Showing posts with label new. Show all posts
Showing posts with label new. Show all posts

Thursday, September 12, 2013

मैं तूझे बेच पाता कैसे

हो धूप या बारिश या बर्फ़

सबसे बचाया तूने

मेरे बच्चों को स्कूल

पहुँचाया तूने

मेरे बेटे को लाइसेंस

दिलाया तूने

अच्छे-बुरे हर बोझ को

उठाया तूने

ऊँचे-नीचे, टेढ़े-मेढ़े, कच्चे-पक्के रास्तों को

सुगम बनाया तूने

मैं तूझे बेच पाता कैसे



दुनिया भर की अच्छी-बुरी खबरेँ

सुनाई तूने

पीटर सेगल के फ़ट्टे

सुनाए तूने

कार-टॉक के ठहाके

गूँजे तूझमें

कभी किशोर तो कभी लता के नगमे

सुनाए तूने

मैं तूझे बेच पाता कैसे





मेरे हाथों से

मेरी आंख़ों से

मेरी यादों से

जुड़ी मलिका

मैं तुझे बेच पाता कैसे

सो तूझे एन-पी-आर को दान दे आया हूँ

ऐसा लगता है कि

किसी अपने को

हमेशा-हमेशा के लिए

छोड़ आया हूँ



तेरी एक चाबी

मेरे बेटे के की-चैन में

गलती से रह गई है

उसे छू कर मैं तेरा भरम कर लूँगा

और तेरे न होने के ग़म को भूला दूँगा



शायद ये गलती नहीं थी

तेरी ही सोच थी

कि तू मेरे हाथ कोई निशानी छोड़ जाए



11 सितम्बर 2013

सिएटल । 513-341-6798

Monday, April 12, 2010

ब्राउनियन मोशन में जीव-सार सारा


झोपड़ी के दीप सा टिमटिमाता तारा
भटकता है नभ में ज्यों भटके शिकारा

भटकना ही जीव का दीन-ओ-धरम है
ब्राउनियन मोशन में जीव-सार सारा

भटकना न होता तो पाषाण होते
न हिलते, न डुलते, न होते बीच धारा


जीवन है जीना तो बहना है निश्चित
जीते जी किसी को न मिलता किनारा

मोक्ष की आस में आँख जो हैं मूंदे
चेतन से जड़ की और जा रहे हैं यारा

सिएटल । 425-445-0827
12 अप्रैल 2010
=================================
ब्राउनियन मोशन =
Brownian Motion

Wednesday, April 7, 2010

कैलेंडर और घड़ी

कैलेंडर है एक
तिथियाँ कई हैं
इनमें स्थित
परिस्थितियाँ कई हैं

कैलेंडर से छोटी
कैलेंडर से बड़ी
दुनिया में नहीं
कोई ऐसी किताब
बारह पन्नों के बीच में
जो सौंप दे सारा जहाँ

बच्चों की छुट्टी
बुआ का ब्याह
ग्वाले का दूध
धोबी की लिस्ट
पड़ोसी का डिनर
मौसी का नम्बर
सोख लेता है सब का सब
खानों में खचा-खच
ये कैलेंडर

इसमें छिपा है
हम सबका हाल
इसे पता है
पग पग की बात

राम का जन्म
रावण का दाह
पितरों का श्राद्ध
होली की आग
गाँधी का जन्म
आज़ादी की रात

अरे!
तो हम कभी गुलाम थे?
परदेसी करते हम पे राज थे?
करते उन्हें हम सलाम थे?

आँखें हमारी ये है खोलता
खून हमारा है खौलता
अपनी किस्मत को हम हैं कोसते
तारीख़ बदलने को हैं दौड़ते
तारीख़ तो बदल सकते नहीं
तारीखें बदल कर रह जाते हैं
महीनों के नाम अदल-बदल कर
संवत् नए चिपकाते हैं

लेकिन
घड़ी की टिक-टिक नहीं बदल पाते हैं
और वो वही की वही टिकी रह जाती है
जहाँ लंदन के आका उसे सेट कर जाते हैं

आज भी ग्रीनविच का दिल इसमें है धड़कता
आज भी काँटे उन्हीं के हैं घूमते
बेड़िया नज़र आती नहीं
मगर हम हथकड़ी उन्हीं की पहन कर हैं घूमते

सिएटल । 425-445-0827
7 अप्रैल 2010
=================================
कैलेंडर = calendar; लिस्ट = list; डिनर = dinner;
नम्बर = number; तारीख़ = history, date;

Monday, April 5, 2010

मैंने मोहब्बत की है

मैंने मोहब्बत की है और अनेकों से की है
जिसकी सज़ा मुझे बरोबर मिली है

कहता था मैं महबूब जिनको
पाता हूँ आज मैं दूर उनको

ऐसा नहीं कि मोहब्बत में कमी थी
बस फ़क़त एक की वो जागीर नहीं थी

दुनिया को मोहब्बत से भली रंजिश लगी है
इसीलिए तो हो एक से ऐसी बंदिश नहीं है

झूठ कहती है दुनिया कि मोहब्बत निभाओ
नियम तो यह है कि जिसे ब्याहो, बस उसे ही चाहो

दिल दिया कुदरत न मुझको
फिर नियम क्यूँ इंसां के मानूँ?
कब कहाँ बैठे उठे ये
किताब पढ़ कर क्यूँ ये जानूँ?

झूठी दुनिया
झूठे लोग
इनके रोके
कब रूका ये रोग

इश्क़ हुआ है
और इश्क़ होगा
एक नहीं
कई बार होगा

सिएटल । 425-445-0827
5 अप्रैल 2010

Thursday, February 11, 2010

राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

जब हो टोयोटा की कंडम कार
और ओबामा की ठप्प सरकार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

सोच समझ के ली थी कार
और ओबामा को पहनाया हार
उसका नतीजा निकला ये
कि दे दी दोनों ने मुझको हार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

चलना है जिसको वो चलती नहीं
रूकना है जिसको वो रूकती नहीं
टोयोटा-ओबामा में मैं ऐसा फ़ंसा
कि डूब गया मेरा घर-संसार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

हमने इसको राज दिया
इसने हमको त्याग दिया
खुद है शहंशाह, पाए ईनाम
और रहे हम बेकाम बेकार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

करता धरता कुछ भी नहीं
देश के हित की सुध भी नहीं
'चेंज' और 'होप' के नारे लगाए
और जब देखो तब कहे जी-ओ-पी मक्कार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

जब जब आए संकट बड़े
माइक लिये ये दिखाए पड़े
वक्ता है, नहीं नेता है
मझधार में नाव की जो खेते पतवार
राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

सिएटल । 425-445-0827
11 फ़रवरी 2010
====================
'चेंज' = change
'होप' = hope
जी-ओ-पी = GOP = Grand Old Party = Republican Party

Monday, January 4, 2010

१ जनवरी का इंतज़ार


मैं हर साल
१ जनवरी का
बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ
आँखें फ़ाड़े-फ़ाड़े ताकता रहता हूँ
कि जैसे ही वो दिखे
मैं उसे सीने से लगा लूँ
और एक पल के लिए भी उसे अलग न होने दूँ

जैसे
कोई
बस स्टॉप की
बेंच पर
बटुआ
ब्लैकबेरी
चश्मा
टोपी
या
छतरी
रख कर भूल जाए
और याद आने पर
उल्टे पाँव
दूसरी बस पकड़ कर
लौट आए
और आँखें फ़ाड़-फ़ाड़ कर ताके
कि जैसे ही वो दिखे
वो उसे सीने से लगा ले
और एक पल के लिए भी अलग न होने दे

अगर चोर-उचक्कों का मोहल्ला न हो तो
आशा और भी बढ़ जाती है

और इतने बड़े ब्रह्माँड में
जिस स्थान से
धरती एक साल पहले गुज़री थी
उस स्थान पर किसी और का आना
लगभग असम्भव ही है

इसलिए
मैं हर साल
१ जनवरी का
बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँ …

सिएटल । 425-445-0827
4 जनवरी 2010
================
बस स्टॉप = bus stop
बेंच = bench
ब्लैकबेरी = Blackberry

Thursday, December 31, 2009

2010

दो शून्य
या एक शून्य?
जो भी हो
बस रहे पुण्य

पाप न आपके साथ रहे
खुशियों की बरसात रहे

और हाँ
इस वर्ष आप कुछ खास करें
हिंदी लिखने का प्रयास करें

जब आप हिंदी पढ़ और बोल सकते हैं
तो हिंदी लिख भी सकते हैं
और नहीं लिख सकते,
तो लिखना सीख भी सकते हैं

http://www.giitaayan.com/x.htm पर जाए
और एक बार लिख कर देखें

कैसे लिखें कुछ समझ न आए बात, मुझसे कहें
कोई पल हो दिन हो या रात, मुझसे कहें
कोई मुश्किल कोई परेशानी आए
या लगे कुछ ठीक नहीं है फ़ाँट
मुझसे कहें

ऋषि लिखना हो या लिखना हो श्रृंगार
और लिखें ये रिषि, श्रिन्गार या ष्रंगार
मानें कभी ना हार
मुझसे कहें

मैं हूँ ना

सिएटल 425-898-9325 upadhyaya@yahoo.com
(
जावेद अख़्तर से क्षमायाचना सहित)

Thursday, November 19, 2009

मणियाँ

फूलों की बगिया ज्यों किश्तों में खिलती है
इंसां की किस्मत भी किश्तों में जगती है

भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है?
होने-बरसने में यारो इक उम्र गुज़रती है

मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना
इन के ही मिश्रण से शख़्सियत निखरती है

जब आता है संकट, हम खुद को परखते हैं
और मूल्यों-विश्वासों की दुनिया सँवरती है

जब होता है मन का, तो लगता है अच्छा
जब मन का न हो, तभी तो मणियाँ निकलती हैं

सिएटल
19 नवम्बर 2009

Monday, November 16, 2009

मेरी कलम

कोई पूछे कि न पूछे
ये कलम मुझको बुलाती है
हर मोड़ पे, हर हाल में
ये गीत सुनाती है

शमा जलती है, बुझती है
मिट जाती है जल कर
दिनकर आ के, जगमगा के
चला जाता है थक कर
इक कलम ही है
जो दु:ख-सुख में
मेरा साथ निभाती है

ताज हो, तख्त हो, दौलत हो
ज़माने भर की
उस पे बंदिश कि
न कहो बात अपने मन की
ऐसी ज़िंदगी भी कहीं
ज़िंदगी कही जाती है

कोई पक्षपात करे, द्वेष करे
जाल बिछाए
कोई नेता हो, अभिनेता हो
या लाख कमाए
सब के वादों को, इरादों को
ये साफ दिखाती है

कोई रूठे, कोई फूले
या कोई आँख दिखाए
बन के यमदूत भी
'गर आप मुझे लाख डराए
ये न रूकी है
न रुकती है
न रोकी जाती है

सिएटल
16 नवम्बर 2009

Friday, November 6, 2009

जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना है

जहाँ से हम आए हैं
वहीं हमें जाना हैं
ज़मीं से आए हैं
ज़मी में समाना है

रंगीं हो पत्ते
या काले हो बादल
अंत तो सभी का
वही पुराना है

बड़े से आसमां में
मैं ढूंढता था जिसको
टेका जो माथा तो
उसे यहीं पे जाना है

अब गली-गली हाथ फैलाए
मैं भीख मांगूँगा नहीं
क्योंकि कदमों तले मेरे
गड़ा खजाना है


'गर होता वो उपर
तो सोचो आस्ट्रेलिया का क्या होता?
जहाँ हूँ मैं
वहीं उसका ठिकाना है

सिएटल 425-898-9325
6 नवम्बर 2009

Saturday, October 31, 2009

देख तेरे एन-आर-आई की हालत

देख तेरे एन-आर-आई की हालत
क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया शैतान
कितना बदल गया शैतान

हंस की चाल कौआ ज्यों चलता
मूँछ मुड़ा बंदा ये विचरता
खान-पान, परिधान ये बदले
बोल-चाल व नाम भी बदले
बदले ये पहचान

अपनी धरोहर न अपनाना चाहे
दूर-दूर उससे रहना चाहे
भूल चुका जो अपनी ज़ुबाँ को
मान न दे जो अपनी माँ को
एन-आर-आई वो संतान

पढ़ा लिखा के देश ने सींचा
फल वो पाए जो दे दे वीसा
ऐसी कैसी कौम ये ईश्वर
देश की निंदा करे निरंतर
कहे भारत श्मशान

जहाँ भी देखे रुपया-पैसा
वहीं पे डाले अपना डेरा
सूट में लेकिन लगे भिखारी
जिसमें नहीं स्वाभिमान

बन के मेहमां देश में आए
एक भी दमड़ी खर्च न पाए
तरह-तरह की बात बनाए
अपने जहाँ के गीत वो गाए
गाए गौरों के गुणगान

सुख-सुविधा का इतना आदी
बुरी लगे उसे अपनी माटी
माँ के हाथ का खा ना पाए
पानी हलक से उतर ना पाए
करे तुरंत प्रस्थान

सिएटल | 425-898-9325
31 अक्टूबर 2009
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)

Monday, October 26, 2009

हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

नाम भी, काम भी, कमाई भी
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की नेमत
कि केक खाई भी और केक बचाई भी

बात-बात में ले आते हैं देश की बात
कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई भी

शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ
कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी

कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन
आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी

भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती है
जेब में है लाख मगर छूटती नहीं एक पाई भी

शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच भी साथ
हाय किस मिट्टी का बना है एन-आर-आई भी

कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो
कभी देता है मुझे गाली तो कभी बधाई भी

सिएटल 425-898-9325
26 अक्टूबर 2009
(
फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, October 21, 2009

एच-वन से भरी मेरी सी-वी

एच-वन से भरी मेरी सी-वी
मजबूर करे पीसने के लिए
पागल सा भटकता रहता हूँ
सही दाम पे मैं बिकने के लिए

मिलियन्स बनाउँगा मैं भी कभी
मैं भी अमीर कहलाऊँगा
हर ज़रूरत जब होगी पूरी
तब लौट के घर मैं जाऊँगा
घर बार सभी मैं तजता हूँ
सपनों के पीछे जगने के लिए

निर्धन की तरह मैं रहता हूँ
पाई-पाई मैं गिनता हूँ
फ़्री में कोई कुछ भी बाँटे
मैं हाथ फ़ैलाए फिरता हूँ
आईस-क्रीम का एक स्कूप ही काफ़ी है
घंटों लम्बी लाईन में लगने के लिए

सिएटल 425-898-9325
21 अक्टूबर 2009
(
इंदीवर से क्षमायाचना सहित)
================================
एच-वन = H1; सी-वी = CV = Curriculum Vitae
मिलियन्स = millions; फ़्री = free
आईस-क्रीम = ice-cream; स्कूप = scoop; लाईन = line

Friday, October 9, 2009

मनमोहक दृश्य


बहारें रंग भरती हैं
कोहरा रंग चुराता है
भरने-लुटने के संवाद में
पत्तियों का रूप मनोरम हो जाता है

बावला बाबुल
वात्सल्य का अंधा
समझ नहीं कुछ पाता है
शाख बढ़ा कर
हाथ हिला कर
शू-शू करता जाता है

नटखट कोहरा
बाज न आए
इत-उत मंडराता है
कभी इधर से
कभी उधर से
पत्तियों को छूता जाता है

देख कुदरत की ऐसी झाँकी
मन मोहित हो जाता है
कवि हृदय कविता लिखता है
भँवरा गुन-गुन गुण गाता है

सिएटल 425-898-9325
9 अक्टूबर 2009

Wednesday, October 7, 2009

जीत गया भई जीत गया

जीत गया भई जीत गया
इंडिया वाला जीत गया
गोरों की जमात में
बंदा अपना दिख गया

नाम ही अपने कुछ ऐसे हैं
कि दूर से पहचान लेते हैं
ये दक्षिण का है
ये अहिंदी है
बिन बोले ताड़ लेते हैं

एक बार फिर वही जीता है
जो अंग्रेज़ी बोलना सीख गया

सीख गया भई सीख गया
इंडिया वाला सीख गया
आत्मसम्मान खो के वो
सम्मान पाना सीख गया

भाषा से विचार बनें
और विचार से आचार
जो माँ की बोली बोल न पाए
वो माँ से करेगा क्या प्यार

सोने चाँदी के टुकड़ों पे
माँ का दूध फिर आज बिक गया

बिक गया भई बिक गया
इंडिया वाला बिक गया
गरीबी और बेरोज़गारी में
माँ से माँ का लाल छीन गया

ज्ञान-विज्ञान की भाषा में
कहीं दिल की बात भी होती है?
लाख चांदनी रात में हो
रात तो रात ही होती है

वो जब समझेगा तब समझेगा
आज तो बंदा हिट गया

हिट गया भई हिट गया
इंडिया वाला हिट गया
दूर-दराज की रोशनी पे
नूर अपना मर-मिट गया

सिएटल 425-898-9325
7 अक्टूबर 2009

Thursday, October 1, 2009

मैं आब हूँ, मगर …

मैं आब हूँ
मगर बेताब नहीं हूँ
आपे से बाहर हो जाऊँ
इतना बदहवास नहीं हूँ
कि उठूँ और उठ के
सबको डूबो दूँ
मैं सर से कदम तक
लबलबाता
सैलाब नहीँ हूँ

मैं सोता हूँ
बहता हूँ
गुज़रता हूँ बागों से
हरी-भरी क्यारियोँ में
मिलता हूँ प्यासों से
मैं आब हूँ
मगर तेज धार नहीं हूँ
कि गिरूँ और गिर के
सबको मिटा दूँ
मैं उपर से नीचे
भड़भड़ाता
प्रपात नहीँ हूँ

अंजलि भरो
भर के मुँह से लगा लो
घड़े भरो
भर के सर पे बिठा लो
तुम जैसे कहो
बिलकुल वैसे रहूँ मैं
जिस रूप में भी ढालो
उस रूप में ढलूँ मैं
लोटे में
बाल्टी में
किसी में भी डालो
ठंडे में
गरम में
किसी में मिला लो
मैं आब हूँ
मगर 'फ़ेक' आब नहीँ हूँ
कि पल भर चमकूँ
और गायब हो जाऊँ
मैं सूरज के भय से
सकपकाता
शब-आब नहीँ हूँ

धरा से परे
तुमने जहाँ धरा कदम है
न पा के मुझे
किया किस्सा खतम है
तुम मुझ पे हो निर्भर
मुझ बिन निर्बल
मुझ से है जीवन
जलते हो मुझ बिन
मैं आब हूँ
मगर तेजाब नहीं हूँ
कि छल से छलकूँ
और सबको सताऊँ
मैं तिरिया के नैनों में
डबडबाता
बे-हिस-आब नहीँ हूँ

सिएटल 425-898-9325
1 अक्टूबर 2009
====================
आब = पानी
प्रपात = झरना
फ़ेक = fake
शब-आब = ओस
बे-हिस = भाव रहित

Monday, September 28, 2009

माताएँ खलनायकों की

रात को सोते समय
बेटे को सुनाता हूँ कहानी
राम के
कृष्ण के
उद्भव की कहानी

बहुत दिनों तक
सुनने के बाद
बेटा एक दिन बोला

कृष्ण की माँ थी देवकी
और यशोदा जी ने उन्हें पाला
राम की माँ थी कौशल्या
और कैकयी ने उन्हें निकाला

लेकिन
रावण की
कंस की
माँ के बारे में
क्यूँ नहीं कुछ बताया?

क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
कैसे उसे समझाऊँ
कि इस कोशिश में
कि कहानी सशक्त बन सके
कई खटकर्म किए हैं जाते
घटनाएँ जोड़ी जाती हैं
पात्र छाँटे जाते
खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते
तरह तरह के जामे
पहनाए उन्हें हैं जाते
नख-शिखा-दाढ़ी-मूँछ
सर-सींग लगाए हैं जाते

खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते

सिएटल 425-898-9325
विजय दशमी, 2009

Thursday, September 17, 2009

अर्जुन आँखें

हाईवे बने
और गाँव के गाँव
उजड़ गए
लोग
फ़र्राटे से
हवा से बातें करते-करते
उपर-उपर से निकल गए

जब से जी-पी-एस आया
समंदर, झील, तालाब, झरने
सब के सब ओझल होते जा रहे हैं

इस्कान का मंदिर
बच्चों का स्कूल
रंग बदलते पत्ते
सामने होते हुए भी
दिखाई नहीं देते

हमारी
अर्जुन आँखें
गड़ी रहती हैं
एल-सी-डी स्क्रीन के
एक
नीले
नुकीले
तीर पर

सिएटल 425-898-9325
17 सितम्बर 2009

Tuesday, September 15, 2009

गुल खिलाना है बाकी



अभी लाश नहीं हूँ 
अभिलाषा है बाकी 
चाहा है तुमको 
तुम्हें पाना है बाकी 

दिल में मेरे तुम 
कब से बसे हो 
आँखों से आँखें 
मिलाना है बाकी 

आते ही रहते हो 
ख़्वाबों में हर दिन 
रातों में तुम्हारा  
आना है बाकी 

सबसे हसीं तुम 
जग में सनम हो 
हाथों से तुम्हें  
सजाना है बाकी 

 बागी नहीं 
बागबां है राहुल 
बागों में फिर से 
गुल खिलाना है बाकी 

राहुल उपाध्याय | 15 सितम्बर 2009 (अमरीका आने की 23 वीं वर्षगाँठ) | सिएटल 

Monday, September 14, 2009

पहेलियाँ

पिछले वर्ष की तरह इस बार भी हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत हैं कुछ पहेलियाँ। पहेलियों के उत्तर से 'शुद्ध हिंदी' वालों को आपत्ति हो सकती है। क्योंकि कुछ शब्द या तो उर्दू के हैं या अंग्रेज़ी के - शुद्ध हिंदी के नहीं। या ये कहूँ कि उनकी जड़ संस्कृत में नहीं है। मैं ये समझता हूँ कि ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध होती है, नष्ट नहीं। चाहे कितनी ही नदियाँ सागर में मिल जाए, सागर नष्ट नहीं होता, भ्रष्ट नहीं होता, प्रदूषित नहीं होता।

कैसे हल करें? उदाहरण स्वरूप
पहेली #19 से पहेली #26 और उनके हल देखें। कुछ उदाहरण नीचे भी देख लें।

(1)
जब भी कहीं लगा X XX(1, 2)
साधु-संतों को किया XXX (3)

(2)
यह बात सच सौ XXX है (3)
कि आरक्षण वालों ने कम XX X है (2,1)

(3)
जिन्हें सताते XXXX हैं (4)
क्या वे भक्त XX X X हैं? (2, 1, 1)

(4)
इठलाती हसीनाओं को कभी अपना X XX (1, 2)
क्या पता कब डस लें बन के XXX (3)

बोनस:
तुम्हारी बाहों ने दी थी मुझे XX XXX (2,3)
वो सच था या थी कोरी XXXX ? (3.5)

उदाहरण:
क -
जब तक देखा नहीं ??? (3)
अपनी खामियाँ नज़र ?? ?(2, 1)

उत्तर:
जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियाँ नज़र आई ना

ख -
मफ़लर और टोपी में छुपा ?? ?? (2, 2)
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई ??? (3)

उत्तर:
मफ़लर और टोपी में छुपा सर दिया
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई सर्दियाँ

अधिक मदद के लिए अन्य पहेलियाँ यहाँ देखें:
http://mere--words.blogspot.com/search/label/riddles_solved

शुद्ध हिंदी के विषय पर आप मेरा एक लेख और एक कविता यहाँ देख सकते हैं:

शुद्ध हिंदी - एक आईने में - http://mere--words.blogspot.com/2007/12/blog-post_03.html
बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे - http://mere--words.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html

सद्भाव सहित,
राहुल