Monday, March 3, 2008

मगर

मेरा घर मेरा मगर
कोई नहीं मेरा मगर

आया था मैं जिस डगर
जाती नहीं वापस मगर

भटका मैं दर-ब-दर
नहीं मिली मंज़िल मगर

यहीं कहीं जाऊँ ठहर
बने कोई मेरा मगर

प्यार की चाही नज़र
लाखों मिले चेहरे मगर

चार दिन का ये सफ़र
कभी लगे लम्बा मगर

सच हो जाते ख़्वाब अगर
मैं नहीं मैं होता मगर

होगी कभी सुहानी सहर
रात फ़कत सोचा मगर

सोचता था जाऊँगा घर
पांव नहीं उठते मगर

टूटा दिल, गया बिखर
फिर हुआ पत्थर मगर

क्या हुआ? क्या ख़बर?
सच सभी कहते मगर

जाने कहाँ कौन किधर?
सब यहीं रहते मगर

बस रहा मेरे भीतर
मुझे नहीं मिलता मगर

दुआएं भी करती असर
बुत को ख़ुदा माना मगर

दे दे अगर कोई ज़हर
बंदा नहीं मरता मगर

प्रेम नश्वर, प्रेम अमर
बयां न होता जो मगर

पेट मेरा जाता है भर
भूख नहीं मिटती मगर

किसे है किस की फ़िकर?
हाल सब पूछते मगर

हद से गया जो गुज़र
चार कंधे पे गया मगर

बन जाता मैं भी सदर
जुदा होता सब से मगर

अंजाम चाहे हो अधर
हाथ मिले पहले मगर

काम हो तो किस क़दर?
दिल करे अगर मगर

न वज़न है ना बहर
कहे ग़ज़ल राहुल मगर

सिएटल,
3 मार्च 2008

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