Wednesday, March 19, 2008

मनमोहनी मनभावनी

मिलती है सुबह शाम मुझे
जैसे मिलते हैं सुबह शाम
स्वप्न से जगाती है मुझे
स्वप्न में ले जाती है वो
महसूस तो होती है
लेकिन छू उसे सकता नही

चलती है साथ साथ मेरे
जैसे हवा चले साथ मेरे
छेड़ती है, खेलती है
लेकिन पकड़ उसे सकता नही

रहती है साथ साथ मेरे
जैसे सांस रहे साथ मेरे
आती-जाती है कई बार
लेकिन रोक उसे सकता नही

बसती है जो जहन में मेरे
मिलेगी इस जहां में नही
पलती है कविता में मेरी
मिलेगी दास्तां में नही
मनमोहनी मनभावनी
मनमीत जीवनसंगिनी
नाम उसके कई हैं

लेकिन बता उसे सकता नही

कभी यहाँ तो कभी कहीं
लोगो ने कई बाते कही
खरी खोटी झूठी सही
हर तरह की बाते सही
प्यार की बात है
जो समझ गया
वो समझ गया
नासमझ समझता नही

सिएटल,
19 मार्च 2008
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Glossary:
जहन = mind
जहां = world
दास्तां = a story, a tale
कहीं = somewhere
कही = said
सही = 1. correct, true, valid 2. to bear, to endure

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1 comments:

Anonymous said...

Bahut sundar, Rahul. Bahut sensitive kavita hai yeh.