Friday, March 7, 2008

मगर… #3

कभी मधुर कभी दुभर
रोता बस दुखड़े मगर

कहे जो मरजी वो कर
छोड़ कर मर जी मगर

नीचे न जाऊं चढ़ू उपर
ज़िंदगी एक जीना मगर

पल पल पलती है उमर
पल नहीं जीते हैं मगर

पानी जीवन पानी क़हर
फूल खिले रहते मगर

हर तरफ़ बहती लहर
सब नहीं तरते मगर

भक्त वक़्त से बेख़बर
भजे सवेरे शाम मगर

न मानो तो एक पत्थर
मानो तो एक नींव मगर

रवि के लगाता मैं चक्कर
मानो तो परिक्रमा मगर

सब रवि पर हैं निर्भर
रब नहीं कहते मगर

एक हम हैं एक ईश्वर
हैं अनेक चेहरे मगर

सब की पहचान नश्वर
नाम हैं राजा रंक मगर

हमें-तुम्हे भी होता फ़क्र
हम अलग रहते मगर

देखा जब देखा शहर
देखा नहीं इंसा मगर

शाम गई और निखर
नया था चश्मा मगर

रात रात ही जाग कर
उल्लू सीधे होते मगर

रोज कस के बांधू कमर
मन नहीं बंधता मगर

क्या हकीम क्या डाक्टर
पीर नहीं समझे मगर

हर कोई है चारागर
प्यार से देखे मगर

होता राहुल राज-कुंवर
होता शायर कौन मगर

सिएटल,
6 मार्च 2008
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Glossary
जीना = 1. live life 2. staircase
रहते = 1. continues 2. stays, settles
मगर = 2. but 3. crocodile
शाम = 1. evening 2. Krishna
इंसा = 1. mankind 2. like this one
उल्लू = owl
उल्लू सीधा करना = to get your (and only yours) things done
पीर =पीड़ा, pain
चारागर =care giver

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3 comments:

परमजीत बाली said...

बढिया रचना प्रेषित की है।

हर तरफ़ बहती लहर
सब नहीं तरते मगर

भक्त वक़्त से बेख़बर
भजे सवेरे शाम मगर

न मानो तो एक पत्थर
मानो तो एक नींव मगर

Anonymous said...

Kya Baat hai. Yeh pehli baar padhe.
Badhai

avanti singh said...

hota rahul raj-kawar
shayr hota kon magr :) :) :)
bahut hi achi rachna....