कभी मधुर कभी दुभर
रोता बस दुखड़े मगर
कहे जो मरजी वो कर
छोड़ कर मर जी मगर
नीचे न जाऊं चढ़ू उपर
ज़िंदगी एक जीना मगर
पल पल पलती है उमर
पल नहीं जीते हैं मगर
पानी जीवन पानी क़हर
फूल खिले रहते मगर
हर तरफ़ बहती लहर
सब नहीं तरते मगर
भक्त वक़्त से बेख़बर
भजे सवेरे शाम मगर
न मानो तो एक पत्थर
मानो तो एक नींव मगर
रवि के लगाता मैं चक्कर
मानो तो परिक्रमा मगर
सब रवि पर हैं निर्भर
रब नहीं कहते मगर
एक हम हैं एक ईश्वर
हैं अनेक चेहरे मगर
सब की पहचान नश्वर
नाम हैं राजा रंक मगर
हमें-तुम्हे भी होता फ़क्र
हम अलग रहते मगर
देखा जब देखा शहर
देखा नहीं इंसा मगर
शाम गई और निखर
नया था चश्मा मगर
रात रात ही जाग कर
उल्लू सीधे होते मगर
रोज कस के बांधू कमर
मन नहीं बंधता मगर
क्या हकीम क्या डाक्टर
पीर नहीं समझे मगर
हर कोई है चारागर
प्यार से देखे मगर
होता राहुल राज-कुंवर
होता शायर कौन मगर
सिएटल,
6 मार्च 2008
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Glossary
जीना = 1. live life 2. staircase
रहते = 1. continues 2. stays, settles
मगर = 2. but 3. crocodile
शाम = 1. evening 2. Krishna
इंसा = 1. mankind 2. like this one
उल्लू = owl
उल्लू सीधा करना = to get your (and only yours) things done
पीर =पीड़ा, pain
चारागर =care giver
Friday, March 7, 2008
मगर… #3
Posted by Rahul Upadhyaya at 10:35 AM
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Labels: magar-shaala, worship
Tuesday, March 4, 2008
मगर … #2
मेरा घर मेरा मगर
कोई नहीं मेरा मगर
कर लू थोड़ा और सबर
बची नहीं ज़िंदगी मगर
माना जिन्हे हमसफ़र
जाते थे कहीं और मगर
नदी में पड़ते हैं भंवर
जाने किसे बुलाते मगर
गले से मय जाए उतर
नशा क्यूं चड़ जाए मगर?
समय करे सब बराबर
रात दिन बना के मगर
घड़ी के कांटों का अंतर
मिट के भी रहता मगर
पैसा पूजा आठों पहर
मोल नहीं वक़्त का मगर
वादे से जो जाते मुकर
ख़ुद अधूरे होते मगर
चिंता है न किसी का डर
बन गया फ़कीर मगर
सब के सब जाते सुधर
हम तुम न होते मगर
नक़्शा बना एक सुंदर
देश नहीं बनता मगर
अक्स तेरा मेरे अंदर
तू कहाँ रहता मगर?
तेरे-मेरे से हर समर
सब तो है अपना मगर
न वज़न है ना बहर
कहे ग़ज़ल राहुल मगर
सिएटल,
4 मार्च 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 2:11 PM
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Labels: CrowdPleaser, magar-shaala, TG
Monday, March 3, 2008
मगर
मेरा घर मेरा मगर कोई नहीं मेरा मगर आया था मैं जिस डगर जाती नहीं वापस मगर भटका मैं दर-ब-दर नहीं मिली मंज़िल मगर यहीं कहीं जाऊँ ठहर बने कोई मेरा मगर प्यार की चाही नज़र लाखों मिले चेहरे मगर चार दिन का ये सफ़र कभी लगे लम्बा मगर सच हो जाते ख़्वाब अगर मैं नहीं मैं होता मगर होगी कभी सुहानी सहर रात फ़कत सोचा मगर सोचता था जाऊँगा घर पांव नहीं उठते मगर टूटा दिल, गया बिखर फिर हुआ पत्थर मगर क्या हुआ? क्या ख़बर? सच सभी कहते मगर जाने कहाँ कौन किधर? सब यहीं रहते मगर बस रहा मेरे भीतर मुझे नहीं मिलता मगर दुआएं भी करती असर बुत को ख़ुदा माना मगर दे दे अगर कोई ज़हर बंदा नहीं मरता मगर प्रेम नश्वर, प्रेम अमर बयां न होता जो मगर पेट मेरा जाता है भर भूख नहीं मिटती मगर किसे है किस की फ़िकर? हाल सब पूछते मगर हद से गया जो गुज़र चार कंधे पे गया मगर बन जाता मैं भी सदर जुदा होता सब से मगर अंजाम चाहे हो अधर हाथ मिले पहले मगर काम हो तो किस क़दर? दिल करे अगर मगर न वज़न है ना बहर कहे ग़ज़ल राहुल मगर सिएटल, 3 मार्च 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:14 PM
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