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Friday, June 20, 2008

बिचारा हिंदू

हर दिन हर एक हिंदू पर
ग्रहों की पड़ती मार है
शनि से लेकर शुक्र तक
हर दिन होता वार है

शांतिप्रिय जनता है लेकिन
शांतिप्रिय नहीं भगवान है
किसी के हाथ में है गदा
तो किसी के हाथ तलवार है

राम मिले थे रावण से
कृष्ण मिले थे कंस से
हम जैसे छुटभईयों का
नहीं दर्शन पर अधिकार है

गलती करते हैं सभी
इंसान भी भगवान भी
गलती हो जाती है जब
वो ले लेते अवतार हैं

राम राम रटता रहूँ
दु:ख मेरे हो जाए दूर
कृष्ण जी गीता में ये
कहते नहीं एक बार हैं

न वेद में न पुराण में
हिंदू का नहीं नाम है
दूसरों ने जो दिया
कर लेता स्वीकार है

मंदिरों की भीड़ में
इंसान खोता जा रहा
पांडित्य और पाखंड का
फ़ैल रहा बाज़ार है

उलटे-सीधे ये रीत-रिवाज
'राहुल' समझ पाता नहीं
इसकी गवाही दे रहे
ये उलटे-सीधे अशआर हैं

सिएटल,
20 जून 2008
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अशआर - एक से ज्यादा शेर, शेर का बहुवचन
शेर = उर्दू आदि की कविता के दो चरणों का समूह

Wednesday, April 23, 2008

Stress मिटाने वाले stress दे रहे हैं

Stress मिटाने वाले stress दे रहे हैं
सेमिनार attend करो जोर दे रहे हैं

जल्दी करो, जल्दी करो,
आखरी सेमिनार है
चले आओ, चले आओ,
क्या सोच, क्या विचार है?

Email से कैसे बचा जाए, बतला रहे हैं
Email भेज भेज कर, हमें समझा रहे हैं

30 साल से आप अपने आप जिए जा रहे हैं
लेकिन 'जीने की कला' वो अब समझा रहे हैं

स्कूल-काँलेज आदि में क्यों नहीं सीखा रहे हैं?
कमाने वालो का ही बस क्यों दिमाग खा रहे हैं?
क्यूंकि रकम मिले तगड़ी जहाँ वहीं जा रहे हैं

जीना अगर आ ही गया है तो क्यो न खुशी से जी पा रहे हैं?
नगर नगर लेक्चर-सेमिनार में क्यों धक्के खा रहे हैं?
क्यूंकि जीने के लिए पर्याप्त धन नहीं कमा पा रहे हैं

सांस लेना भी क्या कोई सीखने का काम है?
इसके लिए फ़ीस लेना सरासर कत्ल-ए-आम है
मनुष्य के डी-एन-ए में ये कला पहले से विराजमान है
सोना, जागना, रोना-धोना, खाना-पीना जिसमें प्रधान है

वेद और उपनिषद पर हिंदू को गर्व है अभिमान है
इन्हीं की आड़ में साधु-स्वामी रचते अभियान है

ये कलयुग की महिमा है ये कलयुग का ज्ञान है
इन लुटेरों के हाथों हो रहा तथाकथित उत्थान है

सिएटल,
23 अप्रैल 2008

Monday, February 18, 2008

स्वामी के दीवाने


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

इतनी बेवकूफ़ी भरी हैं इंसानों में
कि पढ़े-लिखे भी गधे हो जाए
स्वामीजी जो नज़र आ जाए चैनल पर
तो पांच बजे भी उठ के खड़े हो जाए
छोटे-बड़े सब लगते दुम हिलाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

इक हल्का सा इशारा इनका
किसी भी रोगी को चंगा कर दे
इस तरह की आस के बदले में
जो जान और माल फ़िदा कर दे
ऐसे भक्त इन्हे और फ़ंसाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

कभी लंदन तो कभी अमरीका
नहीं ढाका या फिर अफ़्रीका
सिर्फ़ रईसो को भक्त बनाते हैं
आलिशान होटलों में शिविर लगाते हैं
और दावा ये कि गीता के श्लोक समझाने हैं
हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैं
सब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैं

(कैफ़ी आज़मी से क्षमायाचना सहित)