Monday, February 18, 2008

कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

जिसे भी देखिए वो अपने हाल में गुम है
कार मिली है मगर कारपूल नहीं मिलता

तेरे जहां में ऐसा नहीं कि जॉब न हो
कहीं 'सेलरी' तो कहीं 'टाईटल' नहीं मिलता

हुआ है भारत छोड़ो आंदोलन अब कामयाब
मेरे वतन में एक भी होनहार नौजवां नहीं मिलता

अमेरिका में है हर चीज हासिल
मगर आसानी से आशियां नहीं मिलता

दुनिया है आज कम्प्यूटर के दम से
रह जाता दफ़्तरों में ही 'गर चूहा नहीं मिलता

उखाड़ देते हैं कुदरती हरियाली को
मनचाहा बाग बनाने वाला बागबां नहीं मिलता

उनको मिले ख़ुदा जिन्हे हैं ख़ुदा की तलाश
मुझे तो किसी भी मंदिर में मेरा जूता नहीं मिलता

कहता है ज़माना कि राहुल हो गया पागल
मस्जिद में भगवान और मंदिर में ख़ुदा नहीं मिलता

एक निर्दोष स्वर्ण हिरण को मारने वाले के अलावा
मेरी शाकाहारी माँ को भी पूजने के लिए दूजा नहीं मिलता

गाँधी ने पूजा क़ातिल को, माँ ने पूजा शिकारी को
नेता तो दूर यहाँ तो ढंग का देवता नहीं मिलता

रात के बाद सुबह की ये रीत मुझे रास न आई
न होती सुबह तो सपना टूटा नहीं मिलता

सारे दिन शाम का इंतज़ार किया
भरी दोपहर तो सुबह का भूला नहीं मिलता

रह जाती मेरी रचना गुमनामी में
आप कदरदानों का 'गर सहारा नहीं मिलता

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)

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2 comments:

Anonymous said...

rah jaate sabke khayaal bhi prose mein, agar logon ko aap jaisa talented kavi nahin milta

Pankaj said...

bahut sundar rahul ji.