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Thursday, May 20, 2021

छद्म संवेदनाएँ

इस कोविड ने 

बड़ा ग़ज़ब ढाया 


पहले लोग 

इमेल में 

आटो सिग्नेचर से

प्रणाम करते थे


अब

व्हाट्सेप पर

ब्राडकास्ट से

कुशल क्षेम पूछते हैं 


एक लम्बा चौड़ा संदेश 

जिसका तात्पर्य यह कि 

आप ठीक हैं?

बड़े दिनों से

सम्पर्क नहीं हुआ

सो मन में विचार आया


जबकि पाँच मिनट पहले ही 

उन तक मेरी कविता 'पहुँची' थी 


और हद तो तब हो गई 

जब हूबहू यही शब्द 

औरों के स्टेटस पर भी 

नज़र आए


सब फ़ॉरवर्ड होते देखा

लेकिन संवेदनाएँ 

फ़ॉरवर्ड होतीं

अब नज़र आईं 


हम इतने 

अनपढ़ 

या आलसी हो गए हैं कि 

ख़ुद से कुछ लिखना

किसी को ध्यान में रखकर लिखना

कष्टकर लगता है 


ग़लती से यदि मैं

इन छद्म संवेदनाओं को

सच मान बैठता 

और जवाब दे देता

तो जैसे मेरी कविता नहीं पढी गई

वैसे ही मेरा उत्तर भी 

बिन पढ़े डीलिट हो जाता 


यदि मैं ग़लती से

फ़ोन कर देता

(जैसा कि मैं अक्सर करता हूँ)

तो हैलो-हाय के बाद ही

वे मुझसे हाथ धो लेते कि 

दो मिनट और बात की

तो कहीं धन से ही न

हाथ धो बैठें


राहुल उपाध्याय । 20 मई 2021 । सिएटल 







Monday, February 22, 2021

बिटकॉइन जिसे कहते हैं

बिटकॉइन जिसे कहते हैं 

एक ऐसी लुनेसी है

गिर जाए तो सट्टा है

बढ़ जाए तो करेंसी है


अच्छा सा कोई प्रोडक्ट 

अच्छी सी कोई सर्विस

देते हो तो खोलो

वरना बेकार की एल-एल-सी है


बरसात का बादल तो 

दीवाना है क्या जाने 

किस राह से बचना है 

किस खेत में इमरजेंसी है


ग़म हो कि ख़ुशी दोनों 

कुछ दिन के रूम मेट्स हैं

फिर कोई न अपना है

वेकेंसी ही वेकेंसी है


(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 21 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

https://youtu.be/2IXUdmCicMM 





Sunday, January 24, 2021

बादल की बाट न जोहूँ

मेरे पास 

अभी भी 

सीडी प्लेयर है

सीडी हैं

डीवीडी प्लेयर है

डीवीडी हैं

टीवी का एंटीना है

रेडियो है

ताकि कल को अकाल पड़े

तो बादल की बाट न जोहूँ 


और कुछ भी न रहे

तो जब तक 

अगला प्राइम नम्बर अज्ञात है

समय बीताना नहीं एक बोझ है


राहुल उपाध्याय । 24 जनवरी 2021 । सिएटल 



Monday, February 25, 2019

पहले मोहल्ले में

पहले मोहल्ले में
  • लक्ष्मीनारायण जी मारसाब
  • धूलचन्द तेली
  • कारू सुतार
  • गब्बा दा चक्की वाले
  • धबई जी प्रेस वाले
  • डोशी जी दवाई वाले
रहते थे

और पेड़
  • आम के
  • नीम के
  • पीपल के
  • जामुन के
होते थे

अब
किसी को किसी के काम की 
कोई जानकारी नहीं है
और ही कोई सरोकार है
सब बस्ता लटकाए
भेड़-बकरियों की तरह
बस में भरकर जाते हैं
बस में भरकर आते हैं

अब मोहल्ले में
  • त्रिवेदी जी
  • गुप्ता जी
  • व्यास जी
  • पाराशर जी
  • लोढ़ा जी 
रहते हैं

पेड़ या तो रहे नहीं
या जो रह गए हैं
वे किसी किसी के खाते में गए हैं

लाल गाड़ी
अक्सर गुप्ता जी के पेड़ के नीचे खड़ी रहती है
ठेले वाला
व्यास जी के पेड़ के नीचे सब्जी बेचता है

अब पेड़
  • गुप्ता जी के
  • व्यास जी के
हैं

पहले पेड़
  • आम के
  • नीम के
  • पीपल के
  • जामुन के
होते थे ...

25 फ़रवरी 2019
सिएटल

Wednesday, January 23, 2019

किताबें

किताबें तब भी उपयोगी थीं
और आज भी उपयोगी हैं

पहले दरवाज़ा रोकने के काम आती थीं
आजकल मॉनिटर ऊँचा करने में

बहुत पहले
एक समय
वे कवर चढ़ाकर अलमारी में सजाई जाती थीं
ठोकर लग जाने पर सर से लगाई जाती थीं
विद्या मानी जाती थीं

विद्या कब शिक्षा बन गई, कब रोज़गार 
पता ही चला ...

23 जनवरी 2019
सिएटल

Monday, October 15, 2018

तीन साल हुए उसे गुज़रे हुए

तीन साल हुए उसे गुज़रे हुए
और लिंकड-इन कह रहा है कि
उसे जन्मदिन की शुभकामनाएँ दूँ

-आई का बस चलता तो
मेरी तरफ़ से शुभकामनाएँ दे भी दी जातीं
वह उन्हें स्वीकार भी लेता और 
मुझसे पूछ भी लेता कि
तुम कैसे हो? सब ठीक चल रहा है

सूक्ष्म तौर पर 
जड़ में चेतन है
या जड़ और चेतन एक ही हैं
और यह उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना होता

लेकिन 
वह जो जीता है
महकता है
लहलहाता है
क्षुब्ध होता है
वह स्थूल पुंज है

स्थूल नहीं तो कुछ नहीं 
सिर्फ एक सपाट, लम्बा सन्नाटा

16 अक्टूबर 2018
सिएटल

Friday, April 27, 2018

अँगूठे

हम सब एक हैं
कोई भी धर्म हो
देश हो
जात हो
उम्र हो
लिंग हो
सबके सब
स्मार्टफ़ोन में 
मुँह छुपाए
रहे आँखें सेंक हैं

लेकिन मेरी मम्मी और मामी जैसे भी अनेक हैं
जिनमें अभी भी विवेक है
या यूँ  कहिए कि ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं
इसलिए अँगूठे दिए नहीं टेक हैं 

27 अप्रैल 2018
सिएटल

Friday, June 24, 2016

हम अनलिख हैं


पहले अपने हाथों में 
अपना भविष्य होता था
आजकल 'ब्रैन' है
जो खो जाए कहीं
तो हो जाते बेचैन है

अपनों के
नम्बर, जन्मदिन
कुछ भी याद नहीं हैं
गली, मोहल्ला, शहर तो दूर
प्रांत, देश तक भी ज्ञात नहीं हैं

मुम्बई वाला देहरादून में है
हांगकांग वाला थाईलैण्ड में 
प्रीतमपुर वाला गांधीनगर में है
दिल्ली वाला शिलांग में 
और किसी को कानों-कान ख़बर नहीं 

हज़ारों आँकड़े 
इधर से उधर करते रहते हैं
लेकिन अपने बारे में 
दो-चार पंक्तियाँ लिखने से कतराते हैं

हम अनपढ़ नहीं
हम अनलिख हैं

सात समंदर
दशावतार
दुर्गा के नवरूप
दुनिया के सात अजूबे
सब की विस्तृत जानकारी
सबको देते जाते हैं
लेकिन पलट के कोई पूछ ले
तो बग़लें झाँकने लगते हैं

पहले ज्ञानी वो होता था
जिसे ज्ञान हो
आजकल वो
जो भेजे
चाहे उसके ख़ुद के भेजे में कुछ गया न हो

पहले अनपढ़ अँगूठा लगाते थे
आजकल पढ़े-लिखे 
लिखने के बजाय
अँगूठा दिखाने में
बुद्धिमानी समझते हैं
(वो क्या है ना, समय बच जाता है)
और वो भी स्मार्टफ़ोन पर

हम अनपढ़ नहीं 
हम अनलिख है

और कभी-कभार
कुछ लिख भी दिया
तो आधे-अधूरे शब्द 
भाषा खिचड़ी
और लिपि शुद्ध रोमन
देवनागरी पढ़ सकते हैं
लेकिन लिखने में हज़ारों कष्ट 

हम अनपढ़ नहीं 
हम अनलिख है

23 जून 2016
लेब्राडोर समंदर के 39000 फ़ीट उपर
Http://tinyurl.com/rahulpoems
मैं 25 जून से 6 जुलाई तक दिल्ली में हूँ। इस बीच 2 दिन मुम्बई में - 2 और 3 जुलाई। 
सम्पर्क : +91 88004 20323