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Tuesday, November 6, 2007

दीवाली की छुट्टी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

लक्ष्मी की पूजा
और लक्ष्मी कमाना
दोनो को हमने
एक है माना
इसीलिए छुट्टी नहीं लेते हैं हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

मिठाई की दुकान
नहीं होती है बंद
लक्ष्मी कैसे आए
जब दुकान हो बंद
करम का ही दूसरा नाम है धरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

आँफ़िस से छुट्टी
शायद मिल भी जाए
पर स्कूल से
कैसे 'बंक' किया जाए
इम्तहान न दिया तो 'फ़ैल' होंगे हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

दीवाली का दिन भी
ठीक से तय नहीं
आज है या कल
कोइ सहमत नहीं
'वीकेंड' पे मिलो करो झगड़ा खतम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

जैसा है देस
वैसा है भेस
मिल-जुल के खाओ-पिओ
खूब करो ऐश
खामखां आप यूं हो नहीं गरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

Friday, November 2, 2007

दीवाली की शुभकामनाएं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली की रात
हर घर आंगन
दिया जले
उसने जो
घर आंगन दिया
वो न जले

दिया जले
दिल न जले
यूंहीं ज़िन्दगानी चले

दीवाली की रात
सब से मिलो
चाहे बसे हो
दूर कई मीलों
शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो

दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली

अक्टूबर 2000

दीवाली की यादें


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न स्कूल हैं बंद
न हैं आँफ़िस में छुट्टी
किस्मत भी देखो
किस तरह है फ़ूटी
बाँस को भी था
आज ही सताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न वो पूजा का मंडप
न वो फूलों की खुशबू
न वो बड़ों का आशीष
न वो अपनो की गुफ़्तगू
समां फिर ऐसा
मिले तो बताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो मिठाई के डब्बे
वो दस तरह के व्यंजन
न था डाँयबिटिज़ का डर
न थे डाँयटिंग के बंधन
वो खूब खिला के
अपनापन जताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो गलियों में रंगत
वो दहलीज़ पे रंगोली
वो रंगीं पोषाकों में
बच्चों की टोली
सपना सा लगता है
अब वो ज़माना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

याद आता है
वो पटाखों का शोर
बारूद में महकी
वो जाड़ों की भोर
वो रात-रात भर
दीपक जलाना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

सिएटल
24 अक्टूबर 2005

Thursday, November 1, 2007

एक और दीवाली


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

होली का माहौल हो
या दीवाली का त्यौहार
मनाया जाता है
सिर्फ़ शनिवार रविवार

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

एक ही तरह की
महफ़िल है सजती
निमंत्रण देने पर
घंटी है बजती
कर के वही
बे-सर-पैर की बातें
गुज़ारी जाती हैं
वो दो-चार रातें

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

त्यौहार-दर-त्यौहार
वहीं लाल-पीले
कपड़े पहने हैं जाते
वही घिसे-पिटे जोक्स
सुनाए हैं जाते
वही छोले
वही मटर-पनीर
वहीं गुलाब जामुन
और वही खीर

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

पैसे की होड़ में
आगे बढ़ने की दौड़ में
पार की थीं सरहदें
और पार कर गए कई हदें

दोस्तों से बंद हुआ
दुआ-सलाम
भूल गए करना
बड़ों को प्रणाम
धूल खा रहा है
पूजा का दीपक
रामायण के पोथे को
लग गई है दीमक

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

महानगर की गोद में
इमारतों की चकाचौंध में
हैं अपनों से दूर
हम सपनों के दास
न पूनम से मतलब
न अमावस का अहसास

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

21 अक्टूबर 2006

Sunday, October 28, 2007

कैसी होगी दीवाली?

जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां मिलेंगे लोग भूलेंगे रोग खाएंगे मिठाई लगाएंगे भोग आंखों में चमक, अधरों पे मुस्कान मीठी-मीठी बातें बोलेंगी ज़ुबां जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां फटेंगे फ़टाखें गुंजेगे धमाके गली-गली होंगे दोस्तों के ठहाके ये सब कुछ होगा वहाँ और हम-तुम होंगे यहाँ जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां काली रात ठंडी बरसात यहाँ होंगी हमारे साथ शायद हो दिसम्बर में यहाँ जो होगा नवम्बर में वहाँ जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का ा होगा समां उदास न हो निराश न हो इस तरह हताश न हो अभी से जलाओ शमां जो जनवरी तक रहे जवां जलाओ दीपक सजाओ मकां हँसी-खुशी का बनाओ समां सिएटल 27 अक्टूबर 2007