Sunday, April 15, 2018
जान जाने के बाद जान लेते हैं
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:31 PM
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Friday, March 30, 2018
बाईक, मोबाईल और कामवाली बाई
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:35 PM
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Tuesday, December 25, 2012
ऐ दुनिया, तेरे ग़मों का अहसानमंद हूँ मैं
कि वस्ल के बाद भी उन्हें बेहद पसंद हूँ मैं
न होते ग़म, न वो ढूँढते खुशियाँ
ग़मों के कोट पे लगा पैबंद हूँ मैं
लेना सांस मैं छोड़ पाता नहीं हूँ
क्या करूँ वक़्त का बड़ा पाबंद हूँ मैं
न सपूत किशन, न राधा बहू है
मैं नंद सा नहीं, रहता सानंद हूँ मैं
लिखने को लिख सकता था शिवसेना पे मैं
पर मंदबुद्धि नहीं, बहुत अकलमंद हूँ मै.
25 दिसम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:04 PM
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Friday, March 2, 2012
न घाट है न घर है
न घाट है न घर है, कहते महानगर हैं
तारों के जाल में तारें आते न नज़र हैं
बस्ती है कि जंगल, कहना मुश्किल है
आदमियों की खाल में बसते अजगर हैं
आदमी तो आदमी, देवता भी कमाल है
कालीनदार कमरों में दिखे भोले शंकर हैं
आप ही बताईए, ये ऐसी कैसी चाल है?
कि खाते-पीते घर के ही क्यूँ बनते अफ़सर हैं
कहने की बात है, घंटी कहाँ बजती है?
घर्घर रिंगटोन ही हम सुनते घर-घर हैं
राहुल उपाध्याय | 2 मार्च 2012 | दिल्ली
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:28 AM
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Thursday, September 15, 2011
सपने जब सच होते हैं
अंगूर जो हम खा नहीं पाते, कितने मीठे लगते हैं
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:21 PM
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Thursday, August 4, 2011
दिन पर दिन, दीन दीन होते रहें
दिन पर दिन, दीन दीन होते रहें
पकड़ के मीन, मीन खोते रहें
कमाया मगर गवाँया समझ
जो फल न सके बीज बोते रहें
चश्मे को नैनों ने चश्मा किया
टप-टप टीप-टीप रोते रहें
स्टेशन कई आए मगर
उतरें नहीं बस सोते रहें
अब क्या किसी से कोई कहानी कहे
न वो दादा रहें, न वो पोते रहें
हमने तो की मोहब्बत मगर
दाग समझ वो धोते रहें
सिएटल
4 अगस्त 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:59 AM
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Friday, March 25, 2011
दुनिया नई बसा लेते हैं लोग
इससे पहले कि दिया बुझे, दिया नया जला लेते हैं लोग
दिया तो दिया, दुनिया नई बसा लेते हैं लोग
डरते हैं पतन न कहीं जाए झलक
चेहरे पे चेहरा लगा लेते हैं लोग
यूँ तो आने-जाने की किसी को फ़ुरसत नहीं
लेकिन बात-बात पे महफ़िल जमा लेते हैं लोग
कभी इसकी तो कभी उसकी
जैसे भी हो खिचड़ी पका लेते हैं लोग
भरती का शेर राहुल से बनता नहीं
बनाने को बनाने वाले बना लेते हैं लोग
सिएटल, 25 मार्च 2011
Posted by Rahul Upadhyaya at 5:24 PM
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Monday, May 3, 2010
यदि सुधरा जो मैं
न ग़म होता है, न वहम होता है
तसव्वुर में मेरे जब मेरा सनम होता है
इंसां हैं सभी और सभी मेहरबान
वो तो दीवारों का दूसरा नाम धरम होता है
यदि सुधरा जो मैं तो बच्चे हो जाएगे बाँझ
क्योंकि अच्छों का दुबारा नहीं जनम होता है
तक़दीर पे अपनी जो करते हैं भरोसा
हाथों से उनके नहीं करम होता है
वो तो प्यार करो तब होती हैं खफ़ा
वरना हसीनाओं का दिल बड़ा नरम होता है
सिएटल । 425-445-0827
3 मई 2010
Posted by Rahul Upadhyaya at 9:44 AM
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Monday, April 26, 2010
इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए
इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए
इक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैं
हमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगा
रोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैं
कहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिन
और हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैं
पीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती संभाले
रोज-रोज नए मॉडल का इंतज़ार करते हैं
हर गलती में हमारा भी कुछ हाथ होगा
इस सम्भावना से हम कहाँ इंकार करते हैं
चलो अच्छा ही हुआ हमने सच सुन लिया
वरना हम तो समझते थे कि हम तुमसे प्यार करते हैं
सिएटल । 425-445-0827
26 अप्रैल 2010
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अलार्म = alarm; मॉडल = model;
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:32 PM
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Wednesday, March 31, 2010
21 वीं सदी
डूबते को तिनका नहीं लाईफ़-गार्ड चाहिए
ग्रेजुएट को नौकरी ही नहीं ग्रीन-कार्ड चाहिए
खुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी से
हर किसी को अब मॉनेट्री रिवार्ड चाहिए
जो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त का
उन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये बॉडी-गार्ड' चाहिए
घर बसाना इतना आसान नहीं इन दिनों
कलेजा पत्थर का और हाथ में क्रेडिट-कार्ड चाहिए
फ़ेसबुक, ट्वीटर और ब्लाग के ज़माने में
भुला दिये गये हैं वो जिन्हे सिर्फ़ पोस्ट-कार्ड चाहिए
सिएटल । 425-445-0827
==========================
लाईफ़-गार्ड lifeguard; ग्रेजुएट = graduate;
ग्रीनकार्ड = green card; मॉनेट्री रिवार्ड = monetary reward;
बॉडी-गार्ड = bodyguard; क्रेडिट-कार्ड = credit card;
फ़ेसबुक = facebook; ट्वीटर = twitter;
ब्लाग = blog; पोस्ट-कार्ड = post card;
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:50 AM
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Friday, March 12, 2010
सपने दिखाई नहीं देते हैं
आँखें इतनी कमज़ोर हैं कि
सपने दिखाई नहीं देते हैं
आदमी तो आदमी
गधे दिखाई नहीं देते हैं
ईश्वर के साम्राज्य को
कुत्तों को कौन समझाए
कि जब तक न बरसात हो
कुकुरमुत्ते दिखाई नहीं देते हैं
कैसे हैं ये महानगर
कैसा इनका विकास है
कि बढ़ रही है आबादी
और बच्चे दिखाई नहीं देते हैं
जिन हसीनाओं ने पहना
नौ-लखा परफ़्यूम है
उन हसीनाओं के तन पे क्यूँ
कपड़े दिखाई नहीं देते हैं
जब भी होता है कोई हादसा
और भर आते हैं नैन
पड़ोसी होते पास नहीं
और अपने दिखाई नहीं देते हैं
मतलब के हैं दोस्त सभी
मतलब के हैं भक्त
मंदिर में न हो प्रसाद यदि
बंदे दिखाई नहीं देते हैं
सिएटल । 425-445-0827
12 मार्च 2010
Posted by Rahul Upadhyaya at 2:35 PM
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Thursday, November 19, 2009
मणियाँ
फूलों की बगिया ज्यों किश्तों में खिलती है
इंसां की किस्मत भी किश्तों में जगती है
भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है?
होने-बरसने में यारो इक उम्र गुज़रती है
मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना
इन के ही मिश्रण से शख़्सियत निखरती है
जब आता है संकट, हम खुद को परखते हैं
और मूल्यों-विश्वासों की दुनिया सँवरती है
जब होता है मन का, तो लगता है अच्छा
जब मन का न हो, तभी तो मणियाँ निकलती हैं
सिएटल
19 नवम्बर 2009
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:01 PM
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Sunday, July 12, 2009
जो गुज़र गया वो गुज़श्ता है
जो गुज़र गया वो गुज़श्ता है
जो हाथ में है वो गुलदस्ता है
जिसे कहता साक़ी ज़माना था
उसे हम कहते आज बरिस्ता है
जो प्यार करे और घाव न दे
वो आदमी नहीं फ़रिश्ता है
रिश्तों से बड़ा कोई नासूर नहीं
नासूर तो केवल रिसता है
देख चाँद समंदर कुछ यूँ बौराया
कि आज भी रेत पे सर घिसता है
है गरीब मगरिब मशरिक नहीं
जो कागज़ की थाल परसता है
====================
गुज़श्ता = भूतकाल
बरिस्ता = Barista
मगरिब = पश्चिम
मशरिक = पूरब
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:36 PM
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Tuesday, August 19, 2008
छप्पन छुरी
छल-छल के छलनी किया मछली ने मुझे
उड़-उड़ के लूटा तितली ने मुझे
दिल्ली वाली बिल्ली दिल ले गई
चेन्नई वाली चिड़िया चैन ले गई
कहीं का न छोड़ा किसी गली ने मुझे
पागल दीवाना जब दिल हो गया
उनका इरादा तबदील हो गया
प्यासा लौटाया बदली ने मुझे
चंचल छबीली मुझे टीज़ कर गई
छप्पन छुरी ऐसी टीस भर गई
जैसे धर दिया हो ब्रूस-ली ने मुझे
सिएटल,
19 अगस्त 2008
=============================
छल =to deceive
छलनी = to be full of small holes
तबदील = change
टीज़ = tease
छप्पन छुरी = अपने रुप से पुरुषों पर गहरा वार करने वाली रमणी
टीस =throbbing pain
ब्रूस-ली = Bruce Lee
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:36 PM
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Saturday, August 16, 2008
हुस्न और इश्क़ का असर हो गया
हुस्न और इश्क़ का असर हो गया
आदमी था काम का सिफ़र हो गया
हँस-हँस के लूटा हर बेब ने मुझे
आप को गिला कि मैं बेबहर हो गया
लिखता हूँ लिखता ही रहूँगा सदा
सुन-सुन के गालियाँ निडर हो गया
ख़ुद की कहता हूँ ख़ुदा की नहीं
जो मार के इन्सां अमर हो गया
नन्हा सलोना सा जीवन था मेरा
बढ़ते बढ़ते दीगर हो गया
फ़ोर्ट वॉर्डेन,
16 अगस्त २००८
============
सिफ़र = zero, शून्य
गिला = शिकायत
बेब = babe
बेबहर = बिना बहर का, without meter
दीगर = अन्य, another, दूसरा
Posted by Rahul Upadhyaya at 1:56 PM
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Saturday, July 19, 2008
दिल पे आई आब ये देखो
दिल पे आई आब ये देखो
उनका हुआ जनाब ये देखो
हर तरफ़ हैं उनके ही जलवे
खिलता हुआ XXXX ये देखो
जो देखे वो वहीं रुक जाए
बर्फ़ हुई XXXX ये देखो
ऐसा हुस्न कि घायल कर दे
कट गया XXXX ये देखो
खोया दिल और पाया उनको
सीधा साधा XXXX ये देखो
देता जाऊँ और बढ़ता जाए
प्यार बड़ा XXXX ये देखो
कर के ख़ुद को उन के हवाले
'राहुल' बना XXXX ये देखो
=================
आब = चमक
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ऐसी रचनाओं को मैं सभारंजनी रचना कहता हूँ - जिनमें हर दूसरी लाईन पंचलाईन होती है। जब ऐसी रचनाएँ सुनाई जाती हैं तो कोशिश यह की जाती है कि पहली लाईन दो तीन बारी दोहराई जाए ताकि श्रोताओं की जिज्ञासा बढ़े कि पंचलाईन में काफ़िया क्या होगा?
चूंकि आप सुनने की बजाए इसे पढ़ रहे हैं - मैं चाहता हूँ कि आप भी सभा के आनंद से वंचित न रहे। इसलिए सारे काफ़ियें छुपा दिये हैं। कल तक इंतज़ार करें और मैं सारे काफ़ियें उजागर कर दूंगा।
तब तक आप खुद अपने दिमागी घोड़े दौड़ाए और अंदाज़ा लगाए कि कौन से शब्द XXXX की जगह ठीक बैठेगें। आप अपने शब्द मुझे भेज सकते हैं, ई-मेल द्वारा (upadhyaya@yahoo.com) - या फिर यहाँ दे दे अपनी टिप्पणी द्वारा। एक बात ध्यान में रखें कि कुल 6 शब्द हैं। कोई भी शब्द दोहराया नहीं गया है।
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काफ़िया = दो शब्दों का ऐसा रूप-साम्य जिसमें अंतिम मात्राएँ और वर्ण एक ही होते हैं। जैसे-कोड़ा, घोड़ा और तोड़ा,या गोटी चोटी और रोटी का काफिया मिलता है।
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आब-जनाब के काफ़िए:
आदाब, आफ़ताब, कबाब, ख़्वाब, खराब, खिज़ाब, गुलाब, चनाब, जवाब, जुर्राब, तलाब, ताब, दाब, नक़ाब, नवाब, नायाब, बेहिसाब, (भाई) साब, महताब, रूआब, लाजवाब, शराब, शादाब, सैलाब, हिज़ाब, हिसाब
मैं आब, जनाब के लिए बस इतने ही सोच सका। हो सके तो आप कुछ अपनी तरफ़ से जोड़ें। क्या कोई शब्दकोष, थेसारस जैसी कोई पुस्तक या वेब-साईट है, जहाँ इस तरह की सूची उपलब्ध हो?
Posted by Rahul Upadhyaya at 4:24 PM
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Saturday, July 12, 2008
ज़िंदगी हो multiple choice
ज़िंदगी हो पर प्यार न हो
जैसे जीत हो पर हार न हो
जैसे धन हो पर अपार न हो
जैसे फूल हो पर बहार न हो
जैसे पालकी हो पर कहार न हो
जैसे नौकरी हो पर पगार न हो
जैसे गैस हो पर कार न हो
ज़िंदगी हो और ज़ज़बात न हो
जैसे दीप हो और बात न हो
जैसे शब्द हो और बात न हो
जैसे बाजा हो और बारात न हो
जैसे अंधेरा हो और रात न हो
जैसे कलम हो और दवात न हो
जैसे बच्चे हो और उत्पात न हो
ज़िंदगी हो और सुख न हो
जैसे एक्ज़ाम हो और बुक न हो
जैसे टिफिन हो और भूख न हो
जैसे किचन हो और कुक न हो
ज़िंदगी हो और कोई संग न हो
जैसे रुप हो पर रंग न हो
जैसे रूत हो पर पतंग न हो
जैसे होली हो पर हुड़दंग न हो
जैसे लस्सी हो पर भंग न हो
जैसे रात हो पर पलंग न हो
जैसे गीत हो पर तरंग न हो
सिएटल,
12 जुलाई 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 12:37 PM
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Monday, July 7, 2008
कभी कभी दुआओं का जवाब आता है
कभी कभी दुआओं का जवाब आता है
और कुछ इस तरह कि बेहिसाब आता है
यूँ तो प्यासा ही जाता है अक्सर सागर के पास
मगर कभी कभी सागर बन कर सैलाब आता है
ढूंढते रहते हैं जो फ़ुरसत के रात दिन
हो जाते हैं पस्त जब पर्चा रंग-ए-गुलाब आता है
दो दिलों के बीच पर्दा बड़ी आफ़त है
तौबा तौबा जब माशूक बेनक़ाब आता है
पराए भी अपनों की तरह पेश आते हैं 'राहुल'
वक़्त कभी कभी ऐसा भी खराब आता है
सेन फ़्रंसिस्को,
2003
==============
सैलाब = floods
पर्चा रंग-ए-गुलाब= pink slip, notice of dismissal from one's job
Posted by Rahul Upadhyaya at 6:02 PM
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Friday, June 13, 2008
जो दबता है उसी को दुनिया दबाती है
जो दबता है उसी को दुनिया दबाती है बदली भी सूरज नहीं बस चाँद छुपाती है हसरत है उनकी कि मैं तारें तोड़ लाऊँ और उंगलियाँ मेरी बस चाँद छू पाती हैं धरती है कि बेधड़क घूमती ही जा रही है और फूंक-फूंक के दुनिया कदम बढ़ाती है सुना है कि उम्र के साथ आँखें हो जाती है कमज़ोर तो फिर बचपन और बुढ़ापे में क्यों एक सा रूलाती हैं लड़खड़ाता हूँ मैं मुझे नहीं मिलता सहारा मरने वालो को दुनिया कंधों पे उठाती है सोचता हूँ रोज़ अब और हाथ नहीं मैं मैलें करूँगा लेकिन ज़रुरतों की नई-नई फ़सल रोज उग आती है कहने को तो वैसे बहुत कुछ है 'राहुल' लेकिन वो माँ कहाँ जो लोरी सुनाती है सिएटल, 13 जून 2008
Posted by Rahul Upadhyaya at 11:02 AM
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Tuesday, June 3, 2008
मेरी कविता और आपके शब्द
मेरी कविता में बसती है बस मेरी भावना
विनती है कि भावना का लगे ##1## ना
सब पढ़ते हैं सुनते हैं पर समझते हैं वो
मात्र मात्रा की गलती पर जो खाते ##2## ना
मेरा ही लहू हो और मेरी ही कलम
किसी और का कुछ लगे ##3## ना
जो पहले से हैं वही कुरेदें हैं मैंने
नए सिरे से मैंने किये ##4## ना
कलम टेढ़ी न हो तो मैं लिख पाता नहीं
सीधी पतवार से तो माझी खेतें ##5## ना
धूप से है जीवन और धूप से है विकास
छालों के डर से मुसाफ़िर मांगे ##6## ना
आज़ादी का मतलब मैं समझ पाया नहीं
लीक से हट कर जब तक रखें ##7## ना
बधाई मिले और ज़माना पूजता रहे
इस तरह की राहुल रखे ##8## ना
सिएटल
3 जून 2008
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ऐसी रचनाओं को मैं सभारंजनी रचना कहता हूँ - जिनमें हर दूसरी लाईन पंचलाईन होती है। जब ऐसी रचनाएँ सुनाई जाती हैं तो कोशिश यह की जाती है कि पहली लाईन दो तीन बारी दोहराई जाए ताकि श्रोताओं की जिज्ञासा बढ़े कि पंचलाईन में काफ़िया क्या होगा?
चूंकि आप सुनने की बजाए इसे पढ़ रहे हैं - मैं चाहता हूँ कि आप भी सभा के आनंद से वंचित न रहे। इसलिए सारे काफ़ियें छुपा दिये हैं। कल तक इंतज़ार करें और मैं सारे काफ़ियें उजागर कर दूंगा।
तब तक आप खुद अपने दिमागी घोड़े दौड़ाए और अंदाज़ा लगाए कि कौन से शब्द #### की जगह ठीक बैठेगें। आप अपने शब्द मुझे भेज सकते हैं, ई-मेल द्वारा (upadhyaya@yahoo.com) - या फिर यहाँ दे दे अपनी टिप्पणी द्वारा। एक बात ध्यान में रखें कि कुल 8 शब्द हैं। कोई भी शब्द दोहराया नहीं गया है।
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काफ़िया = दो शब्दों का ऐसा रूप-साम्य जिसमें अंतिम मात्राएँ और वर्ण एक ही होते हैं। जैसे-कोड़ा, घोड़ा और तोड़ा,या गोटी चोटी और रोटी का काफिया मिलता है।
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Posted by Rahul Upadhyaya at 11:40 AM
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