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Monday, April 23, 2018

काजल के निशान

शर्ट के कंधे पर
काजल के निशान
किसी ख़ुशनसीब को ही नसीब होते हैं

जब मन्नत पूरी हो जाती है
आँसू छलक ही जाते हैं

23 अप्रैल 2018
सिएटल

Tuesday, November 11, 2014

होता सु-नाता तो सुनाता कोई

होता सु-नाता तो सुनाता कोई
लोरी गाकर सुलाता कोई

तान छेड़े, ताने न मारे
ऐसे मुझे अपनाता कोई

मेहंदी लगे हाथों की खुशबू
सूंघ लेता मैं जो बू लाता कोई

न ग़म होता, न ग़मी होती
हँसता कोई, हँसाता कोई

तलो तले मेले में आज
गोदी में यूँ तुतलाता कोई

11 नवम्बर 2014
सिएटल । 513-341-6798

Saturday, January 19, 2013

चेहरे पे आ जाती चमक है


दार्जलिंग की वादियों में
आसमान फट चुका था
गर-बरस के थम चुका था
कुछ बादल 
रुई के फोहों से 
इधर-उधर भटक रहे थे
दिल में अरमां मचल रहे थे
शाम सर्द थी
बदन सुलग रहे थे

मोटी चोटी गुंथी हुई थी
ज़िंदगी कितनी सुलझी हुई थी
तुम थी, मैं था और समा था
चिंता-फ़िकर का न कोई पता था

घंटे नहीं
कुछ पल ही थे गुज़रें
लेकिन ताज़ा ऐसे
जैसे कल ही थे गुज़रें

आज चिंता है
आज फ़िकर है
लेकिन याद में बसी
कुछ ऐसी इतर है
कि
घोर घटा हो
घोर तिमिर हो
चारों ओर 
छिड़ा समर हो
याद आते ही
बदल जाती शकल है
चेहरे पे 
आ जाती चमक है

19 जनवरी 2013
सिएटल । 513-341-6798
==========
इतर = इत्र

Saturday, November 10, 2012

खूबसूरत जज़बातों का अहसास

किसी की मूंगफली
किसी की चाट
किसी के खूबसूरत जज़बातों का अहसास


यही तो है जो
लेता है श्वास
रहता है साथ
मुझे तुमसे
देता है बांध


अहसासों का बांध
बांधता भी है
तो
यदा-कदा बहता भी है


बह के कभी
बन जाता है खार
बन जाता नहर
किसी वादी के कोने में जाता ठहर
ताकि
चावल उगें
फूल खिलें
किसी के सोए
अरमां जगें


किसी की मूंगफली
किसी की चाट
किसी के खूबसूरत जज़बातों का अहसास


यही तो है जो
लेता है श्वास ...


10 नवम्बर 2012
सिएटल ।
513-341-6798
==========
खार = न नदी, न नहर, इन दोनों से परे एक छोटा बहाव जो गाँव से हो कर गुज़रता है, और जिसमें बचपन में मैं खूब नहाया हूँ

Friday, November 9, 2012

भूनी हुई मूंगफ़लियाँ

आज दस्तानें पहनते ही शिमला की भूनी हुई मूंगफ़लियाँ याद आ गई
जो हम समर हिल से शिमला स्कूल जाते वक्त खाते जाते थे


समर हिल के एक टीले पर
एक बूढ़े के
झुर्रीदार हाथों से
गरमागरम मूंगफ़लियाँ खरीदी जाती थी
(पैसे तुम ही देती थी)
और सारे रास्ते खाई जाती थीं


न जाने छिलकों का क्या करते थे
शायद फ़ेंक ही देते होंगे
शाम को पैदल आते तो शायद वे बिखरे हुए मिल भी जाते
लेकिन लौटते वक्त तो
दौड़-भाग कर 5:25 की ट्रैन पकड़ ही लेते थे
वो भी बिना टिकट के
और फिर प्लेटफ़ार्म की दूसरी तरफ़ से उतर कर
पटरियाँ उलांघ कर गिडियन कॉटेज की ओर निकल जाते थे


अगले दिन भी छिलके कभी दिखे नहीं
या कहो कि देखे ही नहीं


जब साथ हो
और कहने को कोई बात हो
(एक नहीं, ढेर सारी बात हो)
तो कौन भला कचरे को देखता है?


9 नवम्बर 2012
सिएटल ।
513-341-6798

Friday, September 28, 2012

बारीश की बूंदें


मुझे आज भी याद है
शिमला के
सिसिल होटल के
सामने का गज़ीबो
जिसमें
स्कूल से आते वक्त
बारीश में भीगते हुए
हम घुसे थे दोनों

तुम्हारी मांग में 
कुछ बूंदें
अटक गई थी

मैंने चाहा था छूना
लेकिन उन्हें छुआ नहीं था

मुझे आज भी याद है
उन बूंदों की चमक
उस मांग की महक
उन बालों का तनाव
ठंड का बढ़ना
सांसों का चलना
और
मेरा-तुम्हारा कुछ न कहना

हम चुप थे
लेकिन 
अनभिज्ञ नहीं थे

या यूँ कह लो
कि अनभिज्ञ नहीं थे
इसीलिये चुप रहें थे

उस दिन तो
हम छतरी ले जाना भूल गए थे
लेकिन उस दिन के बाद से
हमने भूल के भी कभी
छतरी नहीं ली

बारीश की बूंदों का
तन से मिलन का
मज़ा ही कुछ और है

मुझे आज भी याद है ...

28 सितम्बर 2012
सिएटल । 513-341-6798

Tuesday, September 4, 2012

अलसाते गीत

उम्र ढल चुकी है
श्वास शिथिल है
बालों पर भी रंग चढ़ चुके हैं
लेकिन निगाहें वहीं रूकी है
जिस डगर पर तुम मिली थी
कोमल भावनाएँ जब जगी थीं
आलिंगन आतुर तुम खड़ी थी
और घटाएँ छा रही थीं
उमंगें मंडरा रही थीं


न दिन का समय था
न रात हुई थी
बस जज़बात की
बरसात हुई थी


बड़ी देर तक हम चुप रहे थे
कहने को कुछ ढूँढ रहे थे


और मुझे कुछ सूझा नहीं
तो मैंने बस ये कह दिया था
"अच्छा बताओ तुम क्या सुनोगी
रेडियो सिलोन या विविध भारती?
ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस
या रेडियो नेपाल के अलसाते गीत?"


दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन ...

सिएटल । 513-341-6798
4 सितम्बर 2012