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Friday, November 5, 2010

दीवाली - अपना, अपना रंग

It is just November 5th

Democrats lost
Independents won
Washington is counting
And you want me to do what?
Light up a lamp because
It is time to party?

Dismal weather
Increasing unemployment
Waning wages
All are signs that
Life is ugly and
It is just November 5th

Don’t worry
It will all be over
Well wishers say
Although they fully know that
Life is ugly and
It is just November 5th

Don’t you know
If wishes were horses
We will all be riders
And since it isn’t so
Let it go
It is just November 5th

Seattle,
November 5th , 2010

दीवाली की शुभकामनाएं

दीवाली की रात
हर घर आंगन
दिया जले

उसने जो
घर आंगन दिया
वो न जले
दिया जले
दिल न जले

यूंहीं ज़िन्दगानी चले
दीवाली की रात
सब से मिलो

चाहे बसे हो
दूर कई मीलों

शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो

दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली

सेन फ़्रांसिस्को
अक्टूबर 2000



दीवाली की यादें

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न स्कूल हैं बंद
न हैं आँफ़िस में छुट्टी
किस्मत भी देखो
किस तरह है फ़ूटी
बाँस को भी था
आज ही सताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न वो पूजा का मंडप
न वो फूलों की खुशबू
न वो बड़ों का आशीष
न वो अपनो की गुफ़्तगू
समां फिर ऐसा
मिले तो बताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो मिठाई के डब्बे
वो दस तरह के व्यंजन
न था डाँयबिटिज़ का डर
न थे डाँयटिंग के बंधन
वो खूब खिला के
अपनापन जताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो गलियों में रंगत
वो दहलीज़ पे रंगोली
वो रंगीं पोषाकों में
बच्चों की टोली
सपना सा लगता है
अब वो ज़माना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

याद आता है
वो पटाखों का शोर
बारूद में महकी
वो जाड़ों की भोर
वो रात-रात भर
दीपक जलाना


दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

सिएटल
24 अक्टूबर 2005

एक और दीवाली



अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

होली का माहौल हो
या दीवाली का त्यौहार
मनाया जाता है
सिर्फ़ शनिवार रविवार
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

एक ही तरह की
महफ़िल है सजती
निमंत्रण देने पर
घंटी है बजती

कर के वही
बे-सर-पैर की बातें
गुज़ारी जाती हैं
वो दो-चार रातें

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

त्यौहार-दर-त्यौहार
वहीं लाल-पीले
कपड़े पहने हैं जाते
वहीं घीसे-पीटे जोक्स
सुनाए हैं जाते

वहीं छोले
वहीं मटर-पनीर
वहीं गुलाब जामुन
और वहीं खीर
अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

पैसे की होड़ में
आगे बड़ने की दौड़ में
पार की थी सरहदें
और पार कर गए कई हदें

दोस्तों से बंद हुआ
दुआ-सलाम
भूल गए करना
बड़ो को प्रणाम

धूल खा रहा है
पूजा का दीपक
रामायण के पोथे को
लग गई है दीमक

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली


महानगर की गोद में
ईमारतों की चकाचौंध में
हैं अपनों से दूर
हम सपनों के दास
न पूनम से मतलब
न अमावस का अहसास

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

सिएटल
21 अक्टूबर 2006

Wednesday, October 14, 2009

शुभ दीपावली


Monday, September 28, 2009

माताएँ खलनायकों की

रात को सोते समय
बेटे को सुनाता हूँ कहानी
राम के
कृष्ण के
उद्भव की कहानी

बहुत दिनों तक
सुनने के बाद
बेटा एक दिन बोला

कृष्ण की माँ थी देवकी
और यशोदा जी ने उन्हें पाला
राम की माँ थी कौशल्या
और कैकयी ने उन्हें निकाला

लेकिन
रावण की
कंस की
माँ के बारे में
क्यूँ नहीं कुछ बताया?

क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
कैसे उसे समझाऊँ
कि इस कोशिश में
कि कहानी सशक्त बन सके
कई खटकर्म किए हैं जाते
घटनाएँ जोड़ी जाती हैं
पात्र छाँटे जाते
खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते
तरह तरह के जामे
पहनाए उन्हें हैं जाते
नख-शिखा-दाढ़ी-मूँछ
सर-सींग लगाए हैं जाते

खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते

सिएटल 425-898-9325
विजय दशमी, 2009

Wednesday, May 21, 2008

मैं 25 साल बाद

मैं इस साल दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
25 साल बाद
पहली बार दीवाली पर अपने घर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

बचपन में कभी कोई चीज नहीं मांगी
क्या मैं अब मांग पाऊंगा?
बचपन में कभी पटाखें नहीं छोड़े
क्या मैं अब छोड़ पाऊंगा?
बचपन में कभी गले नहीं लगाया
क्या मैं अब गले लगा पाऊंगा?

बचपन में मैं पाँव तो छू पाता था
लेकिन दिल की बात छुपा जाता था
क्या मैं अब बतलाऊँगा
और
क्या मैं अब छुपाऊंगा

गुज़र गई हैं हज़ारों रातें
पुरानी हो चुकी हैं जो बातें
क्या मैं उन्हें फिर से छेड़ पाऊंगा?
अनछुए विषयों को
क्या मैं छू पाऊंगा?
ओझल होते हुए सम्बंधों को
क्या मैं सम्बोधित कर पाऊंगा?

या फिर हमेशा की तरह
जाऊँगा और बस जा कर आ जाऊँगा

मैं 25 साल बाद
अपने घर दीवाली पर जाऊँगा
बहुत सारी यादें संजो कर जाऊँगा
न जाने कितनी वापस ले कर आऊंगा

सिएटल,
21 मई 2008

Wednesday, November 7, 2007

मूर्ति पूजा

बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो पूजा जिनकी हो रही है आज मंडप में जो कर रहे हैं राज लाला की दुकान पर बिक रहे थे वो सुनार-कुम्हार के हाथों पिट रहे थे वो कौड़ियों के भाव बिक जाते हैं जो समृद्ध हमें करेंगे वो? बिकना जिनके मुकद्दर में हो मोक्ष हमें दिलाएंगे वो? पंडित के सुलाने से सो जाते हैं जो किस्मत हमारी जगाएंगे वो? पलक झपकते ही विसर्जित हो जाते हैं जो भव सागर पार कराएंगे वो? लालची का लोभ है या प्रेमी का प्यार है दुखियारे का दर्द है या सतसंग का संस्कार है शिल्पी का हुनर है या भक्ति का चमत्कार है दुनिया जिसे कहती है पत्थर करती उसी का सत्कार है आज एक और त्यौहार है लगा रिवाज़ों का बाज़ार है हम भी उसमें जुट गए जहाँ सबसे लम्बी कतार है भरा हुआ भंडार है सम्पदा जहाँ अपार है गरीब से गरीब भी वहाँ दे रहा उपहार है बिक गया है जो लुट गया है वो तराना पुराना हो गया है वो 7 नवंबर 2007

Tuesday, November 6, 2007

दीवाली की छुट्टी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

लक्ष्मी की पूजा
और लक्ष्मी कमाना
दोनो को हमने
एक है माना
इसीलिए छुट्टी नहीं लेते हैं हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

मिठाई की दुकान
नहीं होती है बंद
लक्ष्मी कैसे आए
जब दुकान हो बंद
करम का ही दूसरा नाम है धरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

आँफ़िस से छुट्टी
शायद मिल भी जाए
पर स्कूल से
कैसे 'बंक' किया जाए
इम्तहान न दिया तो 'फ़ैल' होंगे हम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

दीवाली का दिन भी
ठीक से तय नहीं
आज है या कल
कोइ सहमत नहीं
'वीकेंड' पे मिलो करो झगड़ा खतम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

जैसा है देस
वैसा है भेस
मिल-जुल के खाओ-पिओ
खूब करो ऐश
खामखां आप यूं हो नहीं गरम
लगता है आपको गलत है भरम
कि दीवाली मनानें में हमें हैं शरम

Friday, November 2, 2007

दीवाली की शुभकामनाएं


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली की रात
हर घर आंगन
दिया जले
उसने जो
घर आंगन दिया
वो न जले

दिया जले
दिल न जले
यूंहीं ज़िन्दगानी चले

दीवाली की रात
सब से मिलो
चाहे बसे हो
दूर कई मीलों
शब्दों से उन्हे
आज सब दो
न जाने फिर
कब दो

दुआ दी
दुआ ली
यहीं है दीवाली

अक्टूबर 2000

दीवाली की यादें


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न स्कूल हैं बंद
न हैं आँफ़िस में छुट्टी
किस्मत भी देखो
किस तरह है फ़ूटी
बाँस को भी था
आज ही सताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

न वो पूजा का मंडप
न वो फूलों की खुशबू
न वो बड़ों का आशीष
न वो अपनो की गुफ़्तगू
समां फिर ऐसा
मिले तो बताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो मिठाई के डब्बे
वो दस तरह के व्यंजन
न था डाँयबिटिज़ का डर
न थे डाँयटिंग के बंधन
वो खूब खिला के
अपनापन जताना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

वो गलियों में रंगत
वो दहलीज़ पे रंगोली
वो रंगीं पोषाकों में
बच्चों की टोली
सपना सा लगता है
अब वो ज़माना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

याद आता है
वो पटाखों का शोर
बारूद में महकी
वो जाड़ों की भोर
वो रात-रात भर
दीपक जलाना

दीवाली मनाए
हो गया एक ज़माना
जीने का मतलब
जब से हो गया कमाना

सिएटल
24 अक्टूबर 2005

Thursday, November 1, 2007

एक और दीवाली


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

होली का माहौल हो
या दीवाली का त्यौहार
मनाया जाता है
सिर्फ़ शनिवार रविवार

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

एक ही तरह की
महफ़िल है सजती
निमंत्रण देने पर
घंटी है बजती
कर के वही
बे-सर-पैर की बातें
गुज़ारी जाती हैं
वो दो-चार रातें

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

त्यौहार-दर-त्यौहार
वहीं लाल-पीले
कपड़े पहने हैं जाते
वही घिसे-पिटे जोक्स
सुनाए हैं जाते
वही छोले
वही मटर-पनीर
वहीं गुलाब जामुन
और वही खीर

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

पैसे की होड़ में
आगे बढ़ने की दौड़ में
पार की थीं सरहदें
और पार कर गए कई हदें

दोस्तों से बंद हुआ
दुआ-सलाम
भूल गए करना
बड़ों को प्रणाम
धूल खा रहा है
पूजा का दीपक
रामायण के पोथे को
लग गई है दीमक

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

महानगर की गोद में
इमारतों की चकाचौंध में
हैं अपनों से दूर
हम सपनों के दास
न पूनम से मतलब
न अमावस का अहसास

अब कहाँ की दीवाली
और कैसी दीवाली
आएगी और जाएगी
एक और दीवाली

21 अक्टूबर 2006

Sunday, October 28, 2007

कैसी होगी दीवाली?

जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां मिलेंगे लोग भूलेंगे रोग खाएंगे मिठाई लगाएंगे भोग आंखों में चमक, अधरों पे मुस्कान मीठी-मीठी बातें बोलेंगी ज़ुबां जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां फटेंगे फ़टाखें गुंजेगे धमाके गली-गली होंगे दोस्तों के ठहाके ये सब कुछ होगा वहाँ और हम-तुम होंगे यहाँ जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का होगा समां काली रात ठंडी बरसात यहाँ होंगी हमारे साथ शायद हो दिसम्बर में यहाँ जो होगा नवम्बर में वहाँ जलेंगे दीपक सजेगा मकां हँसी-खुशी का ा होगा समां उदास न हो निराश न हो इस तरह हताश न हो अभी से जलाओ शमां जो जनवरी तक रहे जवां जलाओ दीपक सजाओ मकां हँसी-खुशी का बनाओ समां सिएटल 27 अक्टूबर 2007