लिखे हुए

हैं मेरे ख्वाबों के क्या-क्या नगर इनमें ढहते हुए


इनमें मेरे आनेवाले ज़माने की तस्वीर है

सियासत की कालिख से लिखी हुई मेरी तक़दीर है


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 28 अक्टूबर 2020 । सिएटल 

https://youtu.be/y_0Me1vyMnI 

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Monday, May 18, 2020

हमसे का भूल हुई जो यह सज़ा हमका मिली

सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें:

हमसे का भूल हुई जो यह सज़ा हमका मिली
अब तो चारों ही तरफ बंद है दुनिया की गली 

जान किसी की भी न लें हमने बस इतना चाहा 
माँस से दूर रहे दूध से बचना चाहा
उसका बदला ये मिला, उलटी छुरी हम पे चली

हम पे इलज़ाम यह है गाँव क्यों छोड़ दिया
क्यों बर्बादी ही की काहे न कुछ और किया
हमने विकास किया, बदले में बदनामी मिली

अब तो ईमान धरम की कोई कीमत ही नहीं 
जैसे पास आनेवालों की कोई ज़रुरत ही नहीं 
ऐसी दुनिया से तो दुनिया तेरी वीरान भली 

(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 18 मई 2020 । सिएटल

Saturday, May 16, 2020

हाय हाय ये ज़ालिम कोरोना

बढ़ रही मुश्किल 
उस पे नाज़ुक है दिल, 
ये न जाना
हाय हाय ये ज़ालिम कोरोना

जो दिखे भाग लो
बस मेरी मान लो
कह के जाना
हाय हाय ये ज़ालिम कोरोना

जम के हाथों में साबुन लगाकर
नाक, होंठ और नज़रें बचाकर
घर पे ही रह गए
कहते ही रह गए
हम फ़साना
हाय हाय ये ज़ालिम कोरोना

कोई मेरे ये हालात देखे
होते दिल बर्बाद देखे
फूँक न जाए जिगर
कर दिया है ये घर
कैदखाना
हाय हाय ये ज़ालिम कोरोना

(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 14 मई 2020 । सिएटल

Tuesday, February 11, 2020

हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते

हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

सुना योगाभ्यास अच्छा सीखाते हो तुम
बातें भी अच्छी-अच्छी बनाते हो तुम
दिल तो तुम्हारा लगे, बर्फ़ के समाम
तुमपे ऐतबार कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

हिन्दू-मुस्लिम की बात करके जलाते हो दिल
विकास के नाम पे फाड़ा 370 का बिल
क्या क्या जतन करते हो, तुम्हें क्या पता
ये दिल बेवकूफ कितना, ये हम नहीं जानते
मगर जीता नहीं सकते विधान सभा

(मजरूह से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 11 फ़रवरी 2020 । सिएटल

Thursday, November 21, 2013

हमें यू-एस से प्यार कितना

हमें यू-एस से प्यार कितना
ये हम नहीं जानते
मगर जी नहीं सकते डॉलर बिना

सुना खर्च रुपयों में चलाते हैं लोग
जाने ज़िंदगी कैसे बीताते हैं लोग
भारत में जीना तो लगे नरक के समान
इस देश में भेदभाव कितना
ये हम नहीं जानते
मगर जी नहीं सकते डॉलर बिना

चलो माँ-बाप को भी साथ ले आए कहता है दिल
उनका सर्द माहौल में नहीं लगता है दिल
धूप भी यहाँ तो लगे बरफ़ के समान
हमें माँ-बाप से प्यार कितना
ये हम नहीं जानते
मगर जी नहीं सकते डॉलर बिना

(मजरूह से क्षमायाचना सहित)
21 नवम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Sunday, May 5, 2013

न तुम हमें जानो

न तुम हमें जानो
न हम तुम्हें जानें
मगर लगता है कुछ ऐसा
मेरा दुश्मन मिल गया

ये आरोप सच या झूठ है?
किसे खोजने की भूख है?
सुनाने लगे हैं तुम्हें नर्क की सज़ा
जज बन गये हैं सब बदगुमां

देशभक्ति ओड़ के हम
चले लाज छोड़ के हम
कहने लगे हैं तुम्हें ना जाने क्या
चुन-चुन के देते हैं तुम्हें गालियां

(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)
5 मई 2013
सिएटल । 513-341-6798

Thursday, September 27, 2012

तुम बिन जाऊँ कहाँ

तुम बिन जाऊँ कहाँ
कि दुनिया में आके
गया नहीं
कभी कहीं
तुमको त्याग के ...


बढ़े जब दाम पेट्रोल के
लुट गई दुनिया
खाए जब धक्के बसों के
मिट गई खुशियाँ
तुम क्या जानो
कि भटकता फिरा
मैं किस-किस गली
तुमको त्याग के ...


देखो मुझे सर से कदम तक
थुलथुल माँस हूँ मैं
जाना हो दो कदम भी तो
जाता हांफ़ हूँ मैं
तुम क्या जानो
कि सिसकता रहा
मैं किस-किस घड़ी
तुमको त्याग के ...


रह भी सकूँगा मैं कैसे
हो के तुमसे जुदा
धूप, बरसात और 'स्नो' से
कैसे लड़ूँगा भला
आना होगा मुझे तेरी शरण
साथी मेरी
सूनी राह के


(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित - वीडियो)
27 सितम्बर 2012
सिएटल ।
513-341-6798
=====
स्नो = snow

Sunday, October 5, 2008

मेरे भोले-भाले दिल के टुकड़े

मेरे भोले-भाले दिल के टुकड़े
कर दिए उसने कुतर के
लिखूँ मैं कविता
ताकि आप सम्हलें

और रहे उससे बच के

शादीशुदा थी
न शर्म-हया थी
फिर भी समझ न पाया
मुझे क्या हुआ था
इक बेवफ़ा पे
हाए मुझे क्यूँ प्यार आया
कर के बेवफ़ाई
हँसे वो सितमगर
तड़पूँ मैं आहें भर भर के

भाग्य विधाता
क्यूँ है सताता
मन मेरा पूछता हाए
जितना मैं जोड़ूँ
उतना ही टूटे
मन मेरा डूबता जाए
मेरी दुर्दशा की
वजह वो बताए
कर्म हैं पिछले जनम के

मीठा-मीठा बोले
इत-उत डौले
पल पल मुझको लुभाए
मैं सीधा-सादा
फ़ंस गया बेचारा
जाल ही ऐसे फ़ैलाए
सुन न सकोगे
करतूतें सारी
कहने लगूँ जो उन्हें गिन-गिन के

सिएटल,
5 अक्टूबर 2008
(मजरुह से क्षमायाचना सहित)

Thursday, July 17, 2008

हमसे का भूल हुई

हमसे का भूल हुई
जो हमें यातनाएँ मिली

अब तो चारों ही तरफ़
सस्ती कविताएँ मिली

फिर नज़र भी न पड़े
हमने बस इतना चाहा
ब्लॉग से दूर रहे,
ग्रुप से बचना चाहा
इसका फ़ायदा न हुआ
ई-मेल्स से रचनाएँ मिली

हम पे इलज़ाम ये है
बोर को क्यूँ बोर कहा
कविता को बकवास कहा
क्यूँ न कुछ और कहा
उलटा अनपढ़ गँवार
जैसी हमें उपमाएँ मिली

अब तो तुलसी कबीर सा
कोई कवि ही नहीं
जो सच बोल सके
ऐसा कोई भी नहीं
हर महफ़िल में हर तरफ़
झूठी तारीफ़ों की सदाएँ मिली

हमें आप माफ़ करें
आप अपना ब्लॉग लिखें
किसी को ज़ीरो लिखें
किसी को गॉड लिखें
ख़ुदा ही आपकी खैर करे
जो आपको ऐसी भावनाएँ मिली

गलती से हमें अगर
कहीं ख़ुदा दिख जाए
तो पूछूंगा आप भला
ये सब कैसे लिख पाए
जबकि आपको हमारी
लाखों-करोड़ों बद-दुआएँ मिली

सिएटल,
17 जुलाई 2008
(मजरूह से क्षमायाचना सहित)
==================
ब्लॉग = blog
ग्रुप =group
ई-मेल्स = emails
बोर = bore, ऊबाऊ
सदाएँ = गूँज, प्रतिध्वनि, आवाज
ज़ीरो =zero
गॉड =God

Thursday, June 5, 2008

ओबामा-क्लिंटन टिकट

(जब ओबामा-क्लिंटन टिकट मैकेन से हार जाएगा, तब ओबामा कुछ ऐसे विलाप करेंगें)

मेरी भीगी-भीगी सी, पलकों पे रह गए
जैसे मेरे सपने बिखर के
जले मन तेरा भी, बूढ़े इस मैकेन से
हिलेरी, तू भी तरसे
मेरी भीगी ...

तुझे ही हरा के,
तुझे ही मिटा के
क्यूँ मैंने टिकट पे लगाया?
क्यूँ वोट देने के बदले
अमरीका ने
मुझको अंगूठा दिखलाया?
भूले नहीं प्राईमरी की बातें
वोटर अमरीका भर के

जले मन तेरा ...

आग से नाता, नारी से रिश्ता
काहे मन समझ न पाया
मुझे क्या हुआ था, इक बेवफ़ा की
पत्नी को पार्टनर बनाया
मेरी बेवकूफ़ी पे, हँसे जग सारा
गली-गली गुज़रे जिधर से
जले मन तेरा ...

सिएटल,
5 जून 2008
(मजरुह से क्षमायाचना सहित)
==================================
मैकेन = John McCain
हिलेरी = Hillary Clinton

प्राईमरी = Primary

Friday, November 30, 2007

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा
मिलेगी डिग्री, जिस दिन तुम्हें
वो दिन 'यू-एस' में आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा

याद है मुझको तूने कहा था
तुमसे नहीं रुठेंगे कभी
फिर जिस तरह से हम पले हैं
कैसे भला जीएंगे कहीं
तेरी 'कोचिंग' में बीती हर शाम
के तुझे कुछ भी याद नहीं
क्या हुआ ...

ओ कहने वाले मुझको गरीब
कौन गरीब है ये बता
वो जिसने घर लिया उधार के पैसो से
या जिसने 'कैश' में तुझे भेज दिया
नशा दौलत का ऐसा भी क्या
बेवफ़ा ये तुझे याद नहीं
क्या हुआ ...

भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन जिन्दगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा


(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)