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Saturday, April 29, 2023

आँखों में जिनकी डूब के

आँखो में जिनकी डूब के सपने सजाए थे 

उनसे ही बच-बचा के अब दिन बिताएंगे 


तरसे थे जिनके साथ को अरबों-हज़ारों साल 

मिल भी गए वो आज तो नज़रें बचाएंगे


सह लेते दर्द इश्क़ के होंठों को सी के आज 

शायर की बात और है, गीत गाएँगे 


घुटनों पे चल के आए न चौखट पे आपके 

ख़ुद्दारी आई साथ थी ख़ुद्दार जाएँगे 


हाथो में आज नहीं है किसी के बागडोर 

पर्दा हम अपने आप पे ख़ुद गिराएंगे 


राहुल उपाध्याय । 3 मार्च 2022 । सिएटल 

https://youtu.be/tMkJgxYqJXM





Wednesday, February 3, 2021

हाथ नहीं आग से जलते मेरे

https://youtu.be/DB9q3UpV65Q


आजकल हाथ नहीं आग से जलते मेरे

बोलो देखा है कभी तुमने मुझे डरते हुए


जाने क्या होता है हर हाल में ख़ुशी होती है

दिन में ख़ुशी होती है और रात में ख़ुशी होती है

थाम लेता हूँ हर तूफ़ान को हँसते हुए 


जब भी जुल्म-ओ-सितम कोई ढाता है

हौसला हो तो वो भी गुज़र जाता है

हमने देखा है जंजीरों को गलते हुए


कल की बात नहीं, हर बार यही होता है

वो ही पाता है इन्सान जो बोता है

हमने देखा है लुटेरों को लुटते हुए


(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

Tuesday, October 27, 2020

फिर वही बात है चुनाव की

फिर वही बात है 

फिर वही बात है चुनाव की 

बार-बार चुनाव में चुना करेंगे उन्हें 


मासूम सी भीड़ में, 

जब कोई दीवाना चले 

मास्क लगा लेना तुम, 

वैक्सीन न कोई मिले

ये बात है चुनाव की, 

चुनाव की बात है 


वादे ख्वाब हैं, 

दो दिन में टूट जाएँगे 

सच न मान लेना इन्हें, 

दो दिन में झूठ जाएँगे 

ये बात है चुनाव की, 

चुनाव की बात है 


(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 27 अक्टूबर 2020 । सिएटल 

https://youtu.be/Lw_axmMQhNk 


--

Friday, September 25, 2020

कवि ज़ूम ज़ूम करे

https://youtu.be/KLYpp3kliP0


कवि ज़ूम ज़ूम करे

तड़पाए

बक बक बक करे, 

सर खाए 

एक बात कभी अक्कल की 

कवित्त में नज़र न आए


तेरी झोली डारूँ, 

सब गाली हाथ जो आए

तेरे पीछे खोए 

जो घण्टे लौट के न वो आए


जिस धुन को चुना तूने 

उससे सर मैं धुनाऊँ

जिस घड़ी हाथ आया तेरे 

उसे कैसे भुलाऊँ 

और मेरा व्हाट्सेप,

तेरी पोस्ट से भर-भर जाए

ये ऐसी बीमारी, 

कि मैंने नेट लिए कटवाए


(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

राहुल उपाध्याय । 25 सितम्बर 2020 । सिएटल 


Monday, September 23, 2013

हमने देखी है कविताओं की परिभाषाएँ कई

हमने देखी है कविताओं की परिभाषाएँ कई
काट के पीट के इसके हिस्सों को नए आयाम न दो
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
कविता कोई गीत नहीं, कविता की रीत नहीं
एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है
न ये बुझती है न रुकती है न ठहरी है कहीं
नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
मुस्कुराहट सी खिली रहती है कविताओं में कहीं
तो कहीं ग़म के प्याले से भरे रहते हैं
शब्द कुछ कहते नहीं, शब्दों के जुड़ने पे मगर
अनेकानेक अर्थ निकलते रहते हैं
सिर्फ़ एहसास है ये रूह से महसूस करो
कविता को कविता ही रहने दो कोई नाम न दो
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
23 सितम्बर 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Thursday, April 23, 2009

हमने देखी थी

हमने देखी थी देश में पनपती अराजकता
आगे बढ़ कर उसे मिटाने का प्रयास न किया
सिर्फ़ संडास है कह के चले आए हम
हाथ तो धोए पर संडास साफ़ न किया

हम देशभक्त नहीं, करते देश से प्यार नहीं
थोड़ी दौलत, थोड़ी सहूलियत पे फ़िदा होते हैं
चाहे हिंदू हो, मुसलमां हो, या हो धर्म कोई
बन के एन-आर-आई, देश से विदा होते हैं

कभी बच्चे, कभी बीवी, कभी कैरियर की फ़िक्र
कभी किसी और ही स्वार्थ में डूबे रहते हैं
खास कुछ करते नहीं, हाँकते जोरो की मगर
एक एक बात में दस दस झूठ छुपे रहते हैं

सिएटल 425-445-0827
23 अप्रैल 2009
(
गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

Monday, August 11, 2008

हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

हज़ार आय-एम हमने भेजे
कहीं से कोई पिंग ना आई
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई

जहाँ से तुम बाय कर गये थे
वो विंडो अब भी खुली पड़ी है
हम अपने कम्प्यूटर में जाने कितने
और विंडो खोले हुए हैं
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई ...

कहीं किसी रोज़ यूं भी होता
हमारी ई-मेल तुम भी पढ़ती
जो बातें हमने कही न तुमसे
वो बातें तुमने भी सोची होती
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

तुम्हें है दु:ख कि हम क्यों आए
हमें है फ़क्र कि तुम हमारे 
फोन हाथों में अब भी लेकिन
रिंग रिंग बस वो पुकारे
बड़ी वफ़ा से, निभाई तुमने
हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई...

सिएटल,
11 अगस्त 2008
(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)
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आय-एम = IM, instant messenger
पिंग = ping
बाय = bye
विंडो = window
कम्प्यूटर = computer
ई-मेल = email
फ़ख़्र = pride
रिंग = ring

Friday, November 16, 2007

blog को blog ही रहने दो


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

हमने देखी हैं
इन blogs की टपकती लारें
भूल से भी इन्हें
comments का इनाम न दो
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

blog कोई wiki नहीं
blog website नहीं
एक email है
आए दिन post हुआ करती है
न कोई लिखता है
न कोई पढ़ता है
न पढ़ी जाती है
एक chain mail है
जो forward हुआ करती है
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

sinister से remarks
छुपे रहते हैं
smileys में कहीं
spelling mistakes से
भरे रहते हैं
sentences कई
बात कुछ कहते नहीं
काम की या कमाल की मगर
journalism की डींग भरा करते हैं
सिर्फ़ बकवास हैं ये
दूर से ignore करो
blog को blog ही रहने दो
कोई नाम न दो
हमने देखी हैं …

(गुलज़ार से क्षमायाचना सहित। फ़िल्म 'खामोशी' के लिए लिखे इस गीत को >यहाँ देखे)
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इतना सब कहने के बाद आप मेरे blog पर comments जरूर लिखे :)