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Wednesday, November 18, 2020

मगर ऐ अमेरिका फिर भी मुझे तुझसे मोहब्बत है

कभी पलकों पे आँसू हैं, 

कभी लब पे शिकायत है

मगर ऐ अमेरिका फिर भी 

मुझे तुझसे मोहब्बत है


जो आता है, वो रोता है, 

ये दुनिया सूखी-साखी है

अगर है ऐश तो घर पे, 

जहाँ मनती दीवाली है

मगर इण्डिया नहीं जाना, 

अभी बनना सिटीज़न है


जो कमाता हूँ, वो खप जाए, 

बड़ी थोड़ी कमाई है

शेयर पे हाथ भी मारे, 

मगर पूँजी गवाई है

बने मिलियन्स थे ये सपने, 

मगर अब कर्ज़ किस्मत है


गराज में कार है, लेकिन 

मैं दफ़्तर जाऊँ बस लेकर

स्कूल के बच्चे की माफ़िक़, 

लदे बस्ता मेरी पीठ पर

फ़र्क बस इतना कि 

माँ नहीं, बीवी बाँधती टिफ़िन है


(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 9 दिसम्बर 2011 । सिएटल 

https://youtu.be/GVpXwO2rQGA

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Wednesday, March 4, 2020

टीवी जिसे कहते हैं

टीवी जिसे कहते हैं
दु:खों का कटोरा है
हिंसा की दीं कभी ख़बरें 
तो कभी दंगों को निचोड़ा है

कोराना-सा कोई वायरस
इमरजेंसी का कोई आलम 
हर वक़्त का रोना तो 
बेकार का रोना है

चैनल का रिपोर्टर तो
आदत से है लाचार
'गर गुलशन भी वह देखे
तो कहे काँटों का बिछाना है

सी-एन-एन हो कि आज तक
सब बढ़-चढ़ के डराते हैं
जैसे दुनिया का अंत 
बस आज ही होना है

घण्टों-घण्टों की कवरेज 
फिर भी न कुछ हासिल
ले-दे के बस अंत में
हाथ ही तो धोना है

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 4 मार्च 2020 । सिएटल

Friday, February 19, 2016

कभी किसी को मुकम्मल फ़ोन नहीं मिलता


कभी किसी को मुकम्मल फ़ोन नहीं मिलता
कहीं ये फ़ीचर तो कहीं वो फ़ीचर नहीं मिलता

जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
फ़ोन मिला है पर फ़ोन पर नहीं मिलता

तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि नेटवर्क न हो
जहाँ ज़रूरत हो इसकी उधर नहीं मिलता

सूखा सका है भला कौन स्मार्टफ़ोन गीले
गिले हो लाख अगर सुख नहीं मिलता

उनको मिले ख़ुदा जिन्हें है ख़ुदा की तलाश
मुझको तो मेरे यार का नम्बर नहीं मिलता

सिएटल । 425-445-0827
(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)






Friday, December 9, 2011

कभी पलकों पे आँसू हैं

कभी पलकों पे आँसू हैं, कभी लब पे शिकायत है
मगर ऐ अमरीका फिर भी मुझे तुझ से मोहब्बत है

जो आता है, वो रोता है, ये दुनिया सूखी-साखी है
अगर है ऐश तो घर पे, जहाँ मनती दीवाली है
मगर इण्डिया नहीं जाना, अभी बनना सिटीज़न है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

जो कमाता हूँ, वो खप जाए, बड़ी थोड़ी कमाई है
शेयर पे हाथ भी मारे, मगर पूँजी गवाई है
बने मिलियन्स थे ये सपने, मगर अब कर्ज़ किस्मत है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

गराज में कार है, लेकिन मैं दफ़्तर जाऊँ बस लेकर
स्कूल के बच्चे की माफ़िक़, लदे बस्ता मेरी पीठ पर
फ़र्क बस इतना कि माँ नहीं, बीवी बाँधती टिफ़िन है
कभी पलकों पे आँसू हैं...

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)
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इण्डिया = India = भारत
सिटीज़न = citizen
मिलियन्स = millions
गराज = garage
बस = bus
बस्ता = backpack
टिफ़िन = tiffin/lunch

Monday, February 18, 2008

कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

कभी किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

जिसे भी देखिए वो अपने हाल में गुम है
कार मिली है मगर कारपूल नहीं मिलता

तेरे जहां में ऐसा नहीं कि जॉब न हो
कहीं 'सेलरी' तो कहीं 'टाईटल' नहीं मिलता

हुआ है भारत छोड़ो आंदोलन अब कामयाब
मेरे वतन में एक भी होनहार नौजवां नहीं मिलता

अमेरिका में है हर चीज हासिल
मगर आसानी से आशियां नहीं मिलता

दुनिया है आज कम्प्यूटर के दम से
रह जाता दफ़्तरों में ही 'गर चूहा नहीं मिलता

उखाड़ देते हैं कुदरती हरियाली को
मनचाहा बाग बनाने वाला बागबां नहीं मिलता

उनको मिले ख़ुदा जिन्हे हैं ख़ुदा की तलाश
मुझे तो किसी भी मंदिर में मेरा जूता नहीं मिलता

कहता है ज़माना कि राहुल हो गया पागल
मस्जिद में भगवान और मंदिर में ख़ुदा नहीं मिलता

एक निर्दोष स्वर्ण हिरण को मारने वाले के अलावा
मेरी शाकाहारी माँ को भी पूजने के लिए दूजा नहीं मिलता

गाँधी ने पूजा क़ातिल को, माँ ने पूजा शिकारी को
नेता तो दूर यहाँ तो ढंग का देवता नहीं मिलता

रात के बाद सुबह की ये रीत मुझे रास न आई
न होती सुबह तो सपना टूटा नहीं मिलता

सारे दिन शाम का इंतज़ार किया
भरी दोपहर तो सुबह का भूला नहीं मिलता

रह जाती मेरी रचना गुमनामी में
आप कदरदानों का 'गर सहारा नहीं मिलता

(निदा फ़ाज़ली से क्षमायाचना सहित)