ये ज़िंदगी की है दौलत
ये ज़िंदगी की सज़ा भी
कहते हैं मोहब्बत जिसको
है खूबसूरत बला सी
पहले कहाँ थी ये आदत
हर रोज देखें किसी को
दिन-रात चिपके हैं फोन से,
जैसे हो प्रेयसी हमारी
अपने इन ख्वाबों के पीछे
हम क्यों सदा भागते हैं
जब सब कुछ है मन के भीतर
फिर क्यूँ है इक बदहवासी
हाथों से अपने ही आखिर
बनता-बिगड़ता है सब कुछ
फिर क्यूँ उठा के इनको
करते हैं एक दुआ भी
होता है हर रोज कोई
तमाशा जो चौंकाए हमको
तमाशों से रोचक है जीवन
तमाशा ही है ज़िंदगानी
राहुल उपाध्याय । 6 जून 2026 । सिएटल

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