सांसों की माला
धड़कन की सरगम
टूट गई तो चल दिए
कहाँ गए, कौन गया
वेद-पुराण न कुछ कह सके
चांद भी होगा, तारे भी होंगे
लेकिन दोबारा हम ना मिलेंगे
शरीर नहीं तो कुछ भी नहीं है
स्थूल ही तो सूक्ष्म धरे है
जीवन से कोई शिकवा नहीं है
जीवन से ही तो हम-तुम मिले हैं
ये बगिया, ये उपवन हर सू खिले हैं
जहां भी जाऊं, जलवे हैं इसके
इससे कहाँ कुछ मेरे गिले हैं
जीवन जो है वो ठहरता नहीं है
जो आया है वो सदा रहता नहीं है
नया पुराना होता है आखिर
नया सदा नया रहता नहीं है
ऐसा है क्या जो हम न समझे
कि कोई गया तो बस रोने लगे
बुझता है दीपक
जलता है दीपक
लौ को चाहिए
कोई तो ईंधन
आत्मा से रिश्ते
आत्मा से बंधन
बनते नहीं हैं
आत्मीय रिश्ते
आत्मीय जन ही
लौ के हैं ईंधन
राहुल उपाध्याय । 2 मई 2026 । सिएटल
