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Friday, June 18, 2010

स्वार्थ हेतु मैं जड़ें काट भी दूँगा

जब मैं था एक छोटा सा बच्चा
क्या पता था क्या झूठा-सच्चा


जैसे जैसे मैं होश में आया
धीरे धीरे सब समझ में आया


क्रांतिकारी बन के क्या है करना?
इससे तो अच्छा ठाठ से रहना


भगत-आज़ाद सब दिए गए मारे
आज लगते हैं सिर्फ़ उनके नारे


जन समाज में कोई सुधार नहीं है
सब कहते हैं अच्छी सरकार नहीं है


माँ ने कहा तुम खूब मेहनत करना
जा के विदेश नाम रोशन करना


यहाँ पे ढंग का कोई काम नहीं है
बिन रिश्वत होता कोई काम नहीं है


टाटा, बिड़ला और अम्बानी
बनना हो तो करो बेईमानी


रोज़-रोज़ चोरी बेईमानी करना
इससे तो अच्छा शपथ ले कर कहना -
अमरीकी झंडे की मैं लाज रखूँगा
वक्त आने पर शस्त्र हाथ में लूँगा
इनकी फ़ौज में दाखिल हो कर
मातृभूमि पर बम डाल मैं दूँगा
धर्म हेतु अर्जुन ने परिजन मारे
स्वार्थ हेतु मैं जड़ें काट भी दूँगा


सिएटल | 425-898-9325
18 जून 2010

Monday, April 26, 2010

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए
इक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैं

हमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगा
रोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैं

कहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिन
और हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैं

पीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती संभाले
रोज-रोज नए मॉडल का इंतज़ार करते हैं

हर गलती में हमारा भी कुछ हाथ होगा
इस सम्भावना से हम कहाँ इंकार करते हैं

चलो अच्छा ही हुआ हमने सच सुन लिया
वरना हम तो समझते थे कि हम तुमसे प्यार करते हैं

सिएटल । 425-445-0827
26 अप्रैल 2010
=================================
अलार्म = alarm; मॉडल = model;

Tuesday, September 8, 2009

हर शाम

कुछ आते हैं उग
कुछ उगाता हूँ मैं
हर शाम
दर्द की फसल उगाता हूँ मैं

टेबल लैम्प की
पीली
मटमैली
रोशनी में
आँखें मूंदे
दर्द की उंगली थामे
मैं
पहुँच जाता हूँ
तुम तक
तुम तक
तुम तक
और
उस तक

न कोई है द्वंद
न कोई है तर्क
तुममें और उसमें
न कोई है फ़र्क

जाता हूँ सोने
भीग जाता है तकिया

उगता है सूरज
सब जाता है सूख

होते-होते शाम
कुछ आते हैं उग
कुछ उगाता हूँ मैं
हर शाम …

सिएटल 425-898-9325
8 सितम्बर 2009

Friday, May 23, 2008

मेरा 6 साल का बेटा

मेरा 6 साल का बेटा
मिहिर
अभी से जानता है कि
हमारे सोलर सिस्टम में
आठ ग्रह हैं
पहले नौ होते थे
लेकिन इन दिनों
प्लूटो क्लब से बाहर है

लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि
दूध डब्बों से नहीं गाय से आता है

उसने फल हमेशा
सजे सजाए देखे हैं
कभी दुकान पर
तो कभी घर पर
लेकिन उसने वे फल
कभी पेड़ पर लगे नहीं देखे हैं

हमारे घर में पेड़ हैं
हमारे मोहल्ले में पेड़ हैं
पार्क में
स्कूल में
चारो तरफ़ पेड़ ही पेड़ हैं

लेकिन सारे पेड़ बांझ हैं

एक बार पूछा था
तो पता चला
कि फलदार पेड़ों की
देखरेख बहुत महंगी है
फल आते हैं
तो चिड़िया आती हैं
बहुत गंद फ़ैलाती हैं
फल आते हैं
तो बेहिसाब आते हैं
रोज सड़-सड़ कर गिरेंगे
कौन लेगा जिम्मेदारी
उनकी सफ़ाई की?

वो जानता है कि
उसके डैडी आँफ़िस जाते हैं
सुना है कि
कुछ काम भी करते हैं
लेकिन क्या?

मेरे हाथों से उसने कभी
कुछ बनते नहीं देखा हैं

मेरे काम के बदले
मुझे किसी से कुछ
मिलते हुए भी नहीं देखा है

फल रहित पेड़
फल रहित कर्म
फल रहित जीवन?

सिएटल,
23 मई 2008

Thursday, May 22, 2008

मेरे नाना

मेरे नाना
एक पेड़ के लिए
सारे मोहल्ले से लड़े थे
ये नहीं कटेगा
ये नहीं कटेगा
कहते कहते
अपनी जिद पर अड़े थे
नाना की वजह से
सड़क के विस्तार में
रोड़े आ पड़े थे

सड़क का विस्तार रुक गया था
परिवार का विस्तार हो रहा था

समय अपनी चाल चल रहा था

नाना चल बसे थे
बहूएं आ बसी थी

उनके पोते अपने पाँव पर तो खड़े थे
लेकिन जीवन के और भी तो दुखड़े थे

अपनी आज़ादी का परिचय देने के लिए
खुद को कमरों में कैद करना जरूरी है
अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए
नई नई दीवारें खड़ी करना जरूरी है

एक नहीं
सारे के सारे पेड़ काट दिए गए
ताकि फिर न सर उठा सके
ज़मीन खोद खोद कर
जड़ से ही मिटा दिए गए

मैं साल दो साल में
जब भी वहाँ जाता हूँ
परिवार को हरा-भरा पाता हूँ
लेकिन उस पेड़ को
याद से नहीं मिटा पाता हूँ

मेरे घर में
एक नहीं कई पेड़ हैं
बेडरुम की खिड़की से
देखता हूँ उन्हें
जैसे वो किसी पेंटिंग का हिस्सा हो
मैं उनसे कभी जुड़ नहीं पाता हूँ

सिएटल,
22 मई 2008

Wednesday, May 21, 2008

मैं 25 साल बाद

मैं इस साल दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
25 साल बाद
पहली बार दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

बचपन में कभी कोई चीज नहीं मांगी
क्या मैं अब मांग पाऊंगा?
बचपन में कभी पटाखें नहीं छोड़े
क्या मैं अब छोड़ पाऊंगा?
बचपन में कभी गले नहीं लगाया
क्या मैं अब गले लगा पाऊंगा?

बचपन में मैं पाँव तो छू पाता था
लेकिन दिल की बात छुपा जाता था
क्या मैं अब बतलाऊँगा
और
क्या मैं अब छुपाऊंगा

गुज़र गई हैं हज़ारों रातें
पुरानी हो चुकी हैं जो बातें
क्या मैं उन्हें फिर से छेड़ पाऊंगा?
अनछुए विषयों को
क्या मैं छू पाऊंगा?
ओझल होते हुए सम्बंधों को
क्या मैं सम्बोधित कर पाऊंगा?

या फिर हमेशा की तरह
जाऊँगा और बस जा कर आ जाऊँगा

मैं 25 साल बाद
अपने घर दीवाली पर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

सिएटल,
21 मई 2008

Sunday, May 18, 2008

मैं क्यों लिखता हूँ?

क्यों लिखता हूँ हर एक रात मैं
क्यों लिखता हूँ हर एक बात पे

क्यों लिखता हूँ इतना
क्यों भेजता हूँ इतना
क्यों नहीं थोड़ा रुक कर
दो चार बार जरा सोच कर
शिल्प इस पर मढ़ कर
रूप इसका गढ़ कर
फिर कहीं जा कर
क्यों नहीं भेजता हूँ मैं?

चार दिन की है उमर
वो दिन भी हैं उधार से
सफ़र करता हूँ प्लेन से
आँफ़िस जाता हूँ कार से

कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है
आप वंचित न रह जाए मेरे विचार से
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

मेरे अंदर का तेल जल रहा है
मेरे दीप की बाती भभक रही है
दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज

कल का कोई भरोसा नहीं
न तुम रहो
न मैं रहू
लेकिन यह कतई मंजूर नहीं
कि दुनिया वैसी की वैसी रहे

दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

सिएटल,
18 मई 2008

Thursday, May 15, 2008

आजकल

आजकल सोता कम और ज्यादा जागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

कभी इधर तो कभी उधर
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
दिन भर तो सपनों के आगे पीछे भागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

अपनों को अपना बनाना है मुझे
कुछ बन के उन्हें दिखाना है मुझे
उठते बैठते दिन रात यही राग अलापता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

ये धुन बसी मेरे मन में जब से
दूर हो गया मैं अपनों से तब से
बस अब अपनों को अपने पास चाहता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

वो मुझ में हैं जिसने मुझे बनाया है
पर हाथ में अब तक नहीं आया है
हज़ार बार लाश की तरह खुद को तलाशता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं


सिएटल,
14 फ़रवरी 2008

Monday, May 12, 2008

ऐ मेरे वतन के लोगो

ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम खूब कमा लो दौलत
दिन रात करो तुम मेहनत, मिले खूब शान और शौकत
पर मत भूलो सीमा पार अपनो ने हैं दाम चुकाए
कुछ याद उन्हे भी कर लो जिन्हे साथ न तुम ला पाए

ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख मे भर लो पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पार करने वाला हर कोई है एक एन आर आई
जिस माँ ने तुम को पाला वो माँ है हिन्दुस्तानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

जब बीमार हुई थी बच्ची या खतरे में पड़ी कमाई
दर दर दुआएँ मांगी, घड़ी घड़ी की थी दुहाई
मन्दिरों में गाए भजन जो सुने थे उनकी जबानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

उस काली रात अमावस जब देश में थी दीवाली
वो देख रहे थे रस्ता लिए साथ दीए की थाली
बुझ गये हैं सारे सपने रह गया है खारा पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

न तो मिला तुम्हे वनवास ना ही हो तुम श्री राम
मिली हैं सारी खुशीयां मिले हैं ऐश-ओ-आराम
फ़िर भला क्यूं उनको दशरथ की गति है पानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

सींचा हमारा जीवन सब अपना खून बहा के
मजबूत किए ये कंधे सब अपना दाँव लगा के
जब विदा समय आया तो कह गए कि सब करते हैं
खुश रहना मेरे प्यारो अब हम तो दुआ करते हैं
क्या माँ है वो दीवानी क्या बाप है वो अभिमानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

तुम भूल न जाओ उनको इसलिए कही ये कहानी
जो करीब नहीं हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी

सेन फ़्रांसिस्को
15 अगस्त 2001
(प्रदीप से क्षमायाचना सहित)

Friday, May 9, 2008

मैं आरगेनिक नहीं हूँ

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
मुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड दे कर
बड़ा किया गया है
रात रात जाग कर
फिज़िक्स की प्राँब्लम्स
और गणित के समीकरण
हल किए हैं मैंने
अंग्रेज़ी के कई कठिन शब्द
याद किए हैं मैंने

देखो तो सही
अभी 10 साल का हुआ नहीं है
और इसे 100 तक के सारे
प्राईम नम्बर्स
स्क्वेयर रूट्स
और क्यूब रूट्स
मुँह जबानी याद है
मैं इसे
बोर्नविटा पिलाती हूँ
मेधावटी खिलाती हूँ
रोज सुबह 10 बादाम का
हलवा खिलाती हूँ
देखना एक दिन जरूर आई-आई-टी जाएगा
और विदेश जा कर अपना घर बसाएगा

मैं ज़िंदगी के पहले 20-22 वर्ष
इसी तरह गुज़ार देता हूँ
फ़्लैट की चार-दीवारी में
होस्टल के गलियारों में
टेबल-लैम्प की रोशनी में
पंखों के शोर में

ज़िंदगी का मतलब हो जाता है
कोचिंग
कम्पीटिशन
और पैसा कमाना

शरीर बड़ा हो जाता है
लेकिन दिमाग में
आंकड़ें,
फ़ार्मूलें,
रेस्निक-हेलिडे के हल
घर कर जाते हैं
त्योहार, रस्में, रीत-रिवाज़
सारे के सारे
दरकिनार हो जाते हैं
होली एक हुड़दंग
दीवाली पटाखों का शोर
और पूजा-पाठ एक आडम्बर
बन कर रह जाते हैं

मैं धीरे-धीरे
अलग हो जाता हूँ
अपने परिवार से
अपने समाज से
अपनी संस्कृति से

बड़ा हो जाने पर
मुझे धो-पोछ कर
सजा-धजा कर रख दिया जाता है
वो आते हैं
और मुझे ले कर चले जाते हैं

आज पार्टी है घर में
थोड़ा सलाद के लिए
खीरे-टमाटर-मूली-गाजर भी ले चले
और हाँ उस डाट-नेट प्रोजेक्ट के लिए
ये तीन ठीक रहेंगे
ताजा भी है
दाम भी कम है

जैसे क्रेडिट कार्ड से कोई
सब्जी खरीदता है
वैसे ही ग्रीन कार्ड दे कर
मुझे साथ ले कर चले जाते हैं

और देखते ही देखते
मैं धनाड्यों की फ़्रिज़ की
शोभा बढ़ाने लग जाता हूँ
और उस नियंत्रित वातावरण में
खुद को
सुरक्षित
और भाग्यशाली
समझने लगता हूँ

न आंधी का डर
न तूफ़ां का खौफ़
न चिलचिलाती धूप
न भिनभिनाते मच्छरों का डर

मैं आरगेनिक नहीं हूँ
आरगेनिक होता
तो कब का मिट्टी में मिल गया होता
फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड्स के कारण
फ़्रिज के नियंत्रित वातावरण के कारण
एक लम्बी दासता का बोझ है मुझ पर

यही है दास्तां मेरी
कि
मैं आरगेनिक नहीं हूँ

सिएटल,
9 मई 2008
==================================
आरगेनिक = Organic, developing in a manner analogous to the natural growth and evolution characteristic of living organisms; arising as a natural outgrowth.
फ़र्टिलाईज़र = fertilizer
पेस्टिसाईड = pesticide
फिज़िक्स = physics
प्राँब्लम्स = problems
समीकरण = equations
प्राईम नम्बर्स = prime numbers
स्क्वेयर रूट्स = square roots
क्यूब रूट्स = cube roots
बोर्नविटा = Bournvita
आंकड़ें = data
दरकिनार = sidelined
सजा-धजा = decorate
डाट-नेट = .Net
क्रेडिट कार्ड = credit card
ग्रीन कार्ड = green card
धनाड्य = wealthy
फ़्रिज = fridge, refrigerator
दासता = slavery
दास्तां = tale, story, saga

Wednesday, May 7, 2008

मैं अपनी माँ से दूर

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

हर हफ़्ते
मैं उसका हाल पूछता हूँ
और अपना हाल सुनाता हूँ

सुनो माँ,
कुछ दिन पहले
हम ग्राँड केन्यन गए थे
कुछ दिन बाद
हम विक्टोरिया-वेन्कूवर जाएगें
दिसम्बर में हम केन्कून गए थे
और जून में माउंट रेनियर जाने का विचार है

देखो न माँ,
ये कितना बड़ा देश है
और यहाँ देखने को कितना कुछ है
चाहे दूर हो या पास
गाड़ी उठाई और पहुँच गए
फोन घुमाया
कम्प्यूटर का बटन दबाया
और प्लेन का टिकट, होटल आदि
सब मिनटों में तैयार है

तुम आओगी न माँ
तो मैं तुम्हे भी सब दिखलाऊँगा

लेकिन
यह सच नहीं बता पाता हूँ कि
20 मील की दूरी पर रहने वालो से
मैं तुम्हें नहीं मिला पाऊँगा
क्यूंकि कहने को तो हैं मेरे दोस्त
लेकिन मैं खुद उनसे कभी-कभार ही मिल पाता हूँ

माँ खुश है कि
मैं यहाँ मंदिर भी जाता हूँ
लेकिन
मैं यह सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ
कि मैं वहाँ पूजा नहीं
सिर्फ़ पेट-पूजा ही कर पाता हूँ

बार बार उसे जताता हूँ कि
मेरे पास एक बड़ा घर है
यार्ड है
लाँन में हरी-हरी घास है
न चिंता है
न फ़िक्र है
हर चीज मेरे पास है
लेकिन
सच नहीं बता पाता हूँ कि
मुझे किसी न किसी कमी का
हर वक्त रहता अहसास है

न काम की है दिक्कत
न ट्रैफ़िक की है झिकझिक
लेकिन हर रात
एक नए कल की
आशंका से घिर जाता हूँ
आधी रात को नींद खुलने पर
घबरा के बैठ जाता हूँ

मैं लिखता हूँ कविताएँ
लोगो को सुनाता हूँ
लेकिन
मैं यह कविता
अपनी माँ को ही नहीं सुना पाता हूँ

लोग हँसते हैं
मैं रोता हूँ

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

सिएटल,
7 मई 2008

Monday, April 28, 2008

भूलते नहीं हम

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
प्लास्टिक के मग्गों में दहाड़ते पानी का शोर
लोहे की बाल्टी के हेंडल की खटपट
फ़्लश की गड़गड़ाहट
गीज़र की घरघर

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
लेकिन भूल जाते हैं सब शोर किशोर
याद रहती हैं कुछ वो बातें
जो दिन-रात करती हैं भाव-विभोर

याद रहती हैं
माँ के हाथ की रोटी
पहली बरसात की भीनी खुशबू
देर रात तक दोस्तों की गुफ़्तगू
गाजर का रंग
अपनों का संग

भूलते नहीं हम
बचपन का बाग
सरसों का साग
सावन का राग
सर्दी की आग

भूलते नहीं हम
घुलते नहीं हम
जुड़ते नहीं हम
फलते नहीं हम

लिविंग रुम के कम्फ़र्ट में
कट फ़्लावर्स लगते हैं सुंदर
लेकिन पनपते हैं वो
कीचड़-मिट्टी में ही पल कर

सिएटल,
28 अप्रैल 2008
====================
Glossary:
भोर = morning
मग्गों = mugs
गीज़र = water heater
किशोर = youth
लिविंग रुम = drawing room
कट फ़्लावर्स = cut flowers
पनपते = thrives

Saturday, April 12, 2008

सच

मैं लिखता नहीं  हूँ 

मुझसे लिखा जाता नहीं है 
यूँ अपनों से नाता तो तोड़ा जाता नहीं है 

मैं कहता नहीं हूँ 
मुझसे कहा जाता नहीं है 
यूँ हर किसी को आईना दिखाया जाता नहीं है 

मैं सुनता नही हूँ 
मुझसे सुना जाता नहीं है 
हर मुद्दे पर तटस्थ तो रहा जाता नहीं है 

मैं करता नहीं हूँ 
मुझसे किया जाता नहीं है 
महफ़िल दर महफ़िल अभिनय किया जाता नहीं है 

मैं जीतता नही हूँ 
मुझसे जीता जाता नहीं है 
हर कदम तो फूंक-फूंक कर रखा जाता नहीं है 

राहुल उपाध्याय | 12 अप्रैल 2008 | वाशिंगटन डी सी 

Friday, March 14, 2008

मैं कवि हूँ

मैं कवि हूँ 

कोई किरदार नहीं 
कि एक कुर्ते-पजामें में सिमट जाऊँ 

 मैं कवि हूँ 
कोई सलाहकार नहीं  
कि तुम्हे जीवन जीने की राह दिखाऊँ 

मैं कवि हूँ 
कोई मददगार नहीं  
कि तुम्हारा दु:ख-दर्द मिटाता जाऊँ 

मैं कवि हूँ 
कोई खानसामा नहीं  
जो menu के मुताबिक 
कभी मीठा 
कभी खट्टा 
तो कभी चटपटा 
Item पेश करता जाऊँ 

 मैं कवि हूँ 
कविता मेरा शौक है, मेरा पेशा नहीं  
और तनिक भी शोक नहीं  
कि इसमें पैसा नहीं   

मैं कवि हूँ 
कविता मेरा व्यवसाय नहीं  
शब्दों से खेलता हूँ 
शब्दों की खाता नहीं  
इन्हें बेच कर 
खोलना मुझे बैंक खाता नहीं   

मैं कवि हूँ 
मेरे शब्द बहुरुपी हैं  
मैं भी बहुरुपिया हूँ 
बातें ज़रुर बनाता हूँ 
उनसे बनाता नहीं रुपया हूँ 

 मैं कवि हूँ 
कभी दुनिया की नहीं परवाह की 
जब जो अच्छा लगा उस पर वाह की 

मैं कवि हूँ 
सच कहने से घबराता नहीं  
जानता हूँ कि जिस दम घुटने टेक दूँगा  
उस पल से मेरा दम घुटने लगेगा 

मैं कवि हूँ 
जब भी कहता हूँ 
सच ही कहता हूँ 
लेकिन मैं 'मेरा' ही सच कहता हूँ 
ये आवश्यक तो नहीं कि हमारे-तुम्हारे विचार मिले 
और ये भी उद्देश्य नहीं कि इसके लिए बधाई मिले 

मैं कवि हूँ 
जब भी कहता हूँ 
सच ही कहता हूँ 
लेकिन मैं 'आज' का ही सच कहता हूँ 
मुमकिन है कल मैं खुद ही अपनी बात से पलट जाऊँ 

समय बहता है
मैं भी उसके साथ बह जाऊँ 
आज यहाँ हूँ
कल कहीं और चला जाऊँ 
 तुम लकीर के फ़कीर मत बनना 
मेरे शब्दों से चिपके मत रहना 

मैं कवि हूँ 
मेरा खुद का कोई ठिकाना नहीं  
मेरा कोई भी शब्द अंतिम नहीं  

राहुल उपाध्याय | 14 मार्च 2008 | सिएटल

मेरे दिल की बात

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ
लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

मेरी नज़रों के सामने
पली-बढ़ी हो तुम
कल तक मेरे दिल में थी
आज मेरे सामने हो तुम

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

तुम्हें जी भर कर देखूँ
हाथ बढ़ा कर तुम्हें छू लूँ
तुम्हारे माथे पर बिंदी लगा दूँ
तुम्हारी शान में चार चाँद लगा दूँ
तुम्हारे कदमों में अपना नाम लिख दूँ
अपने होंठों से तुम्हारा रोम-रोम चूम लूँ
तुम्हें सर से पाँव तक आभूषणों से अलंकृत कर दूँ

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ
लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

जो दिल में है वो सब कह दूँ
तुम्हें अपने आगोश में ले कर सो जाऊँ
नींद खुलने पर तुम्हें अपने पास ही पाऊँ
जागते-सोते बस तुम्हें और तुम्हें ही पाऊँ
ख्वाबों में भी तुम आओ और मैं तुम्हें सजाता जाऊँ

मेरे दिल की धड़कनें कुछ तेज होगी
जब सब के सामने तुम आओगी
और हर एक का मन बहलाओगी
तब तुम मेरी नहीं रह जाओगी
लेकिन मैं तुम्हें याद करता रहूगा
और तुम्हें बार बार दोहराता रहूगा
कभी अकेले में
तो कभी महफ़िल में
लेकिन तुम्हें फिर कभी संवार न पाऊँगा

सोचता था तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता था कहीं बिगड़ न जाओ तुम

कह नहीं सकता
किसमें ज्यादा त्रासदी है
इसमें कि
तुम मेरे सामने हो
और मैं तुम्हें संवार नही सकता
क्यूंकि तुम अब किसी एक की नहीं हो
या फिर इसमें कि
दिल चीर कर एक और मसौदा निकालना
उसे अपने हाथों पालना-पोसना
उसे एक नई शक्ल देना
उसे कविता का नाम देना
और उसे ज़माने को सौंप देना

सोचता था तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता था कहीं बिगड़ न जाओ तुम

राहुल उपाध्याय | 14 मार्च 2008 | सिएटल

Tuesday, March 4, 2008

बधाई

लिखी कविता मिली बधाई
कवि के चेहरे पर मुस्कान आई

जलते थे घर, बिलखते थे लोग
कवि ने उसमें दिया ये योग
बैठ के ज्वलंत एक कविता बनाई
लिखी कविता मिली बधाई
कवि के चेहरे पर मुस्कान आई

ताज के बाहर भूखी थी बच्ची
ताज के अंदर कविता थी अच्छी
मिल-जुल के कवियों ने दावत उड़ाई
लिखी कविता मिली बधाई
कवि के चेहरे पर मुस्कान आई

बुरा है शासन, बुरे हैं नेता
कहते थे लेकिन, कवि निकले अभिनेता
शासकीय इनाम के लिए झोली फ़ैलाई
लिखी कविता मिली बधाई
कवि के चेहरे पर मुस्कान आई

ग़म हो, खुशी हो या हो कवि देता दुहाई
पाठक हो, श्रोता हो, सब बस देते बधाई
कवि की बात कोई अमल में न लाई
लिखी कविता मिली बधाई
कवि के चेहरे पर मुस्कान आई

सिएटल,
4 मार्च 2008

Sunday, March 2, 2008

कलंक

इम्तहान में इन्हें मिले ज्यादा कल अंक थे
कौन जानता था कि ये मेरे माथे के कलंक थे

इनके ही आगे-पीछे हम घूमते भटकते थे
'राजा बेटा, राजा बेटा' कहते नहीं थकते थे
आज ये कहते हैं कि 'माँ-बाप मेरे रंक थे'
कौन जानता था …

ये ठोकते हैं सलाम रोज किसी करोड़पति 'बिल' को
पर कभी भी चुका न सके मेरे डाक्टरों के बिल को
सफ़ाई में कहते हैं कि 'हाथ मेरे तंग थे'
कौन जानता था …

उंचा हैं ओहदा और अच्छा खासा कमाते हैं
खुशहाल नज़र मगर बहुत ही कम आते हैं
किस कदर ये हंसते थे जब घूमते नंग-धड़ंग थे
कौन जानता था …

चार कमरे का घर है और तीस साल का कर्ज़
जिसकी गुलामी में बलि चड़ा दिए अपने सारे फ़र्ज़
गुज़र ग़ई कई दीवाली पर कभी न वो संग थे
कौन जानता था …

देख रहा हूं रवैया इनका गिन गिन कर महीनों से
कोई उम्मीद नहीं बची है अब इन करमहीनों से
जब ये घर से निकले थे तब ही सपने हुए भंग थे
कौन जानता था …

जो देखते हैं बच्चे वही सीखते हैं बच्चे
मैं होता अगर अच्छा तो होते ये भी अच्छे
बुढ़ापे की लाठी में शायद बोए मैंने ही डंक थे
कौन जानता था …

सिएटल,
2 मार्च २००८

====================================
Glossary
कलंक = blemish
माथे = forehead
रंक = poor
तंग = tight, as in "budget is tight"
ओहदा = title, position
किस कदर = to what extent
संग = together
रवैया = behavior
करमहीन = good for nothing
भंग = broken
डंक = fangs

Saturday, December 15, 2007

वतन और वेतन


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अब तक कहीं भी लगा न मन
दौलत को ही किया सदा नमन
वतन फ़रामोश हम हैं वे तन
जिन्हें न मिला मुंहमांगा वेतन
तो वतन छोड़ के चल दिये
बुझा के वापसी के दिये

कोसते हैं अब ईश्वर को
थोप दिया क्यूं इस वर को?
ये श्राप जैसा क्यूं वर दिया
कि पहनने लगे विदेशी वर्दीयां

देश ने हमें क्या कुछ न दिया
गंगा जमुना जैसी पावन नदियां
संस्कृत भाषा और सुसंस्कृत लोग
वेद, पुराण, गीता और कर्मयोग

फ़िर भी हमें न रास आया
बाहर क्या ऐसा खास पाया?
कि वतन छोड़ के चल दिये
बुझा के वापसी के दिये

कोसते हैं अब ईश्वर को
थोप दिया क्यूं इस वर को?
ये श्राप जैसा क्यूं वर दिया
कि पहनने लगे विदेशी वर्दीयां

गलती से दशरथ के बाण से
श्रवण हाथ धो बैठा प्राण से
बाप से छूट गई बेटे की डोर
राम चले अभ्युदय की ओर

हमारे पिता से क्या भूल हुई
कि देश की मिट्टी धूल हुई
और वतन छोड़ के चल दिये
बुझा के वापसी के दिये

कोसते हैं अब ईश्वर को
थोप दिया क्यूं इस वर को?
ये श्राप जैसा क्यूं वर दिया
कि पहनने लगे विदेशी वर्दीयां

यशोधरा ने जन्मा राहुल को
जंजाल सा लगा बाबुल को
उठ के ऐसे भागे जैसे चोर
बुद्ध चले निर्वाण की ओर

ये किस जंजाल से भागे हम
कि अभी तक नहीं जागे हम
क्यूं वतन छोड़ के चल दिये
बुझा के वापसी के दिये

कोसते हैं अब ईश्वर को
थोप दिया क्यूं इस वर को?
ये श्राप जैसा क्यूं वर दिया
कि पहनने लगे विदेशी वर्दीयां

आज वतन से दूर हैं हम
झूठ है कि मजबूर हैं हम
बिकने वाले मज़दूर हैं हम
मतलबी और मगरूर हैं हम

छाया कुछ ऐसा ऐश्वर्य का सुरुर
कि एक के बाद एक वतन के नूर
सब वतन छोड़ के चल दिये
बुझा के वापसी के दिये

कोसते हैं अब ईश्वर को
थोप दिया क्यूं इस वर को?
ये श्राप जैसा क्यूं वर दिया
कि पहनने लगे विदेशी वर्दीयां

ध्येय हमारे सही नहीं
श्रद्धेय हमारे कोई नहीं
जिनके पदचिन्ह मार्ग बता सके
जिनके सत्कर्म हमे जता सके
कि कोस नहीं ईश्वर को
तू थाम ले इस वर को
डगर डगर भटकने वाले बंजारे
ठहर किसी एक का बन जा रे

Monday, December 3, 2007

समृद्ध और खुश-हाल भारत

हाथी के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग होते हैं। यह बात समृद्ध और खुश-हाल भारत पर भी लागू होती है। एक तरफ़ हैं विप्रो के अज़िम प्रेमजी और रिलाएन्स का अम्बानी परिवार, दूसरी ओर हैं आत्महत्या करते हुए किसान। एक तरफ़ हैं कोक और पेप्सी, दूसरी ओर है पीने के पानी को तरसती हुई ग्रामीण जनता। असलियत यही है कि बावजूद इतनी तरक्की के आज भी भारत में कामयाब वही समझा जाता है जो देश छोड कर विदेश में धन अर्जित करता है। गांधी जी को सम्बोधित करते हुए मैंने लिखा है -
'भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ है अब कामयाब,
मेरे वतन में एक भी होनहार नौजवां नहीं मिलता
'।   भारत छोड़ने की मेरी इच्छा कतई नहीं थी। हालांकि, मेरे पिता 1966 में इंग्लैंड जा भी चुके थे और 3 साल में पी-एच-डी ले कर आ भी गए थे। मैं 1986 में बनारस से इंजीनियरिंग खत्म कर चुका था और हाथ में एक सरकारी नौकरी भी थी। विदेश जा कर दर-दर की ठोकरे खाने में कोई तुक नहीं दिखाई दे रहा था। मैं आरामपसंद व्यक्ति हूँ। मेरे विचार में स्नातकोत्तर शिक्षा से आज तक किसी का भला नहीं हुआ है।
'कितनी निराली है शिक्षा प्रणाली,
'पास' होते होते सब दूर हो गए'।
  मेरे मामा मेट्रिक पास थे और अपने परिवार के हमेशा पास थे। उनके साथ मैंने कई सुखद गर्मी की छुट्टीयां बितायी है रुनखेड़ा में, जहां वे स्टेशन मास्टर थे। एक बार मुझसे 5 वीं कक्षा में पूछा गया था, क्या बनोंगे बड़े हो कर? मैंने कहा था, "स्टेशन मास्टर!"   बहरहाल, क्लाँस के सब साथी अमेरिका जा रहे थे सो मैं भी निकल पड़ा। और अगले चार साल तक मास्टर्स और एम-बी-ए के दौरान कई पापड़ बेले। मगर कहीं भी कड़वाहट महसूस नहीं हुई, अमेरिका में सब जगह खूब स्नेह मिला। दिक्कत थी तो बस एक कि भारत में सब कुछ बना-बनाया मिल जाता था। घर पर माँ थी और बनारस के होस्टल में महाराज था। यहाँ खुद ही दाल-रोटी बनाओ। बर्तन भी मांजो। कपड़े भी धोओ। झाडू फटका भी करो। 'चले थे बड़ी धूम से बादशाह बनने,
काम काज में फ़ंसे मज़दूर हो गए'
और ये सिलसिला अभी भी जारी है। बड़े से बड़े ओहदे वाला व्यक्ति खुद कार चलाता है, खुद सब्जी-भाजी खरीदता है, खुद कपड़े धोता है, खुद की चाय-काँफ़ी बनाता है, खुद झाड़ू-फ़टका करता है और खुद खाना भी बनाता है। हालांकि मशीनों - वाँशिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर - से आसानी जरूर हो जाती है। पर घर या दफ़्तर में कोई सेवा में हाज़िर नौकर नज़र नहीं आता है।   मैंने भारत में इन्जीनियरिंग की पढ़ाई अवश्य अंग्रेज़ी में की थी। मगर अंग्रेज़ी में कभी वार्तालाप नहीं किया था। अमेरिका में पेट पूजा के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पढ़ाने लगा विश्वविध्यालय में। जाहिर है अंग्रेजी में ही पढ़ाना था। यह मेरे लिए एक गर्व की बात थी कि जिसने 5 वीं कक्षा तक ए बी सी डी तक नहीं सीखी थी, आज 20-25 अमरीकी नवयुवकों को उनकी ही भाषा में एक नई भाषा (पास्कल) सीखा रहा था। और मुझे अपने छात्रों से यथोचित सम्मान भी मिला। और तब मुझे शर्म आई यह सोच कर कि किस तरह हम नए अध्यापक का मज़ाक उड़ाया करते थे बनारस में।   ग्लानि इस बात की हमेशा रही कि 7 हज़ार मील की दूरी के बहाने से घर की सारी जिम्मेदारीयों से हाथ धो लिया। न किसी की शादी में शामिल हुए न किसी की बरसी में। न किसी के लिए नौकरी की सिफ़रिश की और न किसी की दवा-दारु की।  माँ की टक्कर हो गई थी स्कूटर से। कमर में काफ़ी चोट आई। बिस्तर पर रही हफ़्तों तक। मैं यहाँ टी-वी पर देखता रहा डायना और मदर टेरेसा का अंतिम सफ़र। फ़ोन से बातचीत जरुर होती थी। पर फ़ोन पर किसी को गले नहीं लगाया जा सकता। कंधे पर सर नहीं रख सकते। निगाहें नीची कर के थोड़ी देर चुप नहीं रह सकते। माँ माथे को चूम नहीं सकती। बालों को सहला नहीं सकती। गला भर आने पर पानी का ग्लास नहीं दे सकती।   सच! कितनी त्रासदी है एक एन आर आई के जीवन में।
'जब हम अपनों के नहीं हुए,
तो किसी और के क्या होंगे,
पूछ लो किसी भी कामयाब से,
किस्से यहीं बयां होंगे'
 
21 साल से यहाँ हूं। तब से आज तक यही सुनता आया हूँ - 'मेरा भारत महान'।
'परदेस में बस जाने के बाद,
चर्चे वतन के मशहूर हो गए'



'भारत बहुत तरक्की कर रहा है।' 'अमेरिका अपने आप को असुरक्षित समझ रहा है।' 'यहाँ की नौकरियाँ धीरे-धीरे बैंगलोर और हैदराबाद जा रही है।' आदि, आदि। इस वजह सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अमरीकी कर्मचारीयों के पेट पर सीधा-सीधा वार हुआ है। जाहिर है उन्हें ये कतई पसंद नहीं है। कुछ राज्य सरकारों ने इसी कारण ये निर्णय लिया है कि वे किसी भी एसी संस्था को काम नहीं देंगे जिसके संबंध भारत की कंपनी से हैं। हालांकि इस निर्णय से खास फ़र्क नहीं आया है। चूंकि ये गिने-चुने राज्य तक ही सीमित है। नौकरियाँ तो जा ही रही हैं भारत की ओर, पर भारत से अब भी हज़ारो की तादात में नवयुवक आ रहे हैं। पहले वो आते थे उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए अपनी योग्यता के बल पर। आज आते हैं विप्रो, इन्फ़ोसिस आदि की छत्र-छाया में। वे आते हैं सस्ती दरों पर वही काम करने जिसे अमरीकी नागरिक कर रहा था महंगी दरों पर। तो जाहिर है, ऐसे भारतीय कर्मचारी अमरीकी जनता का सम्मान पाने में असमर्थ रहते हैं। पर इस वजह से कंपनी की बचत होती है और बहुत मुनाफ़ा। वाँल-स्ट्रीट भी खुश। अब आप सोच रहे होंगे कि चलो कम से कम कंपनी के मालिक तो इन भारतीय कर्मचारीयों की इज़्ज़्त करते होंगे। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जैसे कि आप घर बना रहे हैं और आपको मजदूर चाहिए जो ईंट, पत्थर, गारा उठा सके, मिला सके, और दीवारें खड़ी कर सके। ये काम आपके शहर के लोग कर सकते है 100 रुपये में और दूसरी तरफ़ हैं दूसरे शहर के लोग जो यह काम कर सकते हैं 70 रुपयें में। आप दूसरे शहर के कर्मचारियों से काम करा के 30 रुपये बचाएंगे जरूर मगर आप की नज़रों में उनकी इज़्ज़त नहीं बड़ जाएंगी। काम खत्म हुआ और आप अपने रस्ते और वो कर्मचारी अपने रस्ते पर। सम्मान अर्जित करने के लिए कुछ नया होना चाहिए। बजाए इसके कि आप कोई भी काम पूरा करने के लिए एक सस्ते मज़दूर की तरह हाज़िर हो जाएं। अगर आप इस घर की रूपरेखा तैयार करने वाले आँर्किटेक्ट हैं और आपका काम बहुत बेहतरीन है, तब स्वाभाविक है कि आपको प्रचुर सम्मान मिलेंगा। पिछले 10 साल में जो भारत के विकास की बात अमेरिका तक पहुँच रही है वो साँफ़्टवेयर सेवा तक ही सीमित है। और इस क्षेत्र में भारत एक सस्ते मज़दूर के रूप में देखा जा रहा है। एक मजे की बात और कि विप्रो, इन्फ़ोसिस की बदौलत अब भारत में साँफ़्टवेयर क्षेत्र में वेतन स्तरों में प्रचुर वृद्धि हुई है। इस कारण काफ़ी भारतीय जो अमरीका में बस गए थे अब भारत वापसी की तैयारी कर रहे हैं। रोज सुनने में आता है कि फलाना हिन्दुस्तान जा रहा है उस कंपनी में डायरेक्टर बन कर तो इस कंपनी में मैनेजर बन कर। मगर दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। भई सच पूछो तो अमेरिका में भेद-भाव है और उपर से झेलने अनगिनत उतार-चढ़ाव हैं जो नौकरी आज है वो कल नहीं चिन्ता रहती है हर पल यही अब तो भारत में भी नौकरिया ढेर हैं और मां-बाप के भी कबर में पैर हैं सोचता हूँ हिन्दुस्तान में बस जाऊँ बस पहले अमेरिकन सिटिज़न बन जाऊँ हर महफ़िल में हर आदमी इस बात की घोषणा करता है कि वो भारत का शुभचिंतक है। मेरा ये विचार है कि भारत का विकास हो, सम्पन्न हो खुशहाल हो, रोजी-रोटी सबके पास हो, सुनते ही कि डाँलर गिर गया, सारा बुखार उतर गया  अंत में निष्कर्ष यही कि हम यहाँ के रहन-सहन के, तौर-तरीको के और ज़रुरतों के आदि हो गए हैं। और डॉलर चाहे कितना भी गिर जाए उसकी खरीदी क्षमता दुनिया की बाकी मुद्राओ से ज्यादा ही रहेगी। यहाँ आदमी एक साल के वेतन में वो सब खरीद सकता है जिसे अन्य देशों के नागरिक कई सालों की कमाई में भी नहीं पा सकते है। पहले हम अपना भविष्य सुधारने आए थे। अब हम अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना चाहते हैं। पहले मैं कहता था कि हम अभिमन्यू की तरह चक्रव्यूह में घुस तो गए हैं पर निकलने में असमर्थ हैं। अब लगता है कि ये कैंसंर की तरह एक ला-ईलाज मर्ज़ है। बाबुल चाहे सुदामा हो ससुराल चाहे सुहाना हो नया रिश्ता जोड़ने पर अपना घर छोड़ने पर दुल्हन जो होती है दो आँसू तो रोती है और इधर हर एक को खुशी होती है जब मातृभूमि संतान अपना खोती है क्यूं देश छोड़ने की इतनी सशक्त अभिलाषा है? क्या देश में सचमुच इतनी निराशा है? जाने कब क्या हो गया वजूद जो था खो गया ज़मीर जो था सो गया लकवा जैसे हो गया भेड़-चाल की दुनिया में देश अपना छोड़ दिया धनाड्यों की सेवा में नाम अपना जोड़ दिया अपनी समृद्ध संस्कृति से अपनी मधुर मातृभाषा से मुख अपना मोड़ लिया माँ बाप का दिया हुआ नाम तक छोड़ दिया घर छोड़ा देश छोड़ा सारे संस्कार छोड़े स्वार्थ के पीछे-पीछे कुछ इतना तेज दौड़ें कि न कोई संगी-साथी है न कोई अपना है मिलियन्स बन जाए यही एक सपना है करते-धरते अपनी मर्जी हैं पक्के मतलबी और गर्जी हैं उसूल तो अव्वल थे ही नहीं और हैं अगर तो वो फ़र्जी हैं पैसों के पुजारी बने स्टाँक्स के जुआरी बने दोनों हाथ कमाते हैं फिर भी क्यूं उधारी बने? किसी बात की कमी नहीं फिर क्यूं चिंताग्रस्त हैं? खाने-पीने को बहुत है फिर क्यूं रहते त्रस्त हैं? इन सब को देखते हुए उठते कुछ प्रश्न हैं पैसा कमाना क्या कुकर्म है? आखिर इसमें क्या जुर्म है? जुर्म नहीं, यह रोग है विलास भोगी जो लोग है 'पेरासाईट' की फ़ेहरिश्त में नाम उनके दर्ज हैं पद-पैसो के पीछे भागना एक ला-इलाज मर्ज़ है

Friday, November 30, 2007

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा
मिलेगी डिग्री, जिस दिन तुम्हें
वो दिन 'यू-एस' में आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा

याद है मुझको तूने कहा था
तुमसे नहीं रुठेंगे कभी
फिर जिस तरह से हम पले हैं
कैसे भला जीएंगे कहीं
तेरी 'कोचिंग' में बीती हर शाम
के तुझे कुछ भी याद नहीं
क्या हुआ ...

ओ कहने वाले मुझको गरीब
कौन गरीब है ये बता
वो जिसने घर लिया उधार के पैसो से
या जिसने 'कैश' में तुझे भेज दिया
नशा दौलत का ऐसा भी क्या
बेवफ़ा ये तुझे याद नहीं
क्या हुआ ...

भूलेगा दिल जिस दिन तुम्हें
वो दिन जिन्दगी का आखिरी दिन होगा
क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा


(मजरूह सुल्तानपुरी से क्षमायाचना सहित)