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Friday, January 1, 2021

अर्थहीन शुभकामनाएँ

अर्थहीन शुभकामनाएँ 

न कोई लिखता है

न पढ़ता है

न समझता है

कोलाहल में 

हर कोई 

हो विवश 

जा जुड़ता है


अहिंसा परमो धर्म:

किंतु …


सर्वे भवन्तु सुखिनः 

इसमें भी कोई 

किंतु-परंतु हो तो बता दें


और ये जो

शुभ नव वर्ष है

इसमें से भी कुछ घटाना हो

तो घटा दिया करें 

ताकि बाद में कोई

दिक्कत न हो


और यह शुभ होगा कैसे?

क्या यह आपके कहने भर से 

हो जाएगा

क्या इसमें आपका भी कोई 

सक्रिय योगदान होगा?

या यूँही तमाशा देखेंगे 

कुछ ज़्यादा ही अच्छा हो गया 

तो

जलेंगे-भुनेंगे?


राहुल उपाध्याय । 1 जनवरी 2021 । सिएटल 









Thursday, December 31, 2020

शुभकामनाएँ

मैं

साल की कृत्रिम सीमाओं को नहीं मानता हूँ

और न ही इस पचड़े में पड़ना चाहता हूँ

कि साल में 365 दिन होते हैं या 365 और एक चौथाई

और न हीं इस द्वंद्व में फ़ंसना चाहता हूँ

कि साल एक जनवरी को बदलता है या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को


मैं तो बस इतना चाहता हूँ

कि आपके जीवन का हर पल

सुहाना हो

होंठों पे गीत हो

जो किसी को सुनाना हो

आपमें इतनी शक्ति हो

कि

झूठ बोलना न पड़े

सच कड़वा न लगे

और जब जितना मिले

उसमें घर चलाना

बुरा न लगे


राहुल उपाध्याय । 1 जनवरी 2013 । सिएटल 

Thursday, January 3, 2019

इसमें इतना भी क्या सोचना?

क्या हम सचमुच इतने भले हैं
कि सबका भला चाहते हैं?

क्या हम में से कोई भी
पुलिसवाला, डॉक्टर, या वकील नहीं 
जो कि दूसरे की आपदा में 
अपना भला देखता है?

कल यदि किसी सहकर्मी की 
पदोन्नति हो जाए
हमसे आगे निकल जाए
तो क्या हम ख़ुश होंगे कि
हमारी शुभकामनाएँ सफल हुईं?

या हम यूँही
इधर की शुभकामनाएँ 
उधर कर देते हैं
पूरी तरह जानते हुए कि
इन शुभकामनाओं में कोई दम नहीं हैं
मात्र खानापूर्ति है
सब करते हैं 
सो हमने भी कर दी
इसमें इतना भी क्या सोचना?

3 जनवरी 2019
सिएटल

Sunday, January 1, 2017

बस इतनी सी मेरी प्रार्थना

देने को तो दे ही चुके हैं

सब देनेवाले सुख-समृद्धि तुम्हें 

किस बात की है अब कमी तुम्हें 

किस बात की है तुम्हें चाह, प्रिये


लोहड़ी-संक्रान्ति-वसन्त पंचमी

होली-राम नवमी-जन्माष्टमी 

ऋद्धि-सिद्धि-दीप-दीपोत्सव

हैलोवीन-थैंक्सगिविंग-क्रिसमस ईव


सब सफल हों, सब सहर्ष हों

सबमें रचें-बसें कर्णप्रिय गीत, प्रिये


जब भी चाहो, ख़ुद को पाओ

ख़ुद से ना तुम दूर रहो

मिथ्या-ईर्ष्या-बैरी-शत्रुता

इनकी कभी कोई छाँह पड़े


बस इतनी सी मेरी प्रार्थना 

झोली में नहीं कुछ ख़ास, प्रिये


देने को तो दे ही चुके हैं ...


1 जनवरी 2017

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems 



Wednesday, January 7, 2015

सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी पर यक़ीं न करें


मुझे इंतज़ार है उस दिन का
जब घड़ियाँ बंद हो जाए
कैलेंडर खो जाए
कम्प्यूटर ख़राब हो जाए
फिर देखूँ कि कौन, किसे, किस बात की
शुभकामनाएँ देता है?

समय बदलने से ही
समय नहीं बदल जाता
इसके लिए आवश्यक है
कर्मठता और सहभागीदारिता

सिर्फ़ फ़ेसबुक की अपडेट से
बिट्स और बाईट्स के आदान-प्रदान से
कुछ नहीं होता

आप पूछेंगे कि
ख़ुशी के दिन इतना रोष क्यूँ ?
क्योंकि ख़ुशी के दिन का आक्रोष हमेशा याद रहता है
इसलिए आप भी याद रखें
और कुछ कर्म करें
सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी पर यक़ीं न करें

3 जनवरी 2015
सिएटल | 513-341-6798



Wednesday, November 27, 2013

गणित शुभकामनाओं का

आजकल सब कुछ नपा-तुला मिलता है
चाय में चीनी से लेकर शुभकामनाओं तक


नये साल की हुई तो एक साल की मिलती है
और जन्मदिन की?
बस एक दिन!
मात्र एक दिन!
फ़क़त एक दिन!
सिर्फ़ एक दिन!


और सब के सब
उसी 24 घंटे की अवधि में
लगे रहते हैं
ताबड़तोड़ 'विश' करने में
ताकि
गलती से भी
बंदे का
जन्मदिन के पहले वाला दिन
या जन्मदिन के बाद वाला दिन
सुखमय न हो जाए


-x-x-x-x-x-x

फ़ेसबूक को आप
चाहे कितना ही बुरा-भला कह लो
पर एक बात तो है
कि इसकी मार्फ़त
कुछ लोगों ने 'विश' तो किया
जन्मदिन पर दो शब्द तो लिखें


लेकिन
एक बात ज़रूर खलती है कि
इसमें 'डियर-वियर' का कोई रिवाज़ नहीं है
पता ही नहीं चलता है
कि हम किसके 'डियर' हैं
किसके 'डियरेस्ट'
और किसके सिर्फ़ राहुल


-----------
27 नवम्बर 2013
सिएटल । 513-341-6798

Tuesday, November 13, 2012

दीवाली की शुभकामनाएं

दीवाली की रात
हर घर आंगन 
दिया जले

उसने जो
घर आंगन दिया 
वो न जले


दिया जले
दिल न जले
यूंहीं ज़िन्दगानी चले


दीवाली की रात
सब से मिलो
चाहे बसे हो
दूर कई मीलों

शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो

दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली

Tuesday, December 28, 2010

नया साल - चार कविताएँ

साल दर साल
मन में उठता है सवाल
शुभकामनाओं की मियाद
क्यूं होती है बस एक साल?

चलो इसी बहाने
पूछते तो हो
एक दूसरे का हाल
साल दर साल
जब जब आता नया साल
==========
मियाद = duration



दीवाली पर wish किया
birthday पर wish किया
जब भी कोई मौका आया
मैंने उन्हें wish किया

holidays की wish दी तो
हाथ उन्होने खींच लिया
क्रोधित हो उन्होने
मुझे आड़े हाथ लिया

"आप क्यूं बोलते हैं Hinglish?
जब भी आप करते हैं wish
तब ऐसा लगता है कि
आप दे रहे हैं विष"

मैंने कहा, बस please
और बने language police
माना आपको संतोष नहीं
पर Hinglish का दोष नहीं
चाहे जैसे किया, पर wish किया
ये point तो आपने miss किया

शुद्ध हिंदी से क्या आस करे?
कौन इसका विश्वास करे?
विश्वास शब्द में भी
विष वास करे

जब आप देते हैं
मुझे शुभकामना
क्या आप चाहते हैं कि
मुझे मिले शुभ काम ना?

तर्क छोड़, एक जहां सुहाना सा बुन ले
और एक परस्पर प्यार का साबुन ले
जिससे ये संकीर्णता का विष wash करें
और कोई wish करे तो उसका विश्वास करें

सिएटल
12 दिसम्बर 2007
=================
विश = wish; हिंग्लिश = Hinglish; लेंगवेज = language
पॉईंट =point; मिस = miss; वाश = wash


पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की
क्यूंकि तब डायरी बदली जाती थी
पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्षा के आरम्भ की
जो सावन की बदली लाती थी

अब कम्प्यूटर के ज़माने में डायरी एक बोझ है
और बेमौसम बरसात होती रोज है

बदली नहीं बदली
ज़िंदगी है बदली

बारिश की बूंदे जो कभी थी घुंघरु की छनछन
आज दफ़्तर जाते वक्त कोसी जाती हैं क्षण क्षण
पानी से भरे गड्ढे जो लगते थे झिलमिलाते दर्पण
आज नज़र आते है बस उछालते कीचड़

जिन्होने सींचा था बचपन
वही आज लगते हैं अड़चन

रगड़ते वाईपर और फिसलते टायर
दोनो के बीच हुआ बचपन रिटायर

बदली नहीं बदली
ज़िंदगी है बदली

कभी राम तो कभी मनोहारी श्याम
कभी पुष्प तो कभी बर्फ़ीले पहलगाम
तरह तरह के कैलेंडर्स से तब सजती थी दीवारें
अब तो गायब ही हो गए ग्रीटिंग कार्ड भी सारे
या तो कुछ ज्यादा ही तेज हैं वक्त के धारें
या फिर टेक्नोलॉजी ने इमोशन्स कुछ ऐसे हैं मारे
कि दीवारों से फ़्रीज और फ़्रीज से स्क्रीन पर
सिमट कर रह गए हैं संदेश हमारे

जिनसे मिलती थी कभी अपनों की खुशबू
आज है बस वे रिसाइक्लिंग की वस्तु

बदली नहीं बदली
ज़िंदगी है बदली

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ की ...

सिएटल 425-445-0827
7 जनवरी 2010
================
वाईपर = wiper; टायर = tire; रिटायर = retire;
ग्रीटिंग कार्ड = greeting card; टेक्नोलॉजी = technology;
इमोशन्स = emotions; फ़्रीज = fridge;
स्क्रीन = screen; रिसाइक्लिंग = recycling

कहने लगे अग्रज मुझसे
तुम तो पूरे अंग्रेज़ हो
अपनी ही संस्कृति से
करते परहेज़ हो

1 जनवरी को ही
मना लेते हो नया साल
जबकि चैत्र मास में
बदलता है अपना साल

तुम जैसे लोगो की वजह से ही
आज है देश का बुरा हाल
तुम में से एक भी नहीं
जो रख सके अपनी धरोहर को सम्हाल

मैंने कहा
आप मुझसे बड़े हैं
मुझसे कहीं ज्यादा
लिखे पढ़े हैं

लेकिन अपनी गलतियाँ
मुझ पे थोपिए
अपने दोष
मुझ में खोजिए

हिंदू कैलेंडर आपको तब-तब आता है याद
जब जब मनाना होता है कोई तीज-त्योहार

जब जब मनाना होता है कोई तीज-त्योहार
आप फ़टाक से ठोंक देते हैं चाँद को सलाम

लेकिन स्वतंत्रता दिवस
क्यूँ मनाते हैं 15 अगस्त को आप?
और गणतंत्र दिवस भी
क्यूँ मनाते हैं 26 जनवरी को आप?

जब आप 2 अक्टूबर को
मना सकते हैं राष्ट्रपिता का जन्म
तो 1 जनवरी को क्यूँ नहीं
मना सकते हैं नव-वर्ष हम?

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मेरी बात माने
तो एक काम करें
जिसको जब जो मनाना है
उसे मना ना करें
मना कर के
किसी का मन खट्टा ना करें