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Thursday, March 3, 2016

पहेली #42

न तेरा है
न मेरा है
ये जग रैन बसेरा है
कहाँ-कहाँ नहीं कहा नाना लोगों ने
न कर दादागिरी
न बन दादा किसी का
बोलो किसने कहा कि
जब सेवा का मौका मिले, तू ना न कर!

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इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। उदाहरण के तौर पर 
देखें अन्य पहेलियाँ और उनके हल.

यह रही पहेली 18:

अगर नोट होता ऐसा तो कद्र बिलकुल न करते
अगर नोट निकाले अच्छे तो वाह-वाह करते न थकते

दर्जी अगर काटे तो हुनर उसे है कहते
कोई और अगर काटे तो मर्डर उसे है कहते

जल्दी बूझे जल्दी बूझे समय निकला जा रहा है
इसके बिना तो एक भी निवाला न नि
गला जा रहा है

Monday, December 28, 2009

पहेली 32

उतारे जाते हैं ये
हर रात
सोने के वक़्त
और
वहाँ भी जहाँ
एकत्रित होते हैं
ईश्वर के भक्त

उतरवाए जाते हैं ये
रोज़
ताकि हो सके
सुरक्षा का प्रबंध
और
कभी-कभी
अपने आप ही
उतर जाते हैं ये
जब दिखाई दे जाता है
राजनेता सशक्त

न नशा
न घमंड
न जादू है ये
फिर क्या हैं ये
कि चाहे उड़ें या तैरें
उतारते हैं सब इन्हें आजू-बाजू तेरे

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इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।

उदाहरण के लिए देखें
पहेली 30 और उसका उत्तर

Saturday, August 29, 2009

पहेली 31

खाऊँ जो एक तो हो जाऊँ मैं चित्त
खा लूँ जो तीन तो हो जाऊँ मैं ठीक
खा के जिसे जवां होते शहीद
खाते उसे बच्चे खुशी से खरीद

कैसा ये जादू है? कैसी है ये माया?
समझा वही जो रंगोली देख पाया
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इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।

Saturday, August 22, 2009

पहेली 30

एक अच्छा खासा इंसान
फ़ौरन बन जाए हैवान
मानो मिल जाए माचिस
और जल जाए मकान

पी ले पीलें जाम
हो जाए तबियत हरी
आव देखे न ताव
कह दे बातें खरी

ये कैसा पदार्थ उसने पिया?
कि कोई भी उसे न कहे पिया?
हर कोई कहे रंगीला उसे
न राधा चाहे न शीला उसे
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इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।

उदाहरण के लिए देखें
पहेली 28 और उसका हल।

Wednesday, January 28, 2009

पहेली 28

खिलते हैं फूल
बिखेरते हैं रंग
गाँव-गाँव
गली-गली
उड़ती है पतंग

इसके होते ही शुरू
होता है शरद का अंत
इस पर लिख कर गए
कवि निराला और पंत


मंदबुद्धि मैं
और आप अकलमंद
आप ही सुलझाए
मेरे मन का ये द्वंद

बस के पीछे तो होता है
बस काला धुआँ
फिर इसका नामकरण
क्यों ऐसा हुआ?

व और ब में कभी होता होगा फ़र्क
आज तो भाषा का पूरा बेड़ा है गर्क
गंगा को गङ्गा को लिखने वाले बचे हैं कम
ङ और ञ को कर गई बिंदी हजम

हिंदी और हिंदीभाषी का होगा शीघ्र ही अंत
ऐसी घोषणा कर रहे हैं ज्ञानी-ध्यानी-महंत
ब-नाम से हम-तुम आज पहचानते जिसे
बोलो क्या कहते थे ॠषि व संत उसे?

सिएटल,
28 जनवरी 2009
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इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।
मदद के लिए यहाँ क्लिक करें -
http://mere--words.blogspot.com/2008/02/1.html

Wednesday, April 23, 2008

पहेली 18

अगर नोट होता ऐसा तो कद्र बिलकुल न करते
अगर नोट निकाले अच्छे तो वाह-वाह करते न थकते

दर्जी अगर काटे तो हुनर उसे है कहते
कोई और अगर काटे तो मर्डर उसे है कहते

जल्दी बूझे जल्दी बूझे समय निकला जा रहा है
इसके बिना तो एक भी निवाला न निगला जा रहा है
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. या अन्य पहेलियां
आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com
]

Tuesday, April 22, 2008

पहेली 17

न काम है न क्रोध है
न मद है न लोभ है
कर्मयोग के भक्त हैं
सारी वासनाओं से मुक्त हैं

न धन है न दौलत है
न ज़मीन-जायदाद है
न जात है न पांत है
न कोई वाद-विवाद है

न माया है न मोह है
न किसी से सरोकार है
न स्वामी है न नौकर है
न कोई मोटरकार है
बुझिए तो सही
किसका ज़िक्र इस बार है?

ये भी हाड़-मांस के पुतले हैं और ये भी तो नश्वर हैं
लेकिन मूर्ति-मंदिर आदि बनाकर पूजते नहीं ईश्वर हैं

मनुष्य हर क्षेत्र में स्वयं को मान बैठा प्रवीण है
लेकिन इनकी तुलना में हम और आप क्षीण हैं
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. या अन्य पहेलियां । आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]

Friday, April 18, 2008

पहेली 16

जिससे आनी चाहिए थी खुली हवाएं
वो चंगुल में सारा जहां जकड़ रहा था
इतनी जमा हो गई थी दौलत
कि सब के सामने अकड़ रहा था

इंटरनेट ने जब दी इसे चुनौती
इन्डस्ट्री को एक राहत मिली है
टर्मिनल पेशियंट को जैसे
रामबाण दवा की नवीन डोज़ मिली है
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. या अन्य पहेलियां । आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]

Tuesday, February 12, 2008

पहेली 15


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एवरेस्ट पर ये आज तक चढ़ी नहीं हैं
युद्ध में भी ये आज तक लड़ी नहीं हैं
पहनती भी ये साड़ी-चूड़ी नहीं हैं
दिखने में भी लगती बूढ़ी नहीं हैं

जिस बात से अच्छी खासी शादी टूट जाती है
जिस बात से बसी बसाई गृहस्थी लूट जाती है
उसी बात को इन्होने किया था नज़र-अंदाज़
आखिर क्यूं और क्या था इसका राज़?
क्यूंकि दूर-दृष्टी से इन्होने लिया था काम
इनको तो हर कीमत पर हासिल करना था राज

छीन लेती अगर पति से समर्थन ये अपना
पार्टी का समर्थन बस रह जाता एक सपना

जल्दी दे दे उत्तर जो सही सही है
ये आज यहां तो कल और कहीं हैं
एक जगह कहीं भी ये रुकती नहीं हैं
इन दिनों जब भी नज़र आती हैं तो छवि सब जगह बस यहीं है
मुस्काराती जाए और हाथ हिले, रीत भी तो वैसे बिलकुल यहीं है
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]

पहेली 14


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

500-600 साल से ज्यादा पुराना नहीं
दुनिया में किसी से इसका याराना नहीं

फिर भी यहीं बस जाने के ख्वाब सजाते हैं लोग
सारे जहां के हर कोने में इसके गुण गाते हैं लोग

हज़ार अवगुण गिनाते हैं जो
देर सबेर यहीं बस जाते हैं वो

किन खयालों में आप खो गए जनाब?
जल्दी बताइए इस पहेली का जवाब
कह दे अगर इसका हल आता नहीं
सच कहने से तो मैं घबराता नहीं
यहां आ कर ही पूरे हुए जो कभी देखे थे ख्वाब
जब से मुझे मिली (अ) मेरी कार (ब) मेरी जाँब

[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'. आप चाहे तो इसका हल comments द्वारा यहां लिख दे। या फिर मुझे email कर दे इस पते पर - upadhyaya@yahoo.com ]

Monday, February 11, 2008

पहेली 13


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पहले पीते थे चाय
आजकल हम इसे हैं पीते
Fast food के साथ तो ऐसे जुड़े
जैसे जूते के साथ जुते हो फ़ीते

शांति से बैठ कर सोचिए इस पहेली का हल
वहाँ जहाँ बच्चे इसे पी कर न करे कोलाहल
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'
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पहेली 12


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कुछ कहे जन्मभूमि तो कुछ कहे चरण की धूलि
कुछ कहे तोप तो कुछ कहे ये किस खेत की मूली?
कुछ ने इसे त्यागा तो कुछ इस के लिए चढ़ गए सूली
कुछ इसे बदकिस्मती कहे तो कुछ की छाती जाती है फूली

ये है जननी, ये है माता, गर्व से सारे मुफ़लिस हैं कहते
और रईसजादे इसे समस्या, भार, तकलीफ़, रोग हैं कहते
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Sunday, February 10, 2008

पहेली 11


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ये आ गया एक बार
तो फिर जाता नहीं
ये टूट जाता है
तो फिर जुड़ता नहीं
इसे फेंकते हैं लोग
पर कोई लपकता नहीं

हल्का भी है
और भारी भी
छोटा भी है
और बड़ा भी

हल्के से राहत है
भारी से दु:ख
छोटे से परेशानी है
बड़े से सुख

आए दिन सुनने में आते हैं
इसके दौरे मुझे
पर ठीक से अभी तक नहीं
मिले ब्यौरे मुझे

न किसी से मिला
कोई यात्रा वृत्तांत
न किसी ने दिखाया
कोई 'स्लाईड शो'
भई, ऐसा भी क्या दौरा
जिसका कोई एक फोटो तक न हो?

दौरे के बाद
इतने भयभीत हो जाते हैं लोग
कि सब कुछ छोड़ के
अपनाने लग जाते हैं योग

अकलमंद नहीं मंदअकल समझे जाएगे आप
उत्तर देने में ज्यादा देर यदि लगाएगे आप
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पहेली 10


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

न तो है ये 'चीज़'
और न ही ये खाने की चीज़
फिर भी बच्चे खुश हो के खा लेते हैं इसे
और कुछ बेवकूफ़ ऐसे भी हैं
जो बिन तले ही 'फ़्राई' कर देते हैं इसे

जिनके पास है ये
उन्होनें तो उत्तर भेज दिया हमें
अगर आपके पास भी है
तो अभी तक उत्तर क्यूं नहीं भेजा हमें?
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Saturday, February 9, 2008

पहेली 9


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

ये कटती है पर जुड़ती नहीं
ये चढ़ती है पर उतरती नहीं
ये जमती है पर पिघलती नहीं
ये बहती हैं पर रूकती नहीं

अंदर बाहर एक ही है नाम
कुछ देते हैं इसे घी का नाम
मेरे पहेली ने शायद भर दिया इसमें दम
दूसरों का ज्यादा दिखता है अपना कम
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पहेली 8


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सुबह शाम उभर आती है ज़रुरत
नहीं मिले तो उतर जाती है सूरत
मिलता है हर एक फ़ार्म पर
यहां तक कि 'एप्लिकेशन फ़ार्म' पर
ये सर्वत्र है विराजमान
चाहे हो पोस्ट आँफ़िस या हो दुकान

बूझना है आपका काम
पहेली में ही लिखा नाम
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पहेली 7


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कुछ लेते हैं इसे छोड़ने के लिए
कुछ लेते हैं इसे तोड़ने के लिए

सुबह शाम खाते हैं कच्चा
अगर पूरी हो तो और भी अच्छा
लगता है तुम खा गए गच्चा
अगर अभी तक समझ न पाए बच्चा
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पहेली 6


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

एक है नाम दो हैं रुप
जल्दी बतलाओ क्यूं हो चुप
सवाल सीधा सादा है
कभी नर तो कभी मादा है
नर ही सब को प्यारा है
बूझो किधर इशारा है

नर को सबने हँसते-हँसते गले लगाया है
मादा जिसके हाथ आई, मातम गीत ही गाया है

नर मिले तो मिला पुरुस्कार
मादा मिले तो हुआ तिरस्कार

क्या शादी और क्या है प्यार
जहाँ न हो इसकी बहार
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पहेली 5


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सांभर के साथ इसे पी जाओ बच्चा
अगर पूरी हो तो और भी अच्छा
कुछ लोग खुश हो के पिलाते हैं इसे
देखे हैं कई जो सिर्फ़ निभाते हैं इसे
लगता है तुम खा गए गच्चा
अभी तक अगर समझ न पाए बच्चा
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पहेली 4


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

उसे काली बरसती घटाओं से उतारा गया
गरजते बरसते झरनों से चुराया गया

उसके लिए खाक छानी खानों की
उससे बसती है बस्ती इंसानों की

न चैन मिलता है न नींद आती है
जब जब वो मुझसे दूर चली जाती है
गोया मेरी महबूबा वो हो नहीं सकती
बेगम की दुनिया भी उसी से है चलती

नहीं है वो कोई नौकरानी या झाड़ू पौछा लगाने वाली
वो है सबसे शक्तिशाली, झटके दे दे कर भगाने वाली

और फिर कभी इतनी सीधी कि इशारों पर चलने वाली
और कभी इतनी चंचल कि हाथ तक न आने वाली

दौलत की नहीं है भूखी फिर भी रोज ही है बिकती
है बहुत बेवफ़ा, किसी के साथ नहीं है टिकती

रोशन है आप, आबाद है आप
उसके बिना बिलकुल बर्बाद है आप
रहते नहीं इसमें बिच्छू और साँप
उसका बिल भरते हैं हम और आप

कार नहीं तो बेकार है आप
बस नहीं तो बेबस है आप
और अगर ये भी नहीं तो बेबी जली हैं आप
[इस पहेली का हल अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है। ध्यान से देखे तो साफ़ नज़र आ जाएगा। उदाहरण के तौर पर देखे 'पहेली 1'
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