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Monday, November 16, 2009

मेरी कलम

कोई पूछे कि न पूछे
ये कलम मुझको बुलाती है
हर मोड़ पे, हर हाल में
ये गीत सुनाती है

शमा जलती है, बुझती है
मिट जाती है जल कर
दिनकर आ के, जगमगा के
चला जाता है थक कर
इक कलम ही है
जो दु:ख-सुख में
मेरा साथ निभाती है

ताज हो, तख्त हो, दौलत हो
ज़माने भर की
उस पे बंदिश कि
न कहो बात अपने मन की
ऐसी ज़िंदगी भी कहीं
ज़िंदगी कही जाती है

कोई पक्षपात करे, द्वेष करे
जाल बिछाए
कोई नेता हो, अभिनेता हो
या लाख कमाए
सब के वादों को, इरादों को
ये साफ दिखाती है

कोई रूठे, कोई फूले
या कोई आँख दिखाए
बन के यमदूत भी
'गर आप मुझे लाख डराए
ये न रूकी है
न रुकती है
न रोकी जाती है

सिएटल
16 नवम्बर 2009

Tuesday, July 8, 2008

मेरा सच और मेरी सोच


थोड़ी हंसी, थोड़ा क्रोश
थोड़े गुण, थोड़े दोष

थोड़ा शोक, थोड़ी मौज
थोड़ी मदद, थोड़ा बोझ

थोड़ी एंठन, थोड़ी लोच
थोड़ा मलहम, थोड़ी खरोच

ये सब मुझे देते हैं लोग
ये सब मुझे मिलते हैं रोज

इन सब को
मिलाजुला कर
मैं लिख लेता हूँ रोज

और कोई नहीं है मेरा कोच
बस मेरा सच और मेरी सोच

सिएटल,
8 जुलाई 2008
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कोच = coach

Friday, June 13, 2008

जो दबता है उसी को दुनिया दबाती है

जो दबता है उसी को दुनिया दबाती है बदली भी सूरज नहीं बस चाँद छुपाती है हसरत है उनकी कि मैं तारें तोड़ लाऊँ और उंगलियाँ मेरी बस चाँद छू पाती हैं धरती है कि बेधड़क घूमती ही जा रही है और फूंक-फूंक के दुनिया कदम बढ़ाती है सुना है कि उम्र के साथ आँखें हो जाती है कमज़ोर तो फिर बचपन और बुढ़ापे में क्यों एक सा रूलाती हैं लड़खड़ाता हूँ मैं मुझे नहीं मिलता सहारा मरने वालो को दुनिया कंधों पे उठाती है सोचता हूँ रोज़ अब और हाथ नहीं मैं मैलें करूँगा लेकिन ज़रुरतों की नई-नई फ़सल रोज उग आती है कहने को तो वैसे बहुत कुछ है 'राहुल' लेकिन वो माँ कहाँ जो लोरी सुनाती है सिएटल, 13 जून 2008

Wednesday, June 4, 2008

मेरी कविता

मेरी कविता में बसती है बस मेरी भावना
विनती है कि भावना का लगे भाव ना

सब पढ़ते हैं सुनते हैं पर समझते हैं वो
मात्र मात्रा की गलती पर जो खाते ताव ना

मेरा ही लहू हो और मेरी ही कलम
किसी और का कुछ लगे दाँव ना

जो पहले से हैं वही कुरेदें हैं मैंने
नए सिरे से मैंने किये घाव ना

कलम टेढ़ी न हो तो मैं लिख पाता नहीं
सीधी पतवार से तो माझी खेतें नाव ना

धूप से है जीवन और धूप से है विकास
छालों के डर से मुसाफ़िर मांगे छाँव ना

आज़ादी का मतलब मैं समझ पाया नहीं
लीक से हट कर जब तक रखें पाँव ना

बधाई मिले और ज़माना पूजता रहे
इस तरह की राहुल रखे चाव ना

सिएटल
3 जून 2008

Wednesday, May 28, 2008

कविता बुरी हो गई

सच कहते कहते कविता बुरी हो गई
सच लिखते लिखते कलम छुरी हो गई

चुटकला समझ कर ठहाका लगाते थे जो
मेरी कविता से आज उनकी दूरी हो गई


हमेशा की तरह बस बेला था मैंने
तप कर आग में वो तंदूरी हो गई

आप ही खामखाह लहूलुहान हो गए
मेरे हिसाब से तो शाम सिंदूरी हो गई

फ़क़त शौक था राहुल का कविताएँ लिखना
ज़िंदा रहने के लिए आज वो जरूरी हो गई

सिएटल,
28 मई 2008

Sunday, May 18, 2008

मैं क्यों लिखता हूँ?

क्यों लिखता हूँ हर एक रात मैं
क्यों लिखता हूँ हर एक बात पे

क्यों लिखता हूँ इतना
क्यों भेजता हूँ इतना
क्यों नहीं थोड़ा रुक कर
दो चार बार जरा सोच कर
शिल्प इस पर मढ़ कर
रूप इसका गढ़ कर
फिर कहीं जा कर
क्यों नहीं भेजता हूँ मैं?

चार दिन की है उमर
वो दिन भी हैं उधार से
सफ़र करता हूँ प्लेन से
आँफ़िस जाता हूँ कार से

कभी भी कहीं भी कुछ भी हो सकता है
आप वंचित न रह जाए मेरे विचार से
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

मेरे अंदर का तेल जल रहा है
मेरे दीप की बाती भभक रही है
दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज

कल का कोई भरोसा नहीं
न तुम रहो
न मैं रहू
लेकिन यह कतई मंजूर नहीं
कि दुनिया वैसी की वैसी रहे

दीप जितने हो सके जला लू आज
आग जितनी हो सके लगा दू आज
इसीलिए
लिखता हूँ हर एक रात मैं
लिखता हूँ हर एक बात पे

सिएटल,
18 मई 2008

Monday, May 12, 2008

जिसका डंडा उसका झंडा

जैसा देस वैसा भेस, ये सुना था सोच समझ कर ही देश चुना था वैसा ही पाया संसार जैसा ख्वाबों ने बुना था खुशियों का समंदर बढ़ा दिन दूना और रात चौगुना था जबसे आया मिलैनियम ये तब से हमें मिले नियम ये जिसका डंडा उसका झंडा यही है इस युग का फ़ंडा न जाने किसके गले पड़ेगा फ़ंदा जो भी मांगे उसे दे दो चंदा चाहे बाज़ार हो कितना भी मंदा और न मिले कोई काम धंधा सब हैं मस्त अपनी धुन में नहीं कोई अपना सच्चा साथी सब करते हैं अपना उल्लू सीधा चाहे हो वो गधा या हाथी क्या करेगा कोई बंदा जब लीडर ही हो एक अंधा नहीं पूरे होते अंधे के सपने वो होते हैं अनदेखे सपने बात मेरी मान लो बस इतना जान लो जब तक जी चाहे परदेस में रहो पर जब तक रहो परदे में रहो ओ परदेसी परदे सीना ध्यान से खतरा है स्वाभिमान से निकले न कहीं म्यान से झलके न कहीं ज्ञान से परदे की आड़ में हो सकता है बच जाओ इस मेल्टिंग पाँट में तुम भी पक जाओ सेन फ़्रांसिस्को 20 सितम्बर 2001

Wednesday, May 7, 2008

गाईड

बनने चला था कवि
मैं 'गाईड' बन गया हूँ
बेसहारा बेबस की
मैं 'राईड' बन गया हूँ

न बुद्धिजीवों में 'हिट' हूँ
न किसी फ़्रेम में मैं 'फ़िट' हूँ
विरोध तो होता है लेकिन
मैं भी बड़ा ढीट हूँ
सास भी जिस से डरे
मैं वो 'ब्राईड' बन गया हूँ

जिस थाली में खाता हूँ
उसी में छेद कर रहा हूँ
सदियों पुरानी मान्यताओं
में हस्तक्षेप कर रहा हूँ
आरोप है कि अंधो के बीच
मैं 'वन-आईड' बन गया हूँ

शब्दों से खेलता हूँ
सब की पोल खोलता हूँ
किसी को नहीं बख्शा है
खुद को भी टटोलता हूँ
समाज की गंदगी का
मैं 'टाईड' बन गया हूँ

पढ़ते हैं वो देशवासी
जो दूर हैं अपने देश से
कभी खुश हैं तो कभी दुखी
अपने कर्म से परिवेश से
उनकी भावनाओं का
मैं 'प्राईड' बन गया हूँ

सिएटल,
7 मई 2008
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गाईड = guide
राईड = ride, lift, a means of or arrangement for transportation by motor vehicle:
हिट = hit
फ़्रेम = frame
फ़िट = fit
ढीट = stubborn
ब्राईड = bride
वन-आईड = one eyed, काना,
बख्शा = spared
टाईड = Tide, a popular laundry detergent
परिवेश = environment
प्राईड = pride

Tuesday, April 29, 2008

मुक़द्दर

मेरे हाथों की लकीरों में अगर मुक़द्दर होता
मैं अपने ही हाथों के हुनर से बेखबर होता

आपत्तियों के पर्वत यदि न होते विशाल
विश्वविख्यात न आज सिकंदर होता

ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी होती तो अच्छी
लेकिन जीवन नीरस और बेअसर होता

सच्चे प्यार से न कभी होती मुलाकात
अगर झील सी आँखों में न समंदर होता

गर्व यदि होता हमें स्वयं पर
नालंदा आज न खंडहर होता


हाँ में हाँ यदि मिलाते सभी
मरघट सा यहाँ मंजर होता

परहेज़ जिसे कहता है डाक्टर
वही तो रोगी को प्रियकर होता


दुत्कारते न आप भरी सभा में मुझको
नाम मेरा न जाने कैसे अमर होता

छंद-मात्रा में यदि होता मैं सक्षम
मैं समक्ष आपके किताबों में छपकर होता

बहर-वजन का भी मैं रखता खयाल
जगजीत का मुझे मिला स्वर होता

दूसरों को बुरा भला जो कहते हैं लोग
उनके पास आईना नहीं अक्सर होता

थोड़ा सा सब्र जो कर लेते लोग
बात-बात पर न बवंडर होता

इंटरनेट की लड़ाईयाँ हैं बिट्स-बाईट्स तक सीमित
अन्यथा यहाँ महाभारत रोज जमकर होता

दिन-प्रतिदिन तो पकवान परोसें नहीं जाते
प्रत्येक दिन पर्व का नहीं अवसर होता

असम्भव था सिद्धार्थ का बुद्ध होना
राहुल संतान जो नहीं बनकर होता

सिएटल,
29 अप्रैल 2008

Friday, March 14, 2008

मैं कवि हूँ

मैं कवि हूँ 

कोई किरदार नहीं 
कि एक कुर्ते-पजामें में सिमट जाऊँ 

 मैं कवि हूँ 
कोई सलाहकार नहीं  
कि तुम्हे जीवन जीने की राह दिखाऊँ 

मैं कवि हूँ 
कोई मददगार नहीं  
कि तुम्हारा दु:ख-दर्द मिटाता जाऊँ 

मैं कवि हूँ 
कोई खानसामा नहीं  
जो menu के मुताबिक 
कभी मीठा 
कभी खट्टा 
तो कभी चटपटा 
Item पेश करता जाऊँ 

 मैं कवि हूँ 
कविता मेरा शौक है, मेरा पेशा नहीं  
और तनिक भी शोक नहीं  
कि इसमें पैसा नहीं   

मैं कवि हूँ 
कविता मेरा व्यवसाय नहीं  
शब्दों से खेलता हूँ 
शब्दों की खाता नहीं  
इन्हें बेच कर 
खोलना मुझे बैंक खाता नहीं   

मैं कवि हूँ 
मेरे शब्द बहुरुपी हैं  
मैं भी बहुरुपिया हूँ 
बातें ज़रुर बनाता हूँ 
उनसे बनाता नहीं रुपया हूँ 

 मैं कवि हूँ 
कभी दुनिया की नहीं परवाह की 
जब जो अच्छा लगा उस पर वाह की 

मैं कवि हूँ 
सच कहने से घबराता नहीं  
जानता हूँ कि जिस दम घुटने टेक दूँगा  
उस पल से मेरा दम घुटने लगेगा 

मैं कवि हूँ 
जब भी कहता हूँ 
सच ही कहता हूँ 
लेकिन मैं 'मेरा' ही सच कहता हूँ 
ये आवश्यक तो नहीं कि हमारे-तुम्हारे विचार मिले 
और ये भी उद्देश्य नहीं कि इसके लिए बधाई मिले 

मैं कवि हूँ 
जब भी कहता हूँ 
सच ही कहता हूँ 
लेकिन मैं 'आज' का ही सच कहता हूँ 
मुमकिन है कल मैं खुद ही अपनी बात से पलट जाऊँ 

समय बहता है
मैं भी उसके साथ बह जाऊँ 
आज यहाँ हूँ
कल कहीं और चला जाऊँ 
 तुम लकीर के फ़कीर मत बनना 
मेरे शब्दों से चिपके मत रहना 

मैं कवि हूँ 
मेरा खुद का कोई ठिकाना नहीं  
मेरा कोई भी शब्द अंतिम नहीं  

राहुल उपाध्याय | 14 मार्च 2008 | सिएटल

मेरे दिल की बात

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ
लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

मेरी नज़रों के सामने
पली-बढ़ी हो तुम
कल तक मेरे दिल में थी
आज मेरे सामने हो तुम

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

तुम्हें जी भर कर देखूँ
हाथ बढ़ा कर तुम्हें छू लूँ
तुम्हारे माथे पर बिंदी लगा दूँ
तुम्हारी शान में चार चाँद लगा दूँ
तुम्हारे कदमों में अपना नाम लिख दूँ
अपने होंठों से तुम्हारा रोम-रोम चूम लूँ
तुम्हें सर से पाँव तक आभूषणों से अलंकृत कर दूँ

सोचता हूँ तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ
लेकिन डरता हूँ कहीं बिगड़ न जाओ तुम

जो दिल में है वो सब कह दूँ
तुम्हें अपने आगोश में ले कर सो जाऊँ
नींद खुलने पर तुम्हें अपने पास ही पाऊँ
जागते-सोते बस तुम्हें और तुम्हें ही पाऊँ
ख्वाबों में भी तुम आओ और मैं तुम्हें सजाता जाऊँ

मेरे दिल की धड़कनें कुछ तेज होगी
जब सब के सामने तुम आओगी
और हर एक का मन बहलाओगी
तब तुम मेरी नहीं रह जाओगी
लेकिन मैं तुम्हें याद करता रहूगा
और तुम्हें बार बार दोहराता रहूगा
कभी अकेले में
तो कभी महफ़िल में
लेकिन तुम्हें फिर कभी संवार न पाऊँगा

सोचता था तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता था कहीं बिगड़ न जाओ तुम

कह नहीं सकता
किसमें ज्यादा त्रासदी है
इसमें कि
तुम मेरे सामने हो
और मैं तुम्हें संवार नही सकता
क्यूंकि तुम अब किसी एक की नहीं हो
या फिर इसमें कि
दिल चीर कर एक और मसौदा निकालना
उसे अपने हाथों पालना-पोसना
उसे एक नई शक्ल देना
उसे कविता का नाम देना
और उसे ज़माने को सौंप देना

सोचता था तुम्हें थोड़ा और संवार दूँ

लेकिन डरता था कहीं बिगड़ न जाओ तुम

राहुल उपाध्याय | 14 मार्च 2008 | सिएटल

Wednesday, October 17, 2007

आत्मकथ्य

लिख नहीं पाता हूं राजी खुशी की दो-चार लाईने तक माँ-बाप को और लिख रहा हूँ लम्बे-लम्बे blog जिसे भेजता हूं रोज आप को Atoms की feed RSS की feed बो रही है क्रांति के seed सोचता हूँ मैं भी उजागर करूं एकाध आस्तीन के सांप को लिख नहीं पाता हूं… छपते ही किताब धूल खाती है जनाब छपते ही blog Aggregators जाते हैं जाग Bits और bytes के बीच छोड़ जाना चाहता हूं अपनी अमिट छाप को लिख नहीं पाता हूं… क्या-क्या खोया क्या-क्या पाया वक्त मुझे कहाँ ले आया बड़ी धूम से दर्शाता हूं blog पर हर एक पुण्य और पाप को लिख नहीं पाता हूं… 17 अक्टूबर 2007