कहाँ तक दुःख गिनाऊँ?
नाना का दुःख मनाऊँ
कि नाकाबंदी का?
मेडल का जश्न मनाऊँ
कि बँधुआ मज़दूरों को
ढाढ़स मैं दिलाऊँ?
बढ़ते शेयर पे मैं इतराऊँ
कि महँगाई का रोना गाऊँ?
हर तरफ़ है चिंता
हर तरफ़ है खुशी
किसे छोड़ूँ?
किसे अपनाऊँ?
या लम्बी चादर तान सो जाऊँ?
या बस
दिमाग का दही कर जाऊँ?
राहुल उपाध्याय । 10 अक्टूबर 2026 । सिएटल

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