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Monday, January 11, 2021

मैंने पूछा गुगल से

मैंने पूछा गुगल से कि देखा है कहीं

हमारे ट्रम्प सा दुखी

गुगल ने कहा सर्च की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


मैंने ये हिसाब तेरा देखा

हर जगह ख़राब तेरा देखा

ट्वीटर पे ट्वीट तेरी देखी

सब में तेज़ाब तेरा देखा

मैंने पूछा ट्वीटर से फ़लक़ हो या ज़मीं

ऐसा पंछी है कहीं

ट्वीटर ने कहा हर ट्वीट की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


झूठ रोज़-रोज़ तू बके है

सुन-सुन के कान भी पके हैं

पद नहीं रियासत खुद की

समझ के नशे मे तू रहे है

मैंने पूछा जाम से फ़लक़ हो या ज़मीं

ऐसी मय भी है कहीं

जाम ने कहा, मयकशी की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


बदनामी जो तूने पाई

लुट गई ख़ुदा की बस ख़ुदाई

कौड़ी का शैतान कहूँ तुझे मैं

या कहूँ जहान की तबाही 

मैं जो पूछूँ फ़ेसबुक से ऐसा अप्रिय 

इन्सान है कहीं

फ़ेसबुक कहे लाईक की क़सम

नहीं, नहीं, नहीं


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय ।11 जनवरी 2021 । सिएटल 

Saturday, January 9, 2021

झूठ ऐसा इसी ने देखो छोड़ा

यहाँ देखें/सुनें:

https://youtu.be/czbqeMuEoGM


झूठ ऐसा इसी ने देखो छोड़ा

बर्बादी की तरफ ऐसा मोड़ा

कुछ भले मानुष को

अमानुष बना के छोड़ा


पाकर भी इतने वोट ये

यही समझे हुई कोई खोट है

बेईमानी की तरफ़ मुख मोड़ा


कहते है ये दुनिया के बावले 

हुआ यू-एस का बुरा हाल है

जल्दबाज़ी में घोड़ा जैसे छोड़ा


डूबा सूरज फिर से निकला 

रहा नहीं है अंधेरा

देश का सूरज इतना प्रबल

चीरा मेघ घनेरा

कामयाबी से नाता मेरा जोड़ा


(इन्दीवर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 9 जनवरी 2021 । सिएटल 

Thursday, January 7, 2021

ऐ लोकतंत्र, ज़िन्दाबाद

यहाँ देखें/सुनें:

https://youtu.be/emlc0a_Batc  


सत्ता की भूख में

ज़ालिमों की भीड़ होती है

ख़ुशी मनाओ

लोकतंत्र की जीत होती है


ज़िन्दाबाद, ज़िन्दाबाद

ऐ लोकतंत्र ज़िन्दाबाद

दहशत की ज़ंजीरों से तू

रहता है आज़ाद


पूरब में, पश्चिम में तू

और तू ही है यूरोप में

उत्तर में, दक्षिण में तू

और तू ही है यू-एस में

तेरे दम से धरती की

दुनिया है आबाद


प्यार की आँधी रुक न सकेगी

नफ़रत की दीवारों से

ख़ून-ए-बहुमत हो न सकेगा

खंजर से तलवारों से

मर जाते हैं आतंकी  

ज़िन्दा रह जाती है याद


कुछ बग़ावत कर बैठे तो

उनकी कमर तू तोड़ दे

राह दिखा दे भटकों को 

और नैतिकता से जोड़ दे 

सीना ताने सब से निपटे

कुछ ना करे फ़रियाद


ताज हुकूमत मज़हब नहीं है

उनको डर कहाँ

जिस घर में इंसाफ़ ही हो

वहाँ डर कहाँ 

इंसाफ़ के दुश्मन होश में आ 

हो जायेगा बरबाद


(शकील बदायूनी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 7 जनवरी 2021 । सिएटल 

Wednesday, January 6, 2021

डी-सी में जलन, सदन में तूफ़ान सा क्यों है

यहाँ सुनें/देखें:

डी-सी में जलन, सदन में तूफ़ान सा क्यों है
व्हाइट हाउस में बैठा हैवान सा क्यों है

वोट है तो गिनने का मौका भी तो दीजे 
अनपढ़ की तरह ये अनजान सा क्यों है

गरमाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
तोड़फोड़ पे आमादा संतान सा क्यों है

क्या कोई नहीं बात समझ आती है इस को
हुई हार तो आज ये हैरान सा क्यों है

(शहरयार से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय । 6 जनवरी 2021 । सिएटल

Wednesday, November 11, 2020

ये बात अजब ‘मत’वाली है

वो चुनाव हारा, वो सारे हँसे

ये बात अजब 'मत'वाली है

समझने वाले समझ गए हैं

ना समझे वो अनाड़ी है


चाँदी सी चमकती राहें

वो देखो झूम-झूम के बताए

सड़कों पे हैं वो नज़ारे 

कि अरमाँ नाच-नाच लहराए

बाजे दिल के तार, गाए ये बहार

उभरे हैं 'जो' जीवन में


चमचों ने चदरिया तानी

सुनें न 'जो' को मिल रही बधाई

जो जीता वही सिकंदर 

ये सीधी बात समझ में न आई

कहे हुआ फ़्रॉड, जाए कोर्ट के पास

उड़वाए मज़ाक़ वो खुद का


(शैलेंद्र से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 11 नवम्बर 2020 । सिएटल 

https://youtu.be/Cdmz6hfTHHY 


माना जनाब ने स्वीकारा नहीं


माना जनाब ने स्वीकारा नहीं

तुम्हारा साथ गवारा नहीं

मुफ़्त में बन के, बैठे हो तनके, 

वल्ला जवाब तुम्हारा नहीं


हारे का चलन है गुलामी

लेते हैं चमचों की सलामी

गुस्सा ना कीजिए जाने भी दीजिए

गद्दी तो गद्दी तो दीजिए साहब


छोटा-मोटा कारोबार तुम्हारा

जैसा भी है अब है तुम्हारा

घर जाइए, कारोबार देखिए

दिल्लगी ना दिल्लगी ना कीजिये साहब


माशा अल्ला कहना तो मानो

बन जाए बिगड़ा ज़माना

थोड़ा हँसा दिया, थोड़ा रूला दिया

अलविदा तो अलविदा तो कीजिये साहब


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 9 नवम्बर 2020 । सिएटल

 https://youtu.be/ZK44u-6a1dU 


Monday, November 9, 2020

एन-आर-आई की निकली लॉटरी


हाथ में लड्डू सजे, मुख पे उजाला

पाँव थिरक रहें, करें नाच गाना

हुई जीत इनकी और अब ये ख़ुश हैं

हर तरफ़ खिले ख़ुशियों के पुष्प हैं 

आओ रे आओ सब मिल के गाओ

बाईडेन जीता और हैरिस न हारी


एन-आर-आई की निकली लॉटरी 

एन-आर-आई की क़िस्मत है न्यारी

एक तरफ़ कमल, एक तरफ़ कमला

बीच में गुगल के पालनहारी


देर से सही पर क़बूल तो हुई हैं

अर्जी दुखियों की क़बूल तो हुई हैं

इस बार देखो ग्रीन कार्ड मिलेगा

कोई भी अब न आईस से डरेगा

ख़ुश बड़े हैं जो भी खड़े हैं

एच-वन के प्यासे सब नर-नारी


चार बरस था अंधकार छाया 

माता पिता का दर्द बढ़ाया 

मुश्किल था पाना एच-वन का वीसा

मन्दिर गए गाई कई बार चालीसा 

तब-तब ये गाए, तब-तब ये गाए

जब-जब हुई आर-एफ-ई की मारामारी


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 8 नवम्बर 2020 । सिएटल

 https://youtu.be/5gMHIJX7QE4 


Sunday, November 8, 2020

चुनाव जायज़ है

चुनाव जायज़ है नहीं मनमानी

हर बार की यही है कहानी

फिर भी हारा हुआ हार न माने

कहे हुई है बड़ी छेड़खानी 


नादां की नहीं रवानी है ये

मौज नहीं आनी जानी है ये

कोई जीते कोई हार जाए

एक परम्परा पुरानी है ये

हर उम्मीदवार को मिलता है मौक़ा 

पार कश्ती ये कैसे लगानी


चार साल का ये राज था

करना था जो भी काम था

उम्र भर के लिए ये पद 

न मिला न मिलना आज था

जान कर भी है अन्जान बनते

और क्या होगी बोलो नादानी


वोट के बिन गुज़ारा नहीं

और कोई सहारा नहीं

तुम तो मेहमान हो इस घर के

ये तुम्हारा तुम्हारा नहीं

कैसा शिक़वा है कैसी शिकायत

क्यूँ हकीकत से आँखें चुरानी


प्यार हो, प्रेम हो, सद्भाव हो

सबके विकास का भी भाव हो

इस सफर के लिए है बहुत

दिल नेक और साफ़ हो

फिर तो जन्नत से बढ़कर राजनीति 

और खुशियों से भरी राजधानी 


(विश्वेश्वर शर्मा से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 8 नवम्बर 2020 । सिएटल


 https://youtu.be/Kh7CqEcO3tE 


Saturday, November 7, 2020

जीते जो जीते

काहे को रोए

जीते जो जीते

सफ़ल हुई 

वोटर की कामना


मूँछें तेरी काहे नादान

लटक गई डाल समान

समा जाये इस में तूफ़ान

कर तेरा जिगर आसमान

जाने क्यों तूने ये

झूठे सपन संजोए


पद छूटे तो ये बाक़ी 

जीवन और सुंदर बने

पढ़े-लिखे, बाँटे जो भी

ज्ञान तू बाँट सके 

काहे को बोझा ये

सर पे तू ढोए


कहीं पे है दुख की छाया

कहीं पे है ख़ुशियों की धूप

बुरा भला जैसा भी है

यही तो है बगिया का रूप

फूलों से, कांटों से 

माली ने हार पिरोए


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 7 नवम्बर 2020 । सिएटल 


वरना जीती हुई बाज़ी तो न हारे होते


वोट होते न ख़फ़ा 

आप हमारे होते

और न ग़ैरों की तरह 

आज नकारे होते


आपके चरित्र में पहले ही से न कोई दम है

और कुछ आप की फ़ितरत में वफ़ा भी कम है

वरना जीती हुई बाज़ी तो ना हारे होते


हम पक गए हैं किसी को बता भी न सके

सामने जाम था और जाम उठा भी न सके

काश चारों ओर लगे न ये नारे होते


दम घुटा जाता है सीने में फिर भी ज़िंदा हैं

तुम से क्या हम तो सिस्टम से भी शर्मिन्दा हैं

हट ही जाते जो न वकीलों के सहारे होते


(इंदीवर से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 6 नवम्बर 2020 । सिएटल

 https://youtu.be/DlBce2EKazc 


Friday, November 6, 2020

चुनाव में हारनेवालों को


चुनाव में हारनेवालों को

चैन कहाँ, हाय, आराम कहाँ


हार की अंधियारी मंज़िल में

चारों ओर सियाही

आधी राह में ही रुक जाए

इस मंज़िल का राही

वोटों पर मरनेवालों को

चैन कहाँ, हाय, आराम कहाँ


बहलाए जब दिल ना बहले

तो ऐसे बहलाएँ

झूठ ही तो है जीत की दौलत

ये कहकर समझाएँ 

अपना मन छलनेवालों को

चैन कहाँ, हाय, आराम कहाँ


(राजिन्दर कृष्ण से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2020 । सिएटल

 https://youtu.be/uk1x7gW3m10 


Thursday, November 5, 2020

इलेक्शन लीडर देता है


इलेक्शन लीडर देता है

वोटर वोट देता है

जीतना उसका जीतना है, 

जिसे वोटर बहुमत देता है


विनर न बन पाए तो

लूज़र बनके न बकता चल

फूल मिलें या अँगारे

सच की राहों पे चलता चल

हार दिल से मानता है

गरिमा से पद देता है


चलता है जनता से सदन

कि घर सभी के चलते रहे

लोगों ने तय किए विधान

कि वोट सभी के गिनते रहे

नर वो नर है जो औरों के 

मत को आदर देता है


(अमित खन्ना से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2020 । सिएटल


https://youtu.be/oRIFc52oAMA 


लॉयर-वायर कर तू अपने

सुन मेरे बंधु रे, 

सुन मेरे मितवा

सुन मेरे साथी रे


होता तू विजेता, 

मैं होती अमर लता तेरी

तेरे गले माला बन के, 

पड़ी मुसकाती रे


वोट कहे तू अनिश्चित, 

बाकी अभी गिनती 

लॉयर-वायर कर तू अपने, 

देर हुई जाती रे


(मजरूह से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 5 नवम्बर 2020 । सिएटल


 https://youtu.be/3rLp7TUFJDE 


Wednesday, November 4, 2020

ये चुनाव है

ये चुनाव है, इस चुनाव का

यही है, यही है, यही है रंग रूप

थोड़े ख़ुश हैं, थोड़े दुखिया

यही है, यही है, यही है छाँव धूप


ये न सोचो इसमें अपनी हार है कि जीत है

उसे अपना लेना जो भी जाता जीत है

ये ज़िद छोड़ो, यूँ ना रूठो, हर नेता इक इंसान है


गुण से ना कौशल से काम से न काज से

वोटों की भीड़ जुटी न नेता के प्रचार से

कोई जीते, कोई हारे। ये ऐसा सिस्टम है


(आनन्द बक्षी से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 4 नवम्बर 2020 । सिएटल


https://youtu.be/IwB6_CA7SYY 


आख़िर इस वोट की इंतिहा क्या है

ऐ परवरदिगार तुझे हुआ क्या है 

आख़िर इस वोट की इंतिहा क्या है 


कोई बेताब कोई गिने धीरे-धीरे 

या इलाही ये माजरा क्या है 


मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ 

काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है 


छ: जनवरी तक की है मोहलत

फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है 


ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं 

झूठ, फ़रेब और दगा क्या है 


शिकन-ए-पेशानी-ए-दुनिया क्यूँ है 

निगह-ए-चश्म-ए-अचम्भा क्या है 


जज-वकील कहाँ से आए हैं 

न्याय क्या चीज़ है बजा क्या है 


हम को उन से सच की है उम्मीद 

जो नहीं जानते घटा क्या है 


हाँ भला कर तिरा भला होगा 

जिसने कहा ये कहा क्या है 


हार कर अब विचार करता हूँ 

इस चुनाव से मिला क्या है


मैंने माना कि कुछ नहीं 'राहुल' 

पेरोडी बन जाए तो बुरा क्या है


(ग़ालिब से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 4 नवम्बर 2020 । सिएटल 

https://youtu.be/DC4QmMfXKHM

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Monday, November 2, 2020

इस चुनाव से हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

इस चुनाव से हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है


चुनाव है तो चुनने का बहाना कोई ढूँढे

पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यूँ है


भेड़ चाल की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो

ता-हद्द-ए-नज़र एक उफ़ान सा क्यूँ है


क्या कोई नई बात नज़र आती है फल में 

जो बोया वही पाया हैरान सा क्यूँ है


(शहरयार से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 2 नवम्बर 2020 । सिएटल


रफ़ीक = दोस्त

https://youtu.be/XwtzYGxSWl0