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Monday, July 27, 2020

क़िस्सा एक फ़ोन का

हमेशा की तरह आज फिर मैं अपनी मम्मी को शाम पाँच बजे पोखर पर घुमाने ले गया। वहाँ कुछ बतखें और कनाडियन गीज़ पानी में अंदर-बाहर होते रहते हैं। मम्मी को यह सब देखना अच्छा लगता है। वे वहाँ रखी कुछ कुर्सियों में से एक पर बैठ कर खूब आनन्द उठातीं हैं। 


मैं तीन तौलिये ले जाता हूँ। दो हथ्थों पर रखता हूँ। एक पर वे बैठ जातीं हैं। महामारी में एहतियात ज़रूरी है। 


मैं पोखर के चक्कर लगाता हूँ। सात बजे तक। एक बार वजन के साथ। दाएँ हाथ में पच्चीस पाउंड। बाएँ में बीस। एक बार बिना वजन के। मुझे डायबीटीज़ है। चलना मेरे लिए लाभदायक है। वजन उठाने से दिल की धड़कन भी बढ़ती है। और हड्डियाँ भी मज़बूत होतीं हैं। 


कुर्सियाँ आठ हैं। अलग-अलग स्थान पर। कहीं दो। कहीं तीन। मम्मी के सिवाय कोई नहीं बैठता है। 


घूमने भी इक्का-दुक्का लोग आते हैं। इतना ख़ूबसूरत नजारा है। कुछ के लिए घर के ठीक सामने है तो कुछ के लिए दो कदम की दूरी पर, जैसे हमारे लिए।  फ़व्वारा भी है। हरे-भरे पेड़ हैं। लेकिन सब या तो पचास-साठ मील दूर पहाड़ों में गए होंगे। या फिर नेटफ्लिक्स पर कुछ देख रहे होंगे। मम्मी और मैं भी लॉकडाऊन से पहले मंदिर ही जाते थे। यहाँ कभी-कभार शनिवार की दोपहर आ जाते थे। अब तो रोज़ आते हैं। 


जो भी लोग मिलते हैं उनसे औपचारिक अभिवादन होता है। बाद में कहीं मिलें तो पता भी नहीं चले कि पहले कहीं देखा है।  नाम पूछना-बताना तो बहुत दूर की बात है। 


आज एक तीस-बत्तीस वर्ष का युवक एक कुर्सी पर बैठा लेपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा तक नहीं। सो हैलो-हाय भी नहीं हुई। 


दो-चार फेरों के बाद मैंने देखा कि कुर्सी ख़ाली है। पास से गुज़रा तो देखा उसका फ़ोन कुर्सी पर ही छूट गया था। 


सोचा उसे जल्दी ही अहसास हो जाएगा और वो वापस आकर ले जाएगा। आजकल फ़ोन के बिना एक पल का जीना भी मुश्किल हो जाता है। 


कई फेरे हो गए। कोई लेने नहीं आया। मम्मी को बहुत चिंता होने लगी। मैंने समझाया आप क्यों फ़िक्र कर रहीं हैं? उसका फ़ोन है। वो जाने और उसका काम। आप न परेशान हों। 


मुझे लगा यदि उसे याद नहीं उसने फ़ोन कहाँ छोड़ा है तो वो किसी दूसरे के फ़ोन से इसे कॉल करेगा और मैं उसे उठा लूँगा और उससे बात करके उसे दे दूँगा। इस अपार्टमेंट काम्प्लेक्स के ज़्यादातर निवासी या तो शादीशुदा हैं या किसी रूममेट के साथ रहते हैं। 


कोई घंटी नहीं बजी। 


मम्मी ने कहाँ देख तो सही उस पर उसका नाम लिखा होगा। मैंने अपने फ़ोन पर लॉक स्क्रीन पर मेरा नाम, फ़ोटो और ऑफिस का नम्बर लगा रखा है ताकि जिस भले आदमी को मिले, कम से कम उसे लौटने में आसानी तो हो। ऑफिस के नम्बर पर कोई फ़ोन आता है तो वह लैपटॉप पर बज जाता है। न उठाओ तो मैसेज भी छोड़ा जा सकता है। सारी जानकारी ईमेल पर आ जाती है। 


मैंने देखा। लॉकस्क्रीन पर एक तीन-चार माह के बच्चे की फ़ोटो थी। अनलॉक करने के लिए अंगूठे के निशान या पासकोड माँग रहा था। इमरजेंसी नम्बर भी सेटअप नहीं किया हुआ था जिसे फ़ोन किया जा सके। 


ग़नीमत से न पढ़ें हुए टेक्स्ट मेसेज लॉकस्क्रीन पर पढ़ें जा सकते हैं। किसी का टेक्स्ट पढ़ना उचित नहीं है। लेकिन यहाँ कोई तो जानकारी हासिल करनी थी। सो मैंने देखा एक किसी मुग्धा का टेक्स्ट था। मुझे याद आया कि पास के ही किसी एक अपार्टमेंट के दरवाज़े पर दो नाम लिखे थे: कमल-मुग्धा। 


आमतौर पर यहाँ अमेरिका में घर के बाहर नाम की तख्ती लगाने का प्रचलन नहीं है। सब गोपनीयता बरतना चाहते हैं। लेकिन क़िस्मत से इन्होंने तख्ती लगा रखी थी। आमतौर पर मैं पढ़ता नहीं। लेकिन मम्मी चूँकि वॉकर के साथ धीरे-धीरे चलतीं हैं सो मेरी नज़र पढ़ गई थी। 


मैंने उनका दरवाज़ा खटखटाया। कमल ने खोला। उसकी गोद में तीन-चार माह का बच्चा था।  मैंने कहा कि आप अपना फ़ोन भूल गए थे। उसने लिया, धन्यवाद बोला और दरवाज़ा बन्द कर दिया। 


(कमल-मुग्धा असली नाम नहीं हैं। घटना सच्ची है।)

राहुल उपाध्याय । 26 जुलाई 2020 । सिएटल 


Monday, September 23, 2013

गणेश चतुर थी!


 
गणेश चतुर थी! गणेश चतुर थी!
 
सुन-सुन के कान पक गए. अरे भई, कोई तो हो जो सही हिंदी बोले. मैं यह नहीं कह रहा कि शुद्ध हिंदी बोले - पर कम से कम सही हिंदी तो बोले. आजकल कोई भी सही हिंदी नहीं बोलता. बम्बई/मुम्बईवालों से तो उम्मीद ही छोड़ दी है.
मेरे को अभी काम पे जाना है. अपुन के पास खाली-पीली बोम मारने वास्ते टाईम नहीं है. उधर चमन भाई का भाई खल्लास हो गएला है तो अभीच जाना मांगता है.
 
लेकिन ये सारे हिंदुस्तान को क्या हो गया? क्या चेन्नई एक्स्प्रेस की हवा लग गई है जो सब के सब मीनम्मा जैसी बातें करने लगे हैं? मेरा बाप मेरे को डराती. इन गुण्डों को पीचे लगाती. चलो हम गर से बाग जाए.
 
जबकि सच पूछिए तो हमारी हिंदी फ़िल्मों की वजह से ही हिंदी आज फल-फूल रही है. यही तो एक मात्र मनोरंजन का साधन है. (वरना रोजी-रोटी के चक्कर में अंग्रेज़ी कब की हिंदी को खा गई होती.) चाहे एन-आर-आई हो या विशुद्ध  देसी. बिना हिंदी फ़िल्म के किसी को खाना नहीं पचता. ये अलग बात है कि हिंदी फ़िल्मों के कर्णधारों का देवनागरी से दूर-दूर का वास्ता नहीं है. आजकल के स्टार-पुत्र-पुत्रियाँ तो रोमन से काम चलाते हैं ही, यहाँ तक कि हिंदी-प्रेमियों के चहेते गुलज़ार और जावेद अख़्तर साहब तक देवनागरी का क-ख-ग नहीं लिख पाते हैं. उर्दू के अलिफ़-बे-पे से काम चलाते आ रहे हैं और चलाते रहेंगे. और विडम्बना देखिए कि गुलज़ार साहब को हमने विश्व-हिंदी सम्मेलन का अध्यक्ष बना दिया था. वाह री हिंदी. बढ़ी उदार-दिल है, क्या करें!
 
लेकिन ये लम्बोदर के साथ मसखरी कुछ समझ नहीं आई. गणेश जी चतुर थे, यह कहना चाहिए. न कि गणेश चतुर थी. मुझे तो कोई एसा प्रसंग याद नहीं आता जब कि गणेश जी ने नारी रूप धारण किया हो या अपने पिताजी जैसा अर्धनारीश्वर जैसा कोई रूप भी रचा हो. तो फिर ये गणेश हैं कौन? कोई अभिनेत्री? कोई नेत्री? कोई सेलेब्रेटी? किसी महिला का नाम आज तक गणेश न सुना है न पढ़ा है. कोई गणेश कुमारी, कोई गणेश देवी, कोई गणेश कौर कहीं नहीं देखी. गुगल-बिंग सब छान मारा. फ़ेसबुक-ट्वीटर भी देख लिया.
 
गणेश जी हमेशा से शिव-पार्वती के सुपुत्र माने जाते रहे हैं और इस बात में भी कतई संदेह नहीं है कि वे चतुर थे. एक बार भगवान शिव ने अपने पुत्रों - गणेश जी एवं कार्तिक - से कहा कि जो सबसे पहले ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगा कर आएगा उसे पुरुस्कार दिया जाएगा. गणेश जी ने सोचा मेरे पिता ही मेरा ब्रह्माण्ड है सो उन्होंने झटपट भगवान शिव की परिक्रमा लगाई और बाजी जीत गए.
 
तब एक महानुभाव मिले. कहने लगे - "मसखरी तो मियां तुम कर रहे हो. थोड़ी देर बैठकर जो कह रहा है उससे लिखवा कर देखो, जब आप पढ़ोगे तो खुद ही समझ जाओगे कि माजरा क्या है."
 
हमने कहा तो भाई साहब आप ही लिख दीजिए. पढ़कर तो मेरे हाथों के तोते उड़ गए. अरे हिंदी में भी ऐसा होता है. कि पढ़ो कुछ और बोलो कुछ. या लिखो कुछ और पढ़ो कुछ? या बोलो कुछ और पढ़ो कुछ? मैं तो सोचता था कि ये समस्या अंग्रेज़ी वालो की है. देवनागरी में तो ऐसा कोई लफ़ड़ा नहीं है. रोमन में आप हर्श लिखे तो कोई उसे हर्ष भी पढ़ सकता है तो कोई अंग्रेज़ी का शब्द harsh भी. minute को भी दो तरीके से पढ़ा जा सकता है मिनट और माईन्यूट. लेकिन ये दुविधा हिंदी में पहली बार सामने आई है.
 
फिर मेरे छोटे बेटे ने मुझे बताया कि जी नहीं, एक बार नहीं कई बार ये समस्या आई है उसके सामने. वो हर रविवार को गुरुकुल जाता है हिंदी सीखने-लिखने-पढ़ने के लिए. जब भी मैडम डिक्टेशन करवाती है बड़ी समस्या होती है. कहती है रीतु लिखो - अब वो क्या लिखे? रीतू या ऋतु? क्योंकि बोलने/सुनने में तो दोनों में कोई फ़र्क नहीं है. सोमवार या सोम्वार? मंगलवार या मंगल्वार? जनवरी या जन्वरी? चलचित्र या चल्चित्र? कोलकाता या कोल्काता? चमचा या चम्चा? रसगुल्ला या रस्गुल्ला? धरमेन्द्र या धर्मेन्द्र? मूलचंद या मूलचंद या मुल्चंद या मुलचंद? सल्मान या सलमान? धर्ती या धरती?
 
उपर से लिंग की बड़ी समस्या है. मैंने कहा, "बेटा, एक ही विषय पर टिक. अभी बात गणेश जी की चल रही है और तू शिवलिंग को बीच में ला रहा है." उसने कहा - "शिवलिंग नहीं पापा, मैं बात कर रहा  हूँ जेंडर की. लिंग भेद की. पुलिंग-स्त्रीलिंग की.  अब आप बताईए कि केक कटती है कि कटता है? फ़्रिज खुला है कि फ़्रिज खुली है? जब अलमारी खुल सकती है तो फ़्रिज क्यों नहीं खुल सकता? और दही बन गया या दही बन गई? जब आईस-क्रीम गिर सकती है तो बिस्किट क्यों नहीं गिर सकती? रचना पढ़ी या रचना पढ़ा? मेहनत बच गई या मेहनत बच गया?"
 
मैंने कहा, "बेटा, बात तो पते की कर रहे हो. मैं पता लगाने की कोशिश करता हूँ कि लिंग तय करने का कोई नियम भी है या नहीं."
 
जाते-जाते बेटे ने एक और सवाल कर डाला. "पापा, ये कैसा त्योहार है - जिसमें सब लोग कहते है - नाग पंच मी - यानी आ नाग मुझे मार?"

Saturday, September 14, 2013

शुद्ध हिंदी - एक आईने में

यह लेख मैंने 2007 में लिखा था. आज हिंदी दिवस को सुर्खियों में पढ़कर मुझे यह याद आ गया तो सोचा आपसे साझा कर लूँ.
 
सद्भाव सहित,
राहुल

जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियां नज़र आई ना
 
काश ये दो पंक्तियां किसी महानुभाव ने कहीं होती। आपका दुर्भाग्य है कि ये मैंने लिखी हैं। ये मेरे उस प्रयास का परिणाम है जिसमें दूसरी पंक्ति के आखरी के शब्द पहली पंक्ति के आखरी शब्द ही होते हैं। एक हल्का सा अंतर होता है। वो यह कि या तो वो संधि द्वारा बनाए जाते है या फिर संधि विच्छेद द्वारा।
 
चूंकि ये मेरी पंक्तियां हैं। तो ज़ाहिर है हर कोई इस पर अपनी टिप्पणी करता है। आप इतने निराशावादी क्यूं हैं? ये क्यूं नहीं कहते कि
 
 जब तक देखा नहीं आईना
 अपनी खूबियां नज़र आई ना
 
कहना उनका सही है। ग्लास को आधा खाली कहने के बजाय आधा भरा भी कहा जा सकता है।
 
आईना बहुत उपयोगी वस्तु है। इसका उपयोग रोज हर जाति, सम्प्रदाय, और देश में समान रुप से किया जाता है। ये बहुत ही सस्ते दामों पर सबको उपलब्ध है। चाहे कोई सुबह उठ कर अपने ईष्ट देव को स्मरण करे न करे, आईने के दर्शन जरूर करता है। स्त्री, पुरुष, बच्चे, और बूढ़े सब देखते हैं कि वे कितने सुंदर हैं और क्या सुधार किया जा सकता है ताकि वे और सुंदर दिखें। लोग उन्हें देखें तो प्रसन्न हो।
 
एक और आयाम नज़र आता है आईने का। वो यह कि आईने से मनोरंजन भी होता है। गाँव के मेले में अक्सर एक खेमा ऐसा जरूर होता है जिसमें कई तरह के आईने होते हैं जिनमे इंसान बारी बारी से कभी मोटा तो कभी पतला, कभी लम्बा तो कभी छोटा नज़र आता है।
 
और आईना प्रयोगशाला में एक उपकरण के रूप में भी काम आता है। इस को ले कर प्रकाश के नियम और गुण आदि के बारे में प्रयोग किये जाते हैं।
 
आईना बच्चों का खिलोना भी है। वे इससे आलोकित दायरे को दीवार और छत पर घुमाते रहते हैं और उनका कौतूहल कम होने का नाम नहीं लेता।
 
आईना सपाट होता है और स्वभाव से अत्यंत शीतल। जो छवि दिखाता है वह सच्चाई के बिल्कुल विपरीत होती है और फिर भी कोई इसे दोषी नहीं ठहराता। सब स्वयं ही इसका आशय जान लेते हैं और इसे धन्यवाद देते हैं।
 
इन सब को ध्यान में रखते हुए, मैंने इस स्तम्भ का नाम आईना रखा है। कभी मनोरंजन करेगा तो कभी खूबीयां दिखाएगा तो कभी खामियां।
 
मुझे कविता लिखने की प्रेरणा कबीर के दोहों से मिली। मेरा मानना है कि उन के जैसा गागर में सागर भरने वाला और कोई नहीं। हास्य, व्यंग्य और दर्शन में वे पारंगत थे। उनका ये दोहा मुझे खास तौर से पसंद है -
 
रंगी को नारंगी कहे, बने दूध को खोया
 चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया।
 
सुना तो इसे आपने कई बार होगा। ये एक हिंदी फ़िल्म के गीत के शुरूआत में भी गाया गया है। इसे समझने के लिए इसे कई बार पढ़ना होगा। तीनों तथ्य एक से बड़ कर एक विडम्बना को उजागर करते हैं। नारंगी एक बेहद रंगीन फ़ल है और उसे दुनिया ने नारंगी का नाम दे दिया। जब दूध का खोया बना लिया जाता है तो वो आपके सामने है और दुनिया उसे कहती है खोया। जो वाहन है, चलायमान है उसे दुनिया कहती है गाड़ी! गाड़ी तो लकड़ी जाती है, गाड़े तो मुर्दे जाते हैं। गाड़ी का मतलब जो एक जगह पर अटक जाए। जो वहां से हिल न सके।
 
मुझे भी शब्दों से खेलना बहुत अच्छा लगता है। हर कविता में कुछ न कुछ शब्द आ ही जाते हैं जिनके दो अर्थ हो। ऐसी कविताएं फिर मैं blog पर प्रकाशित कर देता हूं और मित्रों को भेज देता हूं। पिछले एक साल से सिएटल शहर में हर महीने के चौथे शनिवार मैं अपने घर एक काव्यगोष्ठी का आयोजन करता हूं। इसमें इस शहर में रहने वाले और कविता लिखने वाले या इसमें रचि रखने वाले सम्मिलित होते हैं। पिछले हफ़्ते मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में गया था। वहाँ मेरा परिचय देते हुए कहा गया कि ये हर महीने नियमित रुप से गोष्ठी का आयोजन कर के हिंदी की सेवा कर रहे हैं। तो मेरे मन में तुरंत एक वाक्य कौंध गया - 'मैं मासिक धर्म निभा रहा हूं।' मैं सोचता रहा कि अगर मासिक धर्म लगातार चलता रहे और कभी ये क्रम टूटे नहीं तो सृजन कैसे होगा? और फिर मेरा शब्दो से खेल शुरु हो गया जो दूसरे दिन जा के रुका जब 'जन्म' कविता पूरी हो गई। ये एक संयोग ही था कि वो मेरा जन्म दिन भी था।
 
जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
 यह एक सर्वविदित सत्य है
 
 कभी झुठलाया गया
 तो कभी नकारा गया
 हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया
 
 कभी शिष्टता के नाते
 तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
 क्या करेंगे इसे जान के?'
 
सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
 रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो
 
 बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
 और बच्चों की तरह हम रुठ गए
 जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
 और दुनिया से विश्वास उठ गया
 
 ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
 ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
 ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
 ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं
 
 एक बात समझ में आ गई
 तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
 घुस गए 'लैब' में
 शांत करने अपनी क्षुदा
 
 हर वस्तु की नाप तौल करे
 न कर सके तो मखौल करे
 
 वेदों को झुठलाते है हम
 ईश्वर को नकारते है हम
 तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम
 
 ईश्वर सामने आता नहीं
 हमें कुछ समझाता नहीं
 कभी शिष्टता के नाते
 तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
 क्या करेंगे इसे जान के?'
 
बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
 इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है
 
इस कविता को बहुतों ने पसंद किया। और नहीं भी किया तो कम से कम जन्मदिन की बधाईयां तो जरुर भेजी गईं।
 
पर दो नई बातें भी सुनने में आईं। एक तो ये कि ज्यादातर लोग खुश थे कि इस कविता में वेदो और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। दूसरा ये कि इसमें ज्यादातर शब्द हिंदी के थे। उर्दू के इक्का-दुक्का शब्द थे। मुझे सलाह दी गई कि आप हिंदी को भ्रष्ट होने से बचा ले। अगर ख़ुदा को कविता से जुदा कर दिया जाए तो अच्छा होगा।
 
सामान्यत: मैं अपने आप को कविता तक ही सीमित रखता हूं। कविता के अलावा कुछ नहीं कहता। और न ही कविता की सफ़ाई देता हूं। पर चूंकि अब मंच सामने हैं तो कुछ कहना चाहूंगा। मैं रतलाम में और रतलाम जिले के गाँव और तहसील - शिवगढ़ और सैलाना - में पला हूं। वहां पर हम मालवी या साधारण हिंदी बोलते थे। नई दुनिया एक मात्र अखबार था। उसे देने अखबार वाला आता था। अखबार का बिल आता था हर महीने। मेरे नाना गाँधीवादी थे और प्राथमिक विद्यालय चलाते थे जिसे लोग त्रिवेदी प्राईवेट स्कूल के नाम से जानते थे। देखिये, बिना अंग्रेज़ी और उर्दू के इतनी छोटी सी बात भी पूरी नहीं की जा सकी।
 
एक और उदाहरण। आप जाइये एक दूर-दराज के गाँव में जहाँ एक अधेड़ उम्र की माँ है जो कड़ी मेहनत कर के अपना घर चलाती है। उस के पास वक्त नहीं है कि वो या उसकी भाषा राजनीति से या फ़िल्मी दुनिया से या टीवी से प्रभावित हो। उससे आप कहिये कि - 'माई, तेरे बेटे के नम्बर अच्छे नहीं आए है इसलिए वो फ़ैल हो गया है। तू उसकी कोई अच्छी सी ट्यूशन लगा दे। हो सकता है वो अगली बार पास हो जाए।'
 
अब आप यहीं बात कह कर देखे बिना नम्बर, फ़ैल, ट्यूशन और पास के। बहुत मुश्किल है। और आप अगर शव्दकोश की सहायता से कह भी दे तो मैं नहीं समझता कि वो माँ उस बात को समझ पाएगी।
 
क्या फ़ायदा हैं इस तरह से हिंदी को संकीर्ण बनाए रखने की? आग भी उतना ही ठीक शब्द है जितना कि अग्नि। मुझे समझ नहीं आता है कि क्यूं कुछ लोग बात बात पर हिंदी का झंडा फ़हराने से बाज नहीं आते? खुद तो अंग्रेज़ी पढ़ लिख कर आगे निकल लिए। अब चाहते हैं कि बाकी लोग पीछे ही रहे तो बेहतर है। एक सज्जन तो यहाँ तक लिख बैठे कि 'हिंदी केवल गांव और गरीबों तक सीमित रह गई है। जैसे जैसे गरीबी हटती जाएगी, वैसे वैसे हिंदी मरती जाएगी।'
 
मेरे लिए ये एक सुखद घटना होगी। गरीबी हटाने का प्रयत्न कई वर्षो से किया जा रहा है। अगर हम इसमें सफ़ल हो गए तो ये एक हर्ष का विषय है। मातम मनाने का नहीं। रही बात हिंदी के मरने की। वो ऐसे तो मरने वाली है नही। और अगर मर भी गई तो कोई गम नहीं। मैं हमेशा से इस पक्ष में हूं कि इंसान बेकार में ही बटा हुआ है जाति में, प्रांत में, राज्य में, देश में, भाषा में, धर्म में। क्या ही अच्छा हो जब सारी सीमाएं हट जाए और हम सब आज़ादी से जहाँ जाना चाहे, जा सके। न पासपोर्ट की आवश्यकता हो और न हीं किसी दूसरी भाषा को जानने की ज़रुरत।
 
दूसरी बात भाषा भ्रष्ट होने की। नए शब्द जोड़ने से भाषा बलवान होती है, भ्रष्ट नहीं। शुद्धता सिर्फ़ शुद्धता की वजह से नही होनी चाहिए। प्राय: सारी शुद्ध वस्तुएं इतनी उपयोगी नहीं होती है जितनी कि मिलावट के बाद। 100% शुद्ध लोहा किसी काम का नहीं होता है। उसमें मिलावट कर के स्टील बनाया जाता है। 100% खरे सोने से भी आभूषण नहीं बनाए जा सकते हैं जब तक कि मिलावट न हो।
 


Wednesday, September 17, 2008

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग

गौड़सन्स टाईम्स के एक लेख में, केंद्रीय हिंदी समिति के सदस्य, राहुल देव लिखते हैं:
"राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश है कि अंग्रेज़ी को पहली कक्षा से पढ़ाया जाए और तीसरी से दूसरे विषयों की पढ़ाई का माध्यम बनाया जाए। वह यह भी कहता है कि कक्षा और विद्यालय के बाहर भी अंग्रेज़ी सीखने के लिए प्रेरक, उपयुक्त माहौल बनाया जाए। हर कक्षा में इसके लिए पुस्तकें, मल्टीमीडिया उपकरण रखे जाएं, अंग्रेज़ी क्लब बनाए जाएं। देश के 40 लाख शिक्षकों को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएं। छ: लाख नए अंग्रेज़ी शिक्षक तैयार किए जाएं। "

राहुल देव पूछते हैं कि जब "ज्ञान आयोग स्वयं मानता है कि अंग्रेज़ी जो प्रथम भाषा के रुप में प्रयोग करने वाले एक प्रतिशत हैं। बाकी 99 प्रतिशत को अंग्रेज़ी दक्ष बनाने में कितना धन लगेगा? क्या यह संभव है जबकि एक प्रतिशत की भाषा बनने में अंग्रेज़ी को 175 साल लग गए?"

लेकिन साथ ही यह शिकायत भी करते हैं कि -
"सारे समाज में अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के बीच शक्ति और प्रतिष्ठा का जो संतुलन है उसे देखते हुए अगर पहली कक्षा से छात्रों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाया गया तो क्या वे अपनी भाषाओं को वैसी ही इज़्ज़त दे पाएंगे? आज ही से शुरु से अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ने जीने वाले बच्चे भारतीय भाषाओं का कैसा प्रयोग करते हैं, कितना महत्व देते हैं, अपनी परंपराओं, विरासत, सांस्कृति जड़ों से कितना जुड़े हैं, यह सबके सामने हैं।"

यह तो ऐसे हुआ कि जैसे चित भी मेरी पट भी मेरी! अगर अंग्रेज़ी 175 साल बाद सिर्फ़ एक प्रतिशत लोगो की प्रथम भाषा बन पाई हो तो फिर अंग्रेज़ी के खिलाफ़ इतना शोर शराबा क्यों?


मैं केंद्रीय विद्यालय का विद्यार्थी रहा हूँ, जहाँ आमतौर पर सारे विषय अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। जो छात्र सामाजिक अध्ययन हिंदी में पढ़ना चाहते हैं, वे हिंदी में पढ़ सकते हैं। लेकिन गणित और विज्ञान अंग्रेज़ी में ही पढ़ाए जाते हैं। इसे आप गरीब सरकारी कर्मचारियों का कान्वेंट स्कूल कह सकते हैं। प्राय: सारे छात्र अंग्रेज़ी में ही सारे विषय पढ़ते थे। साथ में हिंदी भी और संस्कृत भी। एक मैं ही अकेला था जिसने सामाजिक अध्ययन हिंदी में लेना तय किया। क्यों? क्योंकि मैं केंद्रीय विद्यालय में कक्षा आठ में दाखिल हुआ था। मेरी प्राथमिक शिक्षा मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में हुई थी। वहाँ, कक्षा छ: तक अंग्रेज़ी का एक अक्षर नहीं पढ़ाया जाता था। इस वजह से मेरी अंग्रेज़ी काफ़ी कमज़ोर थी।

सच तो यह है कि अंग्रेज़ी की बदौलत ही अच्छी नौकरी मिलती है, अच्छा वेतन मिलता है, उपर उठने के अवसर मिलते हैं। आज कम्प्यूटर पर, इंटरनेट पर यूनिकोड के सहारे हिंदी लिखना और पढ़ना आसान है, लेकिन फिर भी बिना अंग्रेज़ी के आप लंगड़ा कर ही चल सकते हैं। प्रोद्योगिकी, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विज्ञान, विधि के क्षेत्र में अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है।

आज हर परिवार जो इस काबिल है कि वो अपने बच्चों को अंग्रेज़ी में शिक्षा दिला सके, दिला रहा है। इसका मतलब साफ़ है कि जो गरीब है, जिनके पास साधन नहीं है, उनके बच्चे अंग्रेज़ी शिक्षा के अभाव में और गरीब होते जा रहे हैं; और ये क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि सरकार हस्तक्षेप न करे और हर जनसाधारण को शिक्षा का समान अवसर न दे। ज्ञान आयोग की सिफ़ारिश के मुताबिक अब हर सरकारी स्कूल केंद्रीय विद्यालय की पद्धति पर चलेगा। ये एक हर्ष का विषय है। केंद्रीय विद्यालय के कई विद्यार्थियों से मेरी मुलाकात होती रहती है और वे सब अपनी संस्कृति से उतने ही जुड़े हैं जितने कि अन्य भारतीय।

राहुल देव का एक सुझाव यह भी है कि
"सारा देश अगर अपनी भाषाओं को छोड़ कर वैश्वीकृत होने, महाशक्ति बनने, आर्थिक प्रगति के एकमात्र माध्यम के रुप में अंग्रेज़ी को अपनाने के लिए तैयार है तो एक जनमत संग्रह करा लिया जाए और अगर बहुमत अंग्रेज़ी के पक्ष में हो तो उसे ही राष्ट्रभाषा, राजभाषा, शिक्षा का प्रथम माध्यम बना दिया जाए।"

अच्छा सुझाव है। एक जनमत कश्मीर में भी हुआ था। आज तक उसको भुगत रहे हैं।

जनमत के बजाय आप स्वयं जाकर देख ले कि अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों के आगे दाखिले के लिए कितनी लम्बी कतार है। सब समझ में आ जाएगा। ये तब जबकि इन स्कूलों की बहुत महंगी फ़ीस होती है।

इससे पहले कि आप ज्ञान आयोग की सिफ़ारिशो का विरोध करें, अंग्रेज़ी हटाओ के नारे लगाए, मेरा एक निवेदन है। पहले आप अंग्रेज़ी भूल कर दिखाए। कोशिश कर के देखें कि आप कितने दिन बिना अंग्रेज़ी के रह सकते हैं। सिर्फ़ बिना बोले ही नहीं - बिना समझे, बिना लिखें, बिना पढ़े, बिना सुने।

सिएटल,
17 सितम्बर 2008

Sunday, July 27, 2008

क़हर - एक बार फिर

[http://groups.yahoo.com/group/HINDI-BHARAT/message/1045] ये मसला भी आजकल का नहीं है। जब अंग्रेज़ नहीं थे, जब मुसलमान नहीं थे, ईसाई धर्म नहीं था, ईस्लाम धर्म नहीं था, अंग्रेज़ी नहीं थी, उर्दू नहीं थी, तब भी इस तरह के झगड़े-विवाद आम थे। कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत के युद्ध के लिए आप इन में से किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। तो ये मानना बेकार है कि कल से अगर ये दोनो धर्म, इनके अनुयायी और इनकी भाषा विलुप्त हो जाए तो सारे विवाद खत्म हो जाएंगे। इसलिए कई बार तो दिल कहता है कि जो भोंकते हैं उन्हें भोंकने दो। क्या फ़ायदा इनके मुँह लगने से। लेकिन क्या किया जाए। मेरा भी मन नहीं माना। मैंने एक लेख लिखा था 'गर्भनाल' में। तब भी कविता वाचक्नवी जी ने उसका जवाब दिया था अपने ब्लाग पर। लेकिन वो जवाब 'गर्भनाल' में नहीं आया। न जाने क्यों? जैसा कि मैं पहले भी अन्य लेख में लिख चुका हूँ - मुझे हिंदी लिखने का अभ्यास नहीं है। कविता एक आसान तरीका है - कम शब्द होते हैं, अधूरे वाक्य होते हैं और व्याकरण की थोड़ी-बहुत छूट होती है - इसलिए लिख लेता हूँ। लेकिन देर आए दुरुस्त आए। बहस का मौका आया है तो हिंदी में गद्य लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। और वैसे भी हिंदी में तर्क-वितर्क का अपना ही मजा है। जिस सरकार की, जिस सोनिया गाँधी की ये भर्त्सना करते हैं, अगर अगले प्रवासी दिवस पर यही सरकार और यही सोनिया जी इन्हें पुरुस्कार प्रदान करें तो ये उनके सामने सर झुकाएंगे और अपने घर में उनके साथ लिया हुआ फोटो शान से सजाएंगे। जब भी कोई ऐसी दु:खद घटना होती है जिसमें आतंकवाद का अंदेशा हो तो इनकी बांछे खिल आती है। लोहा गरम है। अभी चोट मारो। निकालो सारी ज़हर वाली बातें। आज के दिन तो सब सुनेंगे। औरंगज़ेब को मरे हुए कई वर्ष हो गए हैं लेकिन आज हम उसे फिर से ज़िंदा करेंगे। सब का खून खौला कर रहेंगे। 60 साल पहले हुए विभाजन की एक एक दर्दनाक दास्तां को हम दोहरा कर रहेंगे। अगले 3 महीने तक अगर कोई विस्फोट न हो और हो भी तो 10 से कम मृत हो तो इनको मवाल होगा कि क्या बात है - ये शांति किसलिए? अब कैसे हम अपनी बात आगे बढ़ाएं। एक दूसरे के प्रति बैर स्वाभाविक है। भाई-भाई में दुश्मनी होती है। अड़ोसी-पड़ोसी में अनबन होती है। लेकिन इन बातो को बड़े पैमाने पर हवा देना और भुनाना एक घिनौना कृत्य है। हम अपनी संस्कृति में पैदा होते हैं, वो हमें विरासत में मिलती है। उसे हम चुन कर नहीं अपनाते हैं। हम क्या बोलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं, किसे पूजते हैं, ये सब हम तराजू के पलड़ों में तोल कर नहीं तय करते हैं। चूंकि घर में सब हिंदी बोलते थे, इसलिए मैं हिंदी बोलता हूँ। इसका मतलब ये नहीं कि मैंने सारी दुनिया की भाषाओं की निष्पक्ष तुलना की और फिर इस नतीजे पर पहुँचा कि हिंदी विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है, और इसलिए मुझे इसके प्रचार-प्रसार में जुट जाना चाहिए। यह बात खाने-पीने, रहन-सहन और पूजा-पाठ पर भी लागू होती है। शाकाहारी भोजन या मांसाहारी? साड़ी या जीन्स? अमेरिका के इसी परिवेश मे, इसी मौसम में, एक लड़की और उसकी माँ अलग अलग सोच रखती हैं। भारत के परिवेश में पली-बड़ी लड़की जब ब्याह कर यहाँ आती है तो जीन्स में खुश रहती है। और जब उसकी माँ यहाँ आती है तो माँ साड़ी में खुश है। दोनो उसी पगडंडी पर घूमने जाती है हर शाम। एक साड़ी में और एक जीन्स में। क्या जीन्स बेहतर है या साड़ी? दोनो तर्क दे सकती हैं अपने अपने चुनाव के पक्ष में। लेकिन दोनों को ये मिले थे परिवेश से और बाद में उन्होने अपनी-अपनी सहुलियत से एक को पकड़े रखा और दूसरे को छोड़ दिया। इस प्रकार आदमी का जीवन ढलता जाता है - संस्कार से, परिवेश से, सहुलियत से। कुछ पर तर्क-वितर्क के बाद बदलाव आ जाते हैं - जैसे कि खान-पान या साड़ी-जीन्स आदि। लेकिन कुछ बातों पर रुढ़ियाँ इतनी गहरी होती हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि इन्हें भी बदला जा सकता हैं। उदाहरण के तौर पर जनेउ-चोटी-तिलक तो गायब हो गए लेकिन बिना मंदिर के हम अपने धर्म-समाज की कल्पना ही नहीं कर सकते। जबकि अगर ध्यान से हमारे धार्मिक ग्रंथों का अवलोकन किया जाए, तो ये साबित हो जाएगा कि मंदिर की प्रथा हमारे समाज में थी ही नहीं। न अर्जुन ने मंदिर में पूजा की, न कृष्ण ने। अयोध्या तब भी था। रामसेतु तब भी था। वाल्मिकी की रामायण तब भी थी। एक भी बार न कृष्ण, न पांडव, न कौरव, न भीष्म कभी अयोध्या गए माथा टेकने या रामसेतु पानी चढ़ाने। या कि कृष्ण ने गीता के 700 श्लोक में एक बार भी राम के आदर्श जीवन का हवाला देते हुए कहा कि - सुन पार्थ, जब श्री राम के सामने संकट आए तो उन्होंने उनका कैसे सामना किया। तुम्हे भी उनसे कुछ सीखना चाहिए। रामकथा में निहित नैतिक, मौलिक, आध्यात्मिक ज्ञान को सीखना चाहिए। एक और बात। दीवाली के बारे में हर बच्चे को बता दिया जाता है कि दीवाली तब से मनाई जा रही है जब से श्री राम रावण का वध कर के अयोध्या आए थे। लेकिन महाभारत का कोई पात्र कभी दीवाली के उत्सव की चर्चा नहीं करता है। या आप ये बता दे कि वनवास के दौरान, पांडवों की पहली दीवाली कैसे बीती? या कि कहीं दशहरा का ज़िक्र हो या रामनवमी का। ये सब आधुनिक काल की उपज है। लेकिन थोप ऐसी दी गई है कि अब यह शास्वत सत्य है। भाषा भ्रष्ट होने की जो आज बात कर रहे हैं - वे शायद तुलसी का भी उतना ही विद्रोह करते जब वे अवधि में रामचरितमानस लिख रहे थे। आज हिंदी की पताका फ़हरा रहे हैं। सोचिए, कृष्ण अगर आज आ जाए तो उन्हें कितना कष्ट होगा कि मैंने एक सुसंस्कृत भाषा संस्कृत में अच्छी तरह से गीता सुनाई, व्यास मुनि ने दोहराया और गणेश ने लिखी और आज जनता उसे छोड़ उसके अनुवाद पढ़ रही है। निष्कर्ष यह कि जब तक हम पूर्वाग्रह से ग्रसित है, वाद-विवाद से कोई सार निकलता नहीं है। सारे तर्क-वितर्क व्यर्थ है ऐसे वातावरण में। अंत में प्रस्तुत है ये कविता , जो कि है तो छ: साल पुरानी लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक पुरानी नहीं हुई। इससे पहले कि कोई मुझे इस पर बधाई दे, कॄपया एक निगाह बधाई कविता पर भी डाल ले। क़हर पहले भी बरसा था क़हर अस्त-व्यस्त था सारा शहर आज फ़िर बरसा है क़हर अस्त-व्यस्त है सारा शहर बदला किसी से लेने से सज़ा किसी को देने से मतलब नहीं निकलेगा पत्थर नहीं पिघलेगा जब तक है इधर और उधर मेरा ज़हर तेरा ज़हर बुरा है कौन, भला है कौन सच की राह पर चला है कौन मुक़म्मल नहीं है कोई भी महफ़ूज़ नहीं है कोई भी चाहे लगा हो नगर-नगर पहरा कड़ा आठों पहर न कोई समझा है न समझेगा व्यर्थ तर्क वितर्क में उलझेगा झगड़ा नहीं एक दल का है मसला नहीं आजकल का है सदियां गई हैं गुज़र हुई नहीं अभी तक सहर नज़र जाती है जिधर आँख जाती है सिहर जो जितना ज्यादा शूर है वो उतना ज्यादा क्रूर है ताज है जिनके सर पर ढाते हैं वो भी क़हर आशा की किरण तब फूटेंगी सदियों की नींद तब टूटेंगी ताज़ा हवा फिर आएगी दीवारे जब गिर जाएंगी होगा जब घर एक घर न तेरा घर न मेरा घर सेन फ़्रांसिस्को 24 सितम्बर 2002 (अक्षरधाम पर हमले के बाद) सिएटल, 27 जुलाई 2008 Pasted from <http://mere--words.blogspot.com/search?q=%E0%A5%98%E0%A4%B9%E0%A4%B0>

Monday, July 21, 2008

कंडोम कांड

[http://hindibharat.blogspot.com/2008/07/blog-post_21.html]
समझ में नहीं आता कि कुछ लोग क्यों या तो बच्चों जैसी बेवकूफ़ी की बाते करते हैं या फिर बूढ़ों की तरह दकियानूसी?

अब परेशान है कंडोम के प्रचार को ले कर। हद हो गई। एक उम्र के बाद हर कोई इस के बारे में जान ही जाता है और समझ जाता है - किसी न किसी खुफ़िया तरीके से। आप धार्मिक है तो कह लीजिए किसी देवी शक्ति से। आज से 36 साल पहले की बात सुनिए, जब टी-वी घर घर में नहीं था और स्कूल-घर-परिवार वाले बच्चों को थिएटर में पहली पिक्चर दिखाने ले जाते थे तो कोई धार्मिक - जैसे कि सम्पूर्ण रामायण। और यह बात दिल्ली बम्बई की नहीं है। यह बात है मेरठ की। और मेरठ के एक प्राथमिक विद्यालय की। वहाँ एक दिन सर्दी के महीने में सुबह सुबह खेल के मैदान में हम पांचवी कक्षा के छात्र-छात्राओं को दिख गया कंडोम।

फिर क्या था। ज्ञान की जो सरिता बही कि बस पूछिए मत। रोज उसके बारे में बातें। फिर हमें निरोध के विज्ञापन के बारे में भी जिज्ञासा हुई। और हमारा शिक्षक कौन? स्कूल का दरबान। स्कूल में सिर्फ़ मैडम ही मैडम पढ़ाती थी। उनसे तो पूछने की हिम्मत हुई नहीं। यहीं एक पुरूष थे जिनसे बिना किसी भूमिका के पूछा जा सकता था। क्योंकि ये उस घटना से पूरी तरह वाकिफ़ थे।

तो तात्पर्य यह कि ये बाते रोकने से तो रुकती है नहीं।

ये एक फ़ैशन सा हो गया है आजकल। हर बुराई के लिए किसी न किसी को दोषी ठहराना। कभी मुसलमान तो कभी अंग्रेज़ तो कभी भूमंडलीकरण। आप रामायण खोल कर देख लें। महाभारत देख लीजिए। त्रेतायुग और द्वापरयुग में हर तरह का पाप और व्याभिचार मौजूद था। तब कहाँ थे आप के मुसलमान या अंग्रेज़ या भूमंडलीकरण।

मेरे हिसाब से आज का युग कहीं ज्यादा सभ्य है। आप अम्बानी परिवार की फ़ूट को देख कर कहते हैं - हाय घोर कलयुग आ गया। रामायण की सारी जड़ ही सौतेलेपन के व्यवहार पर है। उस से ज्यादा कलयुग और क्या होगा? आज हम गाँधी के गुज़र जाने के बाद उनका अनादर करते हैं, उन्हें कई बातों के लिए दोषी ठहराते हैं। राम को उनके जीते जी, खुद उनके घर वालो ने बाहर निकाल दिया। राम ने सीता को निकाल दिया। बच्चों की परवरिश तक नहीं की।

अव्वल बात तो यह कि आज अपहरण बहुत कम होते हैं, इसलिए ऐसा कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन फ़र्ज करें कि आप की पत्त्नी का अपहरण हो गया है। आप तुरंत पुलिस में रिपोर्ट लिखवाएंगे। इधर-उधर भाग-दौड़ करेंगे। और फ़टाफ़ट काम होगा। लेकिन त्रेतायुग में? पुलिस तो है ही नहीं। इधर-उधर भटकिए। फिर मिले हनुमान, सुग्रीव। चलिए पत्त्नी को बाद में खोजेंगे, पहले आप का मामला सुलझाया जाए। बालि को मार दिया, मामला सुलझ गया। लेकिन अभी नहीं। अभी चतुर्मास है। हम अभी आराम करेंगे। फिर सोचेंगे। बाद में सुग्रीव भूल गए। फिर हनुमान गए। आए। बातें हुई। युद्ध हुआ। लक्ष्मण मूर्छित। राम रो रहे हैं। कहते हैं कि ये मैंने क्या किया? एक औरत के पीछे भाई को खो दिया!

देखिए कितना प्रेम है पति-पत्नी में! बाद में अग्नि-परीक्षा का किस्सा तो सर्वविदित है ही।

अब इस विज्ञापन को ही ले लीजिए। फ़िल्म 'सत्ते पे सत्ता' में कुछ कुछ ऐसा ही होता है जब अमिताभ की शादी होती है हेमा से रजिस्ट्रार के दफ़्तर में। अमिताभ को भी एक निरोध का पैकेट थमा दिया जाता है। यह फ़िल्म बच्चे-बच्चे ने देखी थी उस वक्त। एक उम्दा हास्य-प्रधान फ़िल्म के तौर पर। बॉबी, जूली के बारे में तो सुना कि बड़े-बुज़ुर्गों ने अपने घर की बेटियों को इन्हें देखने न दिया। सत्ते पे सत्ता के बारे में आज तक कोई आपत्ति सुनने में नहीं आई।

और आप ये क्यों सोच लेते हैं कि सिर्फ़ आप ही समाज के शुभचिंतक है? आपकी नज़र में तो जिन्होंने ये विज्ञापन बनाया है, अभिनय किया है और इसे दर्शाने का निर्णय लिया है, सब के सब गैर-ज़िम्मेदार हैं। मैं तो मानता हूँ कि अगर गौर से विश्लेषण किया जाए तो उन सब ने भी स्कूल में वे ही सब किताबें पढ़ी है जो आपने पढ़ी है। वहीं पाठ्यक्रम। थोड़ा तो आप उनका मान रखिए। वे भी आप ही की तरह इस समाज में रहते हैं। उनके भी परिवार हैं। ये किसी एक व्यक्ति-विशेष या तानाशाह का फ़रमान नहीं था कि ऐसा विज्ञापन बनाया जाए और दिखाया जाए।

आप पश्चिम से आई हुई कई बातें अपना लेते हैं। उनको अपनाने में अपना विकास समझते हैं। क्या ज़रुरत है उन्हें भी अपनाने की? रामराज्य में ये सब सुविधाएँ नहीं थी तो क्या जीवन दु:खद था? न फ़्रिज था, न टी-वी। न टेलिफ़ोन, न रेडियो।

मैं माँ के पेट में नौ महीने रहा। एक बार भी अल्ट्रा-साउंड नहीं हुआ। जबकि आज हर देश में बच्चे की देख-रेख के लिए आवश्यक समझा जाता है। भारत में भ्रूण हत्या के डर से ये खटाई में है। वरना हर कोई करवा रहा होता।

मेरा जन्म घर पर ही हुआ, एक छोटे से गाँव में, जहाँ न बिजली थी, न नल। और अच्छी खासी सेहत है। आज हर शहर में डिलिवरी किसी अस्पताल या क्लिनिक में होती है। क्यों?

जिसमें आपको अपना फ़ायदा दिखे वो ठीक। बाकी सब बेकार?

आप वास्तविकता से बच नहीं सकते। कब तक आँख मूंदें रहेंगे? देखिए, सीधी सी बात है। आप खाएंगे-पीएंगे तो मल तो साफ़ करना ही होगा। ज़िंदगी एक रेस्टोरेंट नहीं है कि खाए-पीए-खिसके।

सिएटल,
21 जुलाई 2008

Monday, April 7, 2008

संस्कृति: विकास या विनाश? एक लेख

पिछले महीनें मेरे छोटे पुत्र, मिहिर, की अद्यापिका ने मेरी पत्नी, मंजू, से अनुरोध किया कि वे भारतीय संस्कृति की झलक उनकी कक्षा के सामने प्रस्तुत करे। मिहिर अभी छ: वर्ष का है और किंडर्गार्टन में पढ़ता है। उसकी कक्षा में विश्व की अन्य संस्कृति से जुड़े हुए बच्चे भी पढ़ते हैं। और ये अनुरोध उन की माताओं से भी किया गया था ताकि हर संस्कृति की झलक पूरी कक्षा को मिल सके।

आजकल कोई भी प्रस्तुति बिना पाँवरपाईंट के संभव नहीं है। लिहाजा मंजू ने भी पाँवरपाईंट का स्लाईड शो तैयार किया। पिछले कई वर्षों में हमने भारत की कई बार यात्रा की और हर बार वहां से कुछ न कुछ सामान लाते रहे। उनमें से कुछ वस्तुओ की प्रदर्शनी भी लगाई गई। वे मिहिर के सहपाठियो को भारत की संस्कृति की झलक दिखाने में उपयोगी साबित हुई।

इस घटना को ले कर मेरे मन में एक जिज्ञासा जागी कि आखिर संस्कृति किसे कहते हैं? भाषा, धर्म, खान-पान, वस्त्र-परिधान, कला, दर्शन, खेलकूद, रस्म-रिवाज़, मिलने-जुलने के तरीके, और रहने का ढंग। शायद इन सब को मिला कर ही बनती है संस्कृति।

जब मैंने अपने इर्द-गिर्द देखा तो नज़र आया कि मैं कितना दूर चला आया हूं अपनी संस्कृति से। मेरी मातृभाषा मालवी थी। जब से रतलाम-सैलाना छोड़ा, उसे भी छोड़ दिया। इंजीनियरिंग की शिक्षा अंग्रेज़ी में हुई। और फिर अमेरिका में कार्यरत होने की वजह से दिन में तो अंग्रेज़ी बोलने के अलावा कोई चारा नहीं था। मगर धीरे-धीरे परिवेश और संगत की वजह से हर वक़्त अंग्रेज़ी ही बोलने लगा। गैर-भारतीय मित्रो के साथ तो अंग्रेज़ी बोलता ही था, भारतीय मित्रों के साथ भी अंग्रेज़ी बोलने लगा। उसकी वजह पहले तो यह थी कि हर भारतीय हिंदी नहीं बोल सकता। और अगर कोई हिंदी भाषी अगर हो भी तो माहौल की वजह से अंग्रेज़ी बोलने में आसानी होती थी। जैसे कि आप कहना चाहे कि आज आँफ़िस में क्या हुआ तो उसे अंग्रेज़ी में बताना ज्यादा आसान लगता है। या अगर आप राजनीति के बारे में चर्चा करना चाहे तो जो टिप्पणी आपने अखबार में पढ़ी या टी-वी पर सुनी, उसे ही कमोबेश दोहराएगे। ज़ाहिर है, अमेरिका में आप अंग्रेज़ी का अखबार ही पढ़ेगे और टी-वी पर भी अंग्रेज़ी में ही टिप्पणी सुनेगे। तो आपकी चर्चा भी अधिकांश रुप से अंग्रेज़ी में ही होगी।

ये तो रही दफ़्तर और दोस्तों की बात। मगर, धीरे-धीरे आप अपनी पत्नी से भी अंग्रेज़ी में ही बात करने लगते हैं। अगर कोई मतभेद हो तब तो ये और भी आवश्यक हो जाता है कि आप अपनी बात को अंग्रेज़ी में ही कहे। ऐसा लगता है कि अगर अंग्रेज़ी में कहे तो बात में दम होगा। "Don't touch me." "Fine." "I don't know." आदि, आदि।

जब देश छोड़ा था, हवाई जहाज पकड़ कर छोड़ा था। ज़ाहिर है, हवाई जहाज में तो पेंट-शर्ट ही पहन कर चढ़ना था। उस दिन के बाद से पेंट-शर्ट-जैकेट उतरे ही नहीं। कभी किसी को सलवार-कमीज़ या कुर्ते-पजामे में दुकान पर दूध-सब्जी-भाजी खरीदते देख लो तो शर्म आने लगती है। "कैसे जाहिल इंसान हैं। हमारी नाक कटवा दी। जैसा देस, वैसा भेस।" वगैरह, वगैरह। एकाध बार अगर किसी होली-दीवाली पर कुर्ता-पजामा पहन भी लिया तो ये एहतियात ज़रुर रखा जाता है कि सीधे-सीधे वापस घर आया जाए। अगर किसी वजह से वहीं से सीधे आँफ़िस जाना हो या बज़ार जाना हो तो पेंट-शर्ट साथ में रख कर चलते है ताकि एन-मौके पर परिधान बदल सके।

इस तरह भाषा त्याग दी संगत की वजह से। और कपड़े पहले त्यागे थे ठंडे मौसम की वजह से। मगर धीरे-धीरे उनकी वजह बदलती जाती है। अच्छी खासी गर्मी होती है अमेरिका में भी। हम टी-शर्ट-शार्टस् पहन सकते है मगर कुर्ता-पजामा नहीं।

हर शादी में दुल्हन खूब गहने पहनती है। मगर उसके बाद वे सीधे बैंक के लाँकर में शरण लेते हैं। साल में एक बार भी निकल आए तो गनीमत है। घर में रखे तो चोरी का डर है।

घर में कोई भी व्यास रचित महाभारत नहीं रखता है। बहाना ये कि अगर इसे रखा तो घर में महाभारत हो जाएगी। रामायण भी नहीं रखते हैं। न गीता, न उपनिषद, न वेद, न सूरदास, न रसखान। कई बहाने हैं। एक तो भाषा या तो हिंदी नहीं है और है तो वो क्लिष्ट है। हम कान्वेंट पढ़े-लिखे बच्चों को कहां समझ में आने वाली है। और अगर गलती से किसी ने हमें रामायण, गीता आदि पढ़ते देख लिया तो क्या कहेंगे कि 'ये हिंदू फ़ंडामेंटलिस्ट है या फिर ज़रूर हिंदू मदरसा चला रहा है।'

घर में पूजा-पाठ का भी नित्यकर्म नहीं है। घर खरीदने पर लोग गृहप्रवेश ज़रूर करवाते है किसी स्थानीय पंडित को पैसे दे कर। उसके बाद तो बस दिन रात की भागा-दौड़ी। पूजा करने के लिए नहाना ज़रुरी है। और यहां तो कई बार आँफ़िस में मीटिंग इतनी जल्दी होती है कि बस हाथ मुंह धो कर जाने में भी देर हो जाती है। नहाना-पूजा-नाश्ता तो दूर की बात है।

और फिर पूजा में दीप-अगरबत्ती जलाई तो डर है कि कहीं मिलियन डाँलर में लकड़ी का बना घर जल-जला कर राख न हो जाए। घंटी और शंख बजाने से अड़ोसी-पड़ोसी शिकायत करते है कि आप शोर कर रहे हैं। इसलिए कुछ लोग भगवान को किचन की अलमारी में बंद कर लेते हैं। कभी कभी दरवाजा खोल कर हाथ जोड़ लिया, वहीं पूजा है उनके लिए। बाकी इस बैसाखी का सहारा लेते हैं कि 'भगवान तो मेरे अंदर है। ये घंटी बजाना, दीप जलाना, भगवान की तस्वीर-मूर्ति को तिलक लगाना सब पाखंड है।' और एक हद तक ये बात सच भी है। मगर, किसी कार्य का अगर नियम न हो तो वो कार्य कभी पूरा नहीं होता है। बच्चे नियम से स्कूल जाते है, इसीलिए शिक्षा पाने में सफ़ल होते है। घर पर भी उन्हे शिक्षा दी जा सकती हैं, जो स्कूल में मिलती है। परंतु घर पर नियम-अनुशासन के अभाव में ये मुमकिन नहीं हो पाता है। यही बात व्यायाम पर भी लागू होती है। जब तक आप तय न कर ले कि मुझे हर सोम, बुध और शुक्र को 6 से 7 बजे तक दौड़ने जाना है, तो ये संभव ही नहीं है कि आप महीने में 4-5 बार से ज्यादा दौड़ पाएगे। इसी तरह, भगवान तो आपके अंदर है, मगर आप अगर नियमपूर्वक ध्यान न करे, तो एक महीना बीत जाएगा और आप पाएगे कि आप ने भगवान को याद ही नहीं किया।

आजकल घरों में गणेश जी और नटराज की मूर्तियां खूब नज़र आती हैं। मगर इन्हे साज-सजावट की वस्तु माना जाता है। इनके सामने आप जूते उतार सकते हैं। ये आपकी पीठ पीछे हो सकते हैं। आप इनके सामने शराब पी सकते हैं और जो चाहे खा सकते हैं। खाने की झूठी प्लेट रख सकते हैं। और उनके सामने ही टी-वी पर हर तरह की फ़िल्म देख सकते हैं।

भारतीय भोजन भी बहुत कम बनता है घरों में। जो कुंवारे लड़के हैं, उन्हे तो बना बनाया बहाना मिल जाता है कि हमने कभी बनाया नहीं तो अब क्यों बनाए? और जो शादी-शुदा है उनमें ये तर्क कि भारतीय खाना बनाने में कई इल्लत हैं, अड़चने हैं। आटा मलो, रोटी बेलो, उसे तवे पर सेंको और फिर आग पर। बाप रे बाप! इतना काम? ब्रेड में क्या बुराई है? सैंडविच सबसे अच्छी। सस्ती, सुंदर और टिकाउ। और पास्ता भी बहुत अच्छा है। दफ़्तर ले जाओ तो गर्व से सबके साथ मिल-बैठ के खा सकते हो। अगर दाल-रोटी हुई तो छुप कर अकेले, एक कोनें में, बैठ के खाना होगा। उपर से किचन में गरम करते वक़्त दुनिया भर की बदबू जो फ़ैलेगी, वो अलग। शरम के मारे किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं बचेंगे।

हाँ, आँफ़िस वालों को भारतीय होटल में लंच बफ़ें के लिए ज़रूर ले जाएंगे और शान से बताएगे कि ये क्या है और कैसे बनती है। और खुद भी एकाध बार शनिवार को छौले-भटूरे, आलू-टिक्की खाने के लिए किसी होटल में चले जाएगे। मगर जैसे जैसे उम्र बड़ती है, वैसे वैसे डायटिंग और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए वो भी कम हो जाता है।

तो कुल मिला कर हम न तो अपनी भाषा बोलते हैं, न अपनी संस्कृति के कपड़ें पहनते हैं, न अपनी संस्कृति का खाना खाते हैं, न अपनी संस्कृति की किताब पढ़ते हैं, न अपनी संस्कृति के हिसाब से नित्यकर्म करते हैं। आखिर क्यूं? वजह कई हैं। बहाने कई हैं। मगर सच पूछिए तो हमें अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं हैं। उलटा हमें लाज आती हैं। सामने वाला सोचेगा, हम अभी अभी गाँव से आए हैं।

इसकी जड़ क्या है? सोचता हूं कहाँ से शुरु करु? चलिए शुरु करता हूं बच्चे के जन्म से। जच्चा, यानि बच्चे की होने वाली माँ, एक कामकाजी औरत है आजकल। उसका भी एक कैरियर है। वह बच्चे की डिलिवरी को भी एक प्रोजेक्ट की डिलिवरी की तरह देखती है। कैलेंडर में एक दिन, एक समय निश्चित कर लिया जाता है। उस दिन वह पूरी तैयारी के साथ जाती है अस्पताल डिलिवरी के लिए। वहां से घर भी आती है तो जैसे कि कोई खास बात नहीं। कोई औपचारिकता नहीं। घर पर कोई स्वागत के लिए नहीं। एक कमरा जरुर सजा दिया जाता है बच्चे के लिए। वो लड़को के लिए अलग होती है और लड़कीयों के लिए अलग। रंगभेद यहीं से शुरु होता है। और फिर डिस्ने के जाने-पहचाने कार्टून चरित्रों से कोना कोना भर दिया जाता है।

जैसे ही मेटर्निटी छुट्टी खत्म होती है, माँ तुरंत पहुंच जाती है काम पर। कैरियर जो चलाना है। और फिर घर के खर्चे कैसे पूरे होगे? बच्चे को डे-केयर में डाल दिया जाता है। डे-केयर की सुविधा सुबह 6 से ले कर शाम की 6 बजे तक ही उपलब्ध होती है। पर इन 12 घंटे के एक-एक मिनट का पूरा-पूरा लाभ उठाया जाता है। और फिर रात को वहीं खाना बनाने-खाने की परेशानी और घर को सम्हालने की जिम्मेदारी। इन सब के बीच माहौल शांतिमय नहीं रह पाता। आदमी हांफ़ता ही रहता है हफ़्ते भर। और फिर यही क्रम दुबारा अगले हफ़्ते।

बच्चा झूला झूलता है पर माँ-बाप इतने व्यस्त है कि बैटरी का सहारा लेना पड़ता है। बच्चों को लोरियां अच्छी लगती है। पर वो भी सी-डी के द्वारा ही सुनाई जाती है। ऐसा नहीं है कि माँ अच्छी गायक नहीं है, इसलिए नहीं गाती है। वजह सिर्फ़ वक़्त की है और अहमियत की है। कैरियर बनाना है तो बच्चे के लिए ये इलेक्ट्रानिक उपाय ज़रुरी है। शनि-रवि को जब डे-केयर बंद होता हैं तो टी-वी का सहारा लिया जाता है - जो बच्चे को बहला सके, रीझा सके, और माँ-बाप के रास्ते से उसे हटा सके।

सोचता हूं कि जब बच्चा बड़ा होगा तो उसे बचपन कैसे याद आएगा? झूला जो अपने आप चल रहा था? लोरी जो दीवारों से आ रही थी? टी-वी जो उसके अकेलेपन का साथी था?

जैसे जैसे बच्चे बड़े होते है, वे इलेक्ट्रानिक खिलौनों की ओर मोहित होते चले जाते है - कभी विडियो गेम्स, कभी एक्स-बाँक्स, कभी गेम-बाँय, कभी निनटेनडो। और तब जा कर माँ-बाप, जो तब तक बूढ़े होने लग जाते है, सोचते हैं कि बच्चे आखिर हम से बात क्यो नहीं करते हैं? कोई घर आता है तो उनसे दुआ-सलाम क्यो नहीं करते हैं?

बच्चे माँ-बाप के ही कदमों पर चलते हैं। आजकल चरण-स्पर्श का रिवाज़ खत्म हो चुका हैं। फ़िल्मफ़ेयर पुरुस्कार समारोह में नए सितारे अमिताभ आदि के चरण-स्पर्श का अभिनय ज़रुर करते हैं। पर उसे घुटना-स्पर्श कहना उचित होगा। चलिए चरण-स्पर्श छोड़ दिया, पर क्या आप ने हाथ मिलाना या गले लगाना सीख लिया? जी नहीं। अपनी संस्कृति तो हम भूल रहे हैं पर साथ में ऐसा नहीं है कि हम किसी और संस्कृति को अपना रहे हैं। पूजा-पाठ करना छोड़ दिया पर ये नहीं कि चर्च जाना शुरु कर दिया। हमने हमारे सांस्कृतिक ग्रंथ पढ़ना बंद कर दिया, पर ये नहीं कि किसी और ग्रंथ में रुचि जागी हो। वास्तव में हम संस्कृति-हीन होते जा रहे हैं। हमारे कोई उसूल नहीं है, कोई नियम नहीं हैं, कोई धर्म नहीं है, कोई दर्शन नहीं है, कोई आद्यात्म नहीं है, कोई नीति नहीं है, कोई कला नहीं हैं। गाना कोई सीखता नहीं, चित्रकारी करना कोई सीखता नहीं, नाटक कोई देखता नहीं, वाद्ययंत्र बजाना कोई सीखता नहीं, कविता-कहानी में कोई रुचि नहीं। फ़िल्में 3 घंटे की होती हैं तो वे ज़रुर देखी जा सकती हैं।

किसी की मदद भी करने कोई जाता नहीं। हर ज़रुरत के लिए 'सर्विस' जो तैयार है। ऐयरपोर्ट जाना हो तो शटल है, टैक्सी है। कार खराब हो तो, ट्रिपल-ए है। बीमार हो तो डाँक्टर है। भूख लगे तो होटल है। कहीं रुकना हो तो मोटल है। सब से कटे कटे से रहते हैं।

स्विच दबाते ही हो जाती है रोशनी
सूरज की राह मैं तकता नहीं

गुलाब मिल जाते हैं बारह महीने
मौसम की राह मैं तकता नहीं

इंटरनेट से मिल जाती हैं दुनिया की खबरें
टीवी की राह मैं तकता नहीं

ईमेल-मैसेंजर से हो जाती हैं बातें
फोन की राह मैं तकता नहीं

डिलिवर हो जाता हैं बना बनाया खाना
बीवी की राह मैं तकता नहीं

होटले तमाम है हर एक शहर में
लोगों के घर मैं रहता नहीं

जो चाहता हूं वो मिल जाता मुझे है
किसी की राह मैं तकता नहीं

किसी की राह मैं तकता नहीं
कोई राह मेरी भी तकता नहीं

कपड़ो की सलवट की तरह रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं
रिश्ता यहाँ कोई कायम रहता नहीं

तत्काल परिणाम की आदत है सबको
माइक्रोवेव में तो रिश्ता पकता नहीं

किसी की राह मैं तकता नहीं
कोई राह मेरी भी तकता नहीं

निष्कर्ष यहीं कि हमें अपनी संस्कृति पर शर्म आती है और दूसरी संस्कृति को अपनाने के लिए वक़्त नहीं है। क्यूंकि माँ-बाप दोनो हाथ से सोना बटोरने में लगे रहते है। अंत में आखिर क्या रह जाएगा जो वो बच्चों के लिए छोड़ जाएगे? क्या बैंक बेलेंस ही सब कुछ है? जबकि हम जानते हैं कि मुद्रास्फ़ीति की वजह से छ: शून्य का बैंक बेलेंस भी काफ़ी नहीं रहेगा अगली पीढ़ी के लिए। एक घर खरीदने में ही खर्च हो जाएगा। और घर में हर वस्तु वैसे ही साल-दो-साल में पुरानी हो जाती है। टी-वी, वी-सी-आर, डी-वी-डी प्लेयर, सी-डी प्लेयर, फ़्रीज, कारपेट, कार, आई-पाड आदि सब बहुत जल्दी पुराने हो जाते हैं। कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की किताबें चार साल बाद ही कचरें में फ़ेंकनी पड़ती हैं।

ये विचार का विषय है कि हम अपनी संस्कृति को कहां ले कर जा रहे हैं? क्या ये शून्य की ओर अग्रसर है? हमारे देश, हमारी संस्कृति ने विश्व को शून्य से अवगत कराया, शून्य का प्रयोग करना सिखाया। लेकिन आज हर क्षेत्र में हम शून्य हैं, नगण्य हैं। जिस पर हम गर्व कर सकते हैं, उस पर हम शर्म करते हैं। आज हर कोई जिम जाता है कसरत के लिए, जबकि घर बैठे योगासन किये जा सकते है। जब पश्चिम के देश इसे अपनाने लगते हैं तो हम भी इसके दीवाने हो जाते हैं। इंदीवर जी ने गीत लिखा था, फ़िल्म पूरब और पश्चिम में -- भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं। दूसरा गीत है राजिंदर कृष्ण द्वारा लिखा, फ़िल्म सिकंदर-ए-आज़म का - जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा। इन दोनों गीतों में जितनी अच्छाईया गिनाई गई हैं - वे सब आज नदारद हैं। (गीत देखे नीचे)

हमारे देश में एक समय नालंदा विश्वविद्यालय था - जो कि विश्वविख्यात था। यहां दूर दूर से लोग शिक्षा पाने आते थे। और ये उस समय जब हवाई जहाज भी नहीं थे। इंटरनेट नहीं था। तगड़ी मार्केटिंग नहीं थी।

हमारे ग्रंथ बताते हैं कि हमारे पास ब्रह्मास्त्र थे। आज हम अपनी सुरक्षा विदेशी ताकतों द्वारा बनाए गए हथियारों से करते हैं। कितनी दयनीय स्थिति हैं। दुश्मन से हम अपनी सुरक्षा के उपाय पूछते है। पंचतंत्र की कहानी याद आ गई कि शेर ने बिल्ली से हर तरकीब सीखनी चाही, लेकिन होशियार बिल्ली ने शेर को पेड़ पर चड़ना नहीं सीखाया। हमारे दुश्मन भी हमें मदद तो करते हैं पर ये ध्यान रखते हैं कि हम उन पर आजीवन निर्भर रहे।

हमारे पास आयुर्वेद थे। मगर हर मरीज़ दौड़ा जा रहा है अस्पताल जहां पश्चिमि चिकित्सा अनुसार इलाज किया जाता है।

नालंदा विश्वविद्यालय आज एक खंडहर है। ब्रह्मास्त्र और पुष्पक विमान काल्पनिक वस्तुए है। इंद्रप्रस्थ नगर विलीन हैं। हमारा दर्शन, हमारा आद्यात्म, हमारी कला, हमारी नीति - ये सब हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग थे। सब धीरे-धीरे विलुप्त हो गए और हो रहे है। कैसे हुआ यह सब? इतना तो मुझे ज्ञात नही। हो सकता है कि उस वक़्त के जनसमुदाय ने भी ऐसे कदम उठाए हो जैसे कि आज हम उठा रहे हैं। वो नालंदा, आयुर्वेद, ब्रह्मास्त्र, दर्शन, आद्यात्म, नीति से दूर होते गए। और हम भी आज इन से और दूर होते जा रहे हैं।

किसी से कहो तो कोई मानता नहीं है। सिर्फ़ एक जवाब - फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।

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जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने
भारत ने मेरे भारत ने
दुनिया को तब गिनती आयी
तारों की भाषा भारत ने
दुनिया को पहले सिखलायी

देता ना दशमलव भारत तो
यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था
धरती और चाँद की दूरी का
अंदाज़ लगाना मुश्किल था

सभ्यता जहाँ पहले आयी
पहले जनमी है जहाँ पे कला
अपना भारत जो भारत है
जिसके पीछे संसार चला
संसार चला और आगे बढ़ा
ज्यूँ आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया
भगवान करे ये और बढ़े
बढ़ता ही रहे और फूले-फले

है प्रीत जहाँ की रीत सदा
मैं गीत वहाँ के गाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

काले-गोरे का भेद नहीं
हर दिल से हमारा नाता है
कुछ और न आता हो हमको
हमें प्यार निभाना आता है
जिसे मान चुकी सारी दुनिया
मैं बात वोही दोहराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

जीते हो किसीने देश तो क्या
हमने तो दिलों को जीता है
जहाँ राम अभी तक है नर में
नारी में अभी तक सीता है
इतने पावन हैं लोग जहाँ
मैं नित-नित शीश झुकाता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

इतनी ममता नदियों को भी
जहाँ माता कहके बुलाते है
इतना आदर इन्सान तो क्या
पत्थर भी पूजे जातें है
इस धरती पे मैंने जनम लिया
ये सोच के मैं इतराता हूँ
भारत का रहने वाला हूँ
भारत की बात सुनाता हूँ

Pasted from <http://smriti.com/hindi-songs/jab-ziiro-diyaa-...-hai-priit-jahaan-kii-riit-sadaa-utf8>

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जहाँ डाल-डाल पर
सोने की चिड़ियां करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा

जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का
पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा

ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि
जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है
और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर
डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के
त्योहार भी है अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है
कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का
चारो और है घेरा
वो भारत देश है मेरा

जहाँ आसमान से बाते करते
मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर मे किसी द्वार पर
कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता
है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा ...

Pasted from <http://smriti.com/hindi-songs/jahaan-daal-daal-par-sone-kii-chidiyaan-karatii-hain-baseraa-utf8>

Monday, December 3, 2007

शुद्ध हिंदी - एक आईने में


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियां नज़र आई ना


काश ये दो पंक्तियां किसी महानुभाव ने कहीं होती। आपका दुर्भाग्य है कि ये मैंने लिखी हैं। ये मेरे उस प्रयास का परिणाम है जिसमें की दुसरी पंक्ति के आखरी के शब्द पहली पंक्ति के आखरी शब्द ही होते हैं। एक हल्का सा अंतर होता है। वो यह कि या तो वो संधि द्वारा बनाए जाते है या फिर संधि विच्छेद द्वारा।

चूंकि ये मेरी पंक्तियां हैं। तो ज़ाहिर है हर कोई इस पर अपनी टिप्पणी करता है। आप इतने निराशावादी क्यूं हैं? ये क्यूं नहीं कहते कि

जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खूबियां नज़र आई ना


कहना उनका सही है। ग्लास को आधा खाली कहने के बजाय आधा भरा भी कहा जा सकता है।

आईना बहुत उपयोगी वस्तु है। इसका उपयोग रोज हर जाति, सम्प्रदाय, और देश में समान रुप से किया जाता है। ये बहुत ही सस्ते दामों पर सबको उपलब्ध है। चाहे कोई सुबह उठ कर अपने ईष्ट देव को स्मरण करे न करे, आईने के दर्शन जरूर करता है। स्त्री, पुरुष, बच्चे, और बूढ़े सब देखते हैं कि वे कितने सुंदर है और क्या सुधार किया जा सकता है ताकि वे और सुंदर देखे। लोग उन्हें देखे तो प्रसन्न हो।

एक और आयाम नज़र आता है आईने का। वो यह कि आईने से मनोरंजन भी होता है। गाँव के मेले में अक्सर एक खेमा जरूर होता हैं जिसमें कई तरह के आईने होते है जिनमे इंसान बारी बारी से कभी मोटा तो कभी पतला, कभी लम्बा तो कभी छोटा नज़र आता है।

और आईना प्रयोगशाला में एक उपकरण के रूप में काम आता है। इस को ले कर प्रकाश के नियम और गुण आदि के बारे में प्रयोग किये जाते हैं।

आईना बच्चों का खिलोना भी है। वे इससे आलोकित दायरे को दीवार और छत पर घुमाते रहते है और उनका कौतूहल कम होने का नाम नहीं लेता।

आईना सपाट होता है और स्वभाव से अत्यंत शीतल। जो छवि दिखाता है और सच्चाई के बिल्कुल विपरीत होती है और फिर भी कोई इसे दोषी नहीं ठहराता। सब स्वयं ही इसका आशय जान लेते है और इसका धन्यवाद देते हैं।

इन सब को ध्यान में रखते हुए, मैंने इस स्तम्भ का नाम आईना रखा है। कभी मनोरंजन करेगा तो कभी खूबीयां दिखाएगा तो कभी खामियां।

मुझे कविता लिखने की प्रेरणा कबीर के दोहो से मिली। मेरा मानना है कि उन के जैसा गागर में सागर भरने वाला और कोई नहीं। हास्य, व्यंग्य और दर्शन में वे पारंगत थे। उनका ये दोहा मुझे खास तौर से पसंद है -

रंगी को नारंगी कहे, बने दूध को खोया
चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया।


सुना तो इसे आपने कई बार होगा। ये एक हिंदी फ़िल्म के गीत के शुरूआत में भी गाया गया है। इसे समझने के लिए इसे कई बार पढ़ना होगा। तीनों तथ्य एक से बड़ कर एक विडम्बना को उजागर करते है। नारंगी एक बेहद रंगीन फ़ल है और उसे दुनिया ने नारंगी का नाम दे दिया। जब दूध का खोया बना लिया जाता है तो वो आपके सामने है और दुनिया उसे कहती है खोया। जो वाहन है, चलायमान है उसे दुनिया कहती हैं गाड़ी! गाड़ी तो लकड़ी जाती है, गाड़े तो मुर्दे जाते हैं। गाड़ी का मतलब जो एक जगह पर अटक जाए। जो वहां से हिल न सके।

मुझे भी शब्दों से खेलना बहुत अच्छा लगता है। हर कविता में कुछ न कुछ शब्द आ ही जाते हैं जिनके दो अर्थ हो। ऐसी कविताएं फिर मैं blog पर प्रकाशित कर देता हूं और मित्रों को भेज देता हूं। पिछले एक साल से सिएटल शहर में हर महीने के चौथे शनिवार को मैं अपने घर एक काव्यगोष्ठी का आयोजन करता हूं। इसमें इस शहर में रहने वाले और कविता लिखने वाले या इसमें रचि रखने वाले सम्मिलित होते हैं। पिछले हफ़्ते मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में गया था। वहाँ मेरा परिचय देते हुए कहा गया कि ये हर महीने नियमित रुप से गोष्ठी का आयोजन कर के हिंदी के सेवा कर रहे हैं। तो मेरे मन में तुरंत एक वाक्य कौंध गया - 'मैं मासिक धर्म निभा रहा हूं।' मैं सोचता रहा कि अगर मासिक धर्म लगातार चलता रहे और कभी ये क्रम टूटे नहीं तो सृजन कैसे होगा? और फिर मेरा शब्दो से खेल शुरु हो गया जो दूसरे दिन जा के रुका जब 'जन्म' कविता पूरी हो गई। ये एक संयोग ही था कि वो मेरा जन्म दिन भी था।

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
यह एक सर्वविदित सत्य है

कभी झुठलाया गया
तो कभी नकारा गया
हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो

बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
और बच्चों की तरह हम रुठ गए
जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
और दुनिया से विश्वास उठ गया

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं

एक बात समझ में आ गई
तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
घुस गए 'लैब' में
शांत करने अपनी क्षुदा

हर वस्तु की नाप तौल करे
न कर सके तो मखौल करे

वेदों को झुठलाते है हम
ईश्वर को नकारते है हम
तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम

ईश्वर सामने आता नहीं
हमें कुछ समझाता नहीं

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है


इस कविता को बहुतों ने पसंद किया। और नहीं भी किया तो कम से कम जन्मदिन की बधाईयां तो जरुर भेजी गई।

पर दो नई बातें सुनने में आई। एक तो ये कि ज्यादातर लोग खुश थे कि इस कविता में वेदो और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा गया है। दूसरा ये कि इसमें ज्यादातर शब्द हिंदी के थे। उर्दू के इक्का-दुक्का शब्द थे। मुझे सलाह दी गई कि आप हिंदी को भ्रष्ट होने से बचा ले। अगर ख़ुदा को कविता से जुदा कर दिया जाए तो अच्छा होगा।

सामान्यत: मैं अपने आप को कविता तक ही सीमित रखता हूं। कविता के अलावा कुछ नहीं कहता। और न ही कविता की सफ़ाई देता हूं। पर चूंकि अब मंच सामने हैं तो कुछ कहना चाहूंगा। मैं रतलाम में और रतलाम जिले में (शिवगढ़ और सैलाना) पला हूं। वहां पर हम मालवी या साधारण हिंदी बोलते थे। नई दुनिया एक मात्र अखबार था। उसे देने अखबार वाला आता था। अखबार का बिल आता था हर महीने। मेरे नाना गाँधीवादी थे और प्राथमिक विद्यालय चलाते थे जिसे लोग त्रिवेदी प्राईवेट स्कूल के नाम से जानते थे। देखिये, बिना अंग्रेज़ी और उर्दू के इतनी छोटी सी बात भी पूरी नहीं की जा सकी।

एक और उदाहरण। आप जाइये एक दूर-दराज के गाँव में जहाँ एक अधेड़ उम्र की माँ है जो कड़ी मेहनत कर के अपना घर चलाती है। उस के पास वक्त नहीं है कि वो या उसकी भाषा राजनीति से या फ़िल्मी दुनिया से या टीवी से प्रभावित हो। उससे आप कहिये कि - 'माई, तेरे बेटे के नम्बर अच्छे नहीं आए है इसलिए वो फ़ैल हो गया है। तू उसकी कोई अच्छी सी ट्यूशन लगा दे। हो सकता है वो अगली बार पास हो जाए।'

अब आप यहीं बात कह कर देखे बिना नम्बर, फ़ैल, ट्यूशन और पास के। बहुत मुश्किल है। और आप अगर शव्दकोश की सहायता से कह भी दे तो मैं नहीं समझता कि वो माँ उस बात को समझ पाएगी।

क्या फ़ायदा हैं इस तरह से हिंदी को संकीर्ण बनाए रखने की? आग भी उतना ही ठीक शब्द है जितना कि अग्नि। मुझे समझ नहीं आता है कि क्यूं कुछ लोग बात बात पर हिंदी का झंडा फ़हराने से बाज नहीं आते? खुद तो अंग्रेज़ी पढ़ लिख कर आगे निकल लिए। अब चाहते हैं कि बाकी लोग पीछे ही रहे तो बेहतर है। एक सज्जन तो यहाँ तक लिख बैठे कि 'हिंदी केवल गांव और गरीबों तक सीमित रह गई है। जैसे जैसे गरीबी हटती जाएगी, वैसे वैसे हिंदी मरती जाएगी।'

मेरे लिए ये एक सुखद घटना होगी। गरीबी हटाने का प्रयत्न कई वर्षो से किया जा रहा है। अगर हम इसमें सफ़ल हो गए तो ये एक हर्ष का विषय है। मातम मनाने का नहीं। रही बात हिंदी के मरने की। वो ऐसे तो मरने वाली है नही। और अगर मर भी गई तो कोई गम नहीं। मैं हमेशा से इस पक्ष में हूं कि इंसान बेकार में ही बटा हुआ है जाति में, प्रांत में, राज्य में, देश में, भाषा में, धर्म में। क्या ही अच्छा हो जब सारी सीमाएं हट जाए और हम सब आज़ादी से जहाँ जाना चाहे, जा सके। न पासपोर्ट की आवश्यकता हो और न हीं किसी दूसरी भाषा को जानने की ज़रुरत।

दूसरी बात भाषा भ्रष्ट होने की। नए शब्द जोड़ने से भाषा बलवान होती है, भ्रष्ट नहीं। शुद्धता सिर्फ़ शुद्धता की वजह से नही होनी चाहिए। प्राय: सारी शुद्ध वस्तुएं इतनी उपयोगी नहीं होती है जितनी कि मिलावट के बाद। 100% शुद्ध लोहा किसी काम का नहीं होता है। उसमें मिलावट कर के स्टील बनाया जाता है। 100% खरे सोने से भी आभूषण नहीं बनाए जा सकते हैं जब तक कि मिलावट न हो।

समृद्ध और खुश-हाल भारत

हाथी के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग होते हैं। यह बात समृद्ध और खुश-हाल भारत पर भी लागू होती है। एक तरफ़ हैं विप्रो के अज़िम प्रेमजी और रिलाएन्स का अम्बानी परिवार, दूसरी ओर हैं आत्महत्या करते हुए किसान। एक तरफ़ हैं कोक और पेप्सी, दूसरी ओर है पीने के पानी को तरसती हुई ग्रामीण जनता। असलियत यही है कि बावजूद इतनी तरक्की के आज भी भारत में कामयाब वही समझा जाता है जो देश छोड कर विदेश में धन अर्जित करता है। गांधी जी को सम्बोधित करते हुए मैंने लिखा है -
'भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ है अब कामयाब,
मेरे वतन में एक भी होनहार नौजवां नहीं मिलता
'।   भारत छोड़ने की मेरी इच्छा कतई नहीं थी। हालांकि, मेरे पिता 1966 में इंग्लैंड जा भी चुके थे और 3 साल में पी-एच-डी ले कर आ भी गए थे। मैं 1986 में बनारस से इंजीनियरिंग खत्म कर चुका था और हाथ में एक सरकारी नौकरी भी थी। विदेश जा कर दर-दर की ठोकरे खाने में कोई तुक नहीं दिखाई दे रहा था। मैं आरामपसंद व्यक्ति हूँ। मेरे विचार में स्नातकोत्तर शिक्षा से आज तक किसी का भला नहीं हुआ है।
'कितनी निराली है शिक्षा प्रणाली,
'पास' होते होते सब दूर हो गए'।
  मेरे मामा मेट्रिक पास थे और अपने परिवार के हमेशा पास थे। उनके साथ मैंने कई सुखद गर्मी की छुट्टीयां बितायी है रुनखेड़ा में, जहां वे स्टेशन मास्टर थे। एक बार मुझसे 5 वीं कक्षा में पूछा गया था, क्या बनोंगे बड़े हो कर? मैंने कहा था, "स्टेशन मास्टर!"   बहरहाल, क्लाँस के सब साथी अमेरिका जा रहे थे सो मैं भी निकल पड़ा। और अगले चार साल तक मास्टर्स और एम-बी-ए के दौरान कई पापड़ बेले। मगर कहीं भी कड़वाहट महसूस नहीं हुई, अमेरिका में सब जगह खूब स्नेह मिला। दिक्कत थी तो बस एक कि भारत में सब कुछ बना-बनाया मिल जाता था। घर पर माँ थी और बनारस के होस्टल में महाराज था। यहाँ खुद ही दाल-रोटी बनाओ। बर्तन भी मांजो। कपड़े भी धोओ। झाडू फटका भी करो। 'चले थे बड़ी धूम से बादशाह बनने,
काम काज में फ़ंसे मज़दूर हो गए'
।
और ये सिलसिला अभी भी जारी है। बड़े से बड़े ओहदे वाला व्यक्ति खुद कार चलाता है, खुद सब्जी-भाजी खरीदता है, खुद कपड़े धोता है, खुद की चाय-काँफ़ी बनाता है, खुद झाड़ू-फ़टका करता है और खुद खाना भी बनाता है। हालांकि मशीनों - वाँशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर - से आसानी जरूर हो जाती है। पर घर या दफ़्तर में कोई सेवा में हाज़िर नौकर नज़र नहीं आता है।   मैंने भारत में इन्जीनियरिंग की पढ़ाई अवश्य अंग्रेज़ी में की थी। मगर अंग्रेज़ी में कभी वार्तालाप नहीं किया था। अमेरिका में पेट पूजा के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पढ़ाने लगा विश्वविध्यालय में। जाहिर है अंग्रेजी में ही पढ़ाना था। यह मेरे लिए एक गर्व की बात थी कि जिसने 5 वीं कक्षा तक ए बी सी डी तक नहीं सीखी थी, आज 20-25 अमरीकी नवयुवकों को उनकी ही भाषा में एक नई भाषा (पास्कल) सीखा रहा था। और मुझे अपने छात्रों से यथोचित सम्मान भी मिला। और तब मुझे शर्म आई यह सोच कर कि किस तरह हम नए अध्यापक का मज़ाक उड़ाया करते थे बनारस में।   ग्लानि इस बात की हमेशा रही कि 7 हज़ार मील की दूरी के बहाने से घर की सारी जिम्मेदारीयों से हाथ धो लिया। न किसी की शादी में शामिल हुए न किसी की बरसी में। न किसी के लिए नौकरी की सिफ़रिश की और न किसी की दवा-दारु की।  माँ की टक्कर हो गई थी स्कूटर से। कमर में काफ़ी चोट आई। बिस्तर पर रही हफ़्तों तक। मैं यहाँ टी-वी पर देखता रहा डायना और मदर टेरेसा का अंतिम सफ़र। फ़ोन से बातचीत जरुर होती थी। पर फ़ोन पर किसी को गले नहीं लगाया जा सकता। कंधे पर सर नहीं रख सकते। निगाहें नीची कर के थोड़ी देर चुप नहीं रह सकते। माँ माथे को चूम नहीं सकती। बालों को सहला नहीं सकती। गला भर आने पर पानी का ग्लास नहीं दे सकती।   सच! कितनी त्रासदी है एक एन आर आई के जीवन में।
'जब हम अपनों के नहीं हुए,
तो किसी और के क्या होंगे,
पूछ लो किसी भी कामयाब से,
किस्से यहीं बयां होंगे'
।
 
21 साल से यहाँ हूं। तब से आज तक यही सुनता आया हूँ - 'मेरा भारत महान'।
'परदेस में बस जाने के बाद,
चर्चे वतन के मशहूर हो गए'
।


'भारत बहुत तरक्की कर रहा है।' 'अमेरिका अपने आप को असुरक्षित समझ रहा है।' 'यहाँ की नौकरियाँ धीरे-धीरे बैंगलोर और हैदराबाद जा रही है।' आदि, आदि। इस वजह सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अमरीकी कर्मचारीयों के पेट पर सीधा-सीधा वार हुआ है। जाहिर है उन्हें ये कतई पसंद नहीं है। कुछ राज्य सरकारों ने इसी कारण ये निर्णय लिया है कि वे किसी भी एसी संस्था को काम नहीं देंगे जिसके संबंध भारत की कंपनी से हैं। हालांकि इस निर्णय से खास फ़र्क नहीं आया है। चूंकि ये गिने-चुने राज्य तक ही सीमित है। नौकरियाँ तो जा ही रही हैं भारत की ओर, पर भारत से अब भी हज़ारो की तादात में नवयुवक आ रहे हैं। पहले वो आते थे उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए अपनी योग्यता के बल पर। आज आते हैं विप्रो, इन्फ़ोसिस आदि की छत्र-छाया में। वे आते हैं सस्ती दरों पर वही काम करने जिसे अमरीकी नागरिक कर रहा था महंगी दरों पर। तो जाहिर है, ऐसे भारतीय कर्मचारी अमरीकी जनता का सम्मान पाने में असमर्थ रहते हैं। पर इस वजह से कंपनी की बचत होती है और बहुत मुनाफ़ा। वाँल-स्ट्रीट भी खुश। अब आप सोच रहे होंगे कि चलो कम से कम कंपनी के मालिक तो इन भारतीय कर्मचारीयों की इज़्ज़्त करते होंगे। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जैसे कि आप घर बना रहे हैं और आपको मजदूर चाहिए जो ईंट, पत्थर, गारा उठा सके, मिला सके, और दीवारें खड़ी कर सके। ये काम आपके शहर के लोग कर सकते है 100 रुपये में और दूसरी तरफ़ हैं दूसरे शहर के लोग जो यह काम कर सकते हैं 70 रुपयें में। आप दूसरे शहर के कर्मचारियों से काम करा के 30 रुपये बचाएंगे जरूर मगर आप की नज़रों में उनकी इज़्ज़त नहीं बड़ जाएंगी। काम खत्म हुआ और आप अपने रस्ते और वो कर्मचारी अपने रस्ते पर। सम्मान अर्जित करने के लिए कुछ नया होना चाहिए। बजाए इसके कि आप कोई भी काम पूरा करने के लिए एक सस्ते मज़दूर की तरह हाज़िर हो जाएं। अगर आप इस घर की रूपरेखा तैयार करने वाले आँर्किटेक्ट हैं और आपका काम बहुत बेहतरीन है, तब स्वाभाविक है कि आपको प्रचुर सम्मान मिलेंगा। पिछले 10 साल में जो भारत के विकास की बात अमेरिका तक पहुँच रही है वो साँफ़्टवेयर सेवा तक ही सीमित है। और इस क्षेत्र में भारत एक सस्ते मज़दूर के रूप में देखा जा रहा है। एक मजे की बात और कि विप्रो, इन्फ़ोसिस की बदौलत अब भारत में साँफ़्टवेयर क्षेत्र में वेतन स्तरों में प्रचुर वृद्धि हुई है। इस कारण काफ़ी भारतीय जो अमरीका में बस गए थे अब भारत वापसी की तैयारी कर रहे हैं। रोज सुनने में आता है कि फलाना हिन्दुस्तान जा रहा है उस कंपनी में डायरेक्टर बन कर तो इस कंपनी में मैनेजर बन कर। मगर दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। भई सच पूछो तो अमेरिका में भेद-भाव है और उपर से झेलने अनगिनत उतार-चढ़ाव हैं जो नौकरी आज है वो कल नहीं चिन्ता रहती है हर पल यही अब तो भारत में भी नौकरिया ढेर हैं और मां-बाप के भी कबर में पैर हैं सोचता हूँ हिन्दुस्तान में बस जाऊँ बस पहले अमेरिकन सिटिज़न बन जाऊँ हर महफ़िल में हर आदमी इस बात की घोषणा करता है कि वो भारत का शुभचिंतक है। मेरा ये विचार है कि भारत का विकास हो, सम्पन्न हो खुशहाल हो, रोजी-रोटी सबके पास हो, सुनते ही कि डाँलर गिर गया, सारा बुखार उतर गया  अंत में निष्कर्ष यही कि हम यहाँ के रहन-सहन के, तौर-तरीको के और ज़रुरतों के आदि हो गए हैं। और डॉलर चाहे कितना भी गिर जाए उसकी खरीदी क्षमता दुनिया की बाकी मुद्राओ से ज्यादा ही रहेगी। यहाँ आदमी एक साल के वेतन में वो सब खरीद सकता है जिसे अन्य देशों के नागरिक कई सालों की कमाई में भी नहीं पा सकते है। पहले हम अपना भविष्य सुधारने आए थे। अब हम अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना चाहते हैं। पहले मैं कहता था कि हम अभिमन्यू की तरह चक्रव्यूह में घुस तो गए हैं पर निकलने में असमर्थ हैं। अब लगता है कि ये कैंसंर की तरह एक ला-ईलाज मर्ज़ है। बाबुल चाहे सुदामा हो ससुराल चाहे सुहाना हो नया रिश्ता जोड़ने पर अपना घर छोड़ने पर दुल्हन जो होती है दो आँसू तो रोती है और इधर हर एक को खुशी होती है जब मातृभूमि संतान अपना खोती है क्यूं देश छोड़ने की इतनी सशक्त अभिलाषा है? क्या देश में सचमुच इतनी निराशा है? जाने कब क्या हो गया वजूद जो था खो गया ज़मीर जो था सो गया लकवा जैसे हो गया भेड़-चाल की दुनिया में देश अपना छोड़ दिया धनाड्यों की सेवा में नाम अपना जोड़ दिया अपनी समृद्ध संस्कृति से अपनी मधुर मातृभाषा से मुख अपना मोड़ लिया माँ बाप का दिया हुआ नाम तक छोड़ दिया घर छोड़ा देश छोड़ा सारे संस्कार छोड़े स्वार्थ के पीछे-पीछे कुछ इतना तेज दौड़ें कि न कोई संगी-साथी है न कोई अपना है मिलियन्स बन जाए यही एक सपना है करते-धरते अपनी मर्जी हैं पक्के मतलबी और गर्जी हैं उसूल तो अव्वल थे ही नहीं और हैं अगर तो वो फ़र्जी हैं पैसों के पुजारी बने स्टाँक्स के जुआरी बने दोनों हाथ कमाते हैं फिर भी क्यूं उधारी बने? किसी बात की कमी नहीं फिर क्यूं चिंताग्रस्त हैं? खाने-पीने को बहुत है फिर क्यूं रहते त्रस्त हैं? इन सब को देखते हुए उठते कुछ प्रश्न हैं पैसा कमाना क्या कुकर्म है? आखिर इसमें क्या जुर्म है? जुर्म नहीं, यह रोग है विलास भोगी जो लोग है 'पेरासाईट' की फ़ेहरिश्त में नाम उनके दर्ज हैं पद-पैसो के पीछे भागना एक ला-इलाज मर्ज़ है