Showing posts with label Anatomy of an NRI. Show all posts
Showing posts with label Anatomy of an NRI. Show all posts

Friday, July 17, 2020

हैरत होती है

हैरत होती है 

जब देखता हूँ 

दो नाव में 

पाँव रख

खुद को खेते हुए 

कभी कुछ

तो कभी कुछ को

खोते हुए 


कभी-कभी तो

सोचता हूँ 

कि माँ-बाप

इतना जीते क्यूँ हैं 

जीते हैं 

तो बीमार क्यूँ होते हैं 

और बीमार होते हैं 

तो ख़ुद का ख़्याल 

क्यों नहीं रख पाते हैं 


मैं यहाँ हूँ 

बीवी-बच्चों के पास

वे वहाँ हैं

नितांत अकेले


माँ

गुज़र गईं

ख़ुद गिर गए 


क्या कोई व्यावसायिक सेवा है

जो उन्हें 

दे सके दवा

कर सके दुआ

पिला सके पानी

बदल सके डायपर


मैं हूँ 

पर नहीं हूँ 


आय-आय-टी पास हूँ 

एम-बी-ए भी हूँ 

आय भी है लाख डॉलर से ऊपर

लेकिन किसी रिक्शा चालक से

भी ज़्यादा मजबूर हूँ मैं


बंधुआ मज़दूर नहीं 

पर उससे कम बंदी नहीं 

न सलाख़ें हैं

न हथकड़ियाँ 

न बंधन कोई 

न पाँव में हैं कोई बेड़ियाँ 


परदेस छोड़ने में 

कोई रोक-टोक नहीं 

पर वापस न आ सका

तो सब चौपट हो जाएगा

न आय-आय-टी

न एम-बी-ए

कुछ काम आएगा 


धोबी का कुत्ता

न घर का

न घाट का

रह जाएगा


राहुल उपाध्याय । 17 जुलाई 2020 । सिएटल 


Sunday, June 21, 2020

धर्मरक्षक

मैं एक इंजीनियर हूँ
और भारत से बाहर रहता हूँ
लेकिन मुझमें भारतीय संस्कार अभी भी बरकरार हैं

अभी कुछ दिन पहले की बात है
एक मंदिर बनाने के लिए धन इकट्ठा किया जा रहा था
मैंने भी तुरंत डेढ़ सौ डालर का चैक काट कर दे दिया
अरे भई हम अपने धर्म की रक्षा नहीं करेंगे तो कौन करेगा?

और मंदिर में अपने नाम की एक टाईल भी लगवा ली
उसके लिए अलग से 250 डालर दिए
साथ में अपनी पत्नी और बच्चों के भी नाम लिखवा दिए
अरे नाम तो मैं अपने माता-पिता का भी लिखवा देता
लेकिन क्या करूँ 
वे अभी ज़िंदा हैं

******

अब मैं हर रविवार मंदिर जाता हूँ
आरती में
कीर्तन में
हिस्सा लेता हूँ
अपने बच्चों को भी साथ ले जाता हूँ
ताकि अपनी संस्कृति की पहचान अगली पीढ़ी में बनी रहे

अपने घर में
पूजा पाठ कहाँ हो पाती है?
पहले ही जीवन में भागदौड़ इतनी है
कि अब पूजा-पाठ की मुसीबत कौन सर पर ले?
उन्हें नहलाओ-धुलाओ, पोशाक पहनाओ, तिलक लगाओ
दीप जलाओ, अगरबत्ती लगाओ
ऊफ़! कितनी आफ़त है
और ऊपर से दीपक और अगरबत्ती से कारपेट पर कालिख और बढ़ जाती है
साफ़ ही नहीं होती

मंदिर में पुजारी जी है
जो सब सम्हाल लेते हैं
उन्हें समय से उठाते हैं, सुलाते हैं, खिलाते हैं
हम हफ़्ते में एक दिन जाकर माथा टेक आते हैं
हुंडी में कुछ दान-दक्षिणा डाल आते हैं
वे भी खुश
हम भी खुश

और जैसा कि मैंने आपसे कहा
बावजूद इसके कि
मैं एक इंजीनियर हूँ
और भारत से बाहर रहता हूँ
मुझमें भारतीय संस्कार अभी भी मौजूद हैं

और तो और
मैं अपने माता-पिता को ईश्वर का दर्जा देता हूँ

मैं हर साल भारत जाता हूँ
कभी क्रिसमस की छुट्टी पर
तो कभी गर्मी की छुट्टी पर
उनसे मिल कर आता हूँ
अपने बच्चों को भी साथ ले जाता हूँ
ताकि अपने पूर्वजों की पहचान अगली पीढ़ी में बनी रहे

इस परदेस में
उनकी देख-रेख कहाँ हो पाती?
पहले ही जीवन में भागदौड़ इतनी है
कि अब उनकी मुसीबत कौन सर पर ले?
उनके साथ बात करो, उन्हें डाक्टर के पास ले जाओ, उनके लिए अलग भोजन बनाओ
ऊफ़! कितनी आफ़त है
और उपर से रोज़-रोज़ साड़ी, धोती वाशिंग मशीन में कहाँ धुल पाती हैं
और बाथटब में धोओ तो रंग अलग से निकलता है
बाथरूम इतने गंदे हो जाते हैं
कि साफ़ ही नहीं होते

भारत में एक आया है
जो सब सम्हाल लेती है
उन्हें समय से खिलाती है, पिलाती है, दवाई देती है, मालिश करती है
हम साल में एक बार जाकर उनसे आशीर्वाद ले आते हैं
आया को उपहार दे आते हैं
वह भी खुश
हम भी खुश

राहुल उपाध्याय । 23 अगस्त 2009 । सिएटल 

Friday, March 15, 2019

तेरी दुनिया से हो के मगरूर चला

तेरी दुनिया से हो के मगरूर चला
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला

इस क़दर दूर कि फिर लौट के भी सकूँ
ऐसी मंज़िल कि जहाँ ख़ुद को भी मैं पा सकूँ
और मजबूरी है क्या इतना भी बतला सकूँ

आय बढ़ भी जो गई, और मैं माँगूँगा
नागरिकता छोड़नी भी पड़ी तो सहर्ष छोड़ दूँगा 
किससे नाता है मेरा, नाता हर-एक से तोड़ लूँगा 

ख़ुश रहूँ मैं हूँ जहाँ, ये हैं दुआएँ मेरी
सबकी राहों से जुदा हो गईं राहें मेरी
कोई नहीं पास मेरे, बस हैं सदाएँ मेरी 

(प्रेम धवन से क्षमायाचना सहित)
राहुल उपाध्याय 15 मार्च 2019 सिएटल

Wednesday, March 27, 2013

न holiday है न holy day है

न holiday है न holy day है
बस ठंडा-ठंडा Wednesday है


होली तो हमारी कब की हो ली
पिछले weekend ही खेल ली होली


चन्द्र-तिथि में क्या रक्खा है?
चढ़ते सूरज को सबने मथा है


हम भी इसके पीछे आए थे घर से
लोक-लाज सब ताक पे धर के


कि एक दिन हम आराम करेंगे
धन बहुतेरा तब तक जोड़ ही लेंगे


लेकिन वो दिन अब कब आएगा यारो?
वक़्त यूँही गुज़र जाएगा यारो


और अगले साल भी हम यही कहेंगे

न holiday है न holy day है
बस ठंडा-ठंडा Monday है


27 मार्च 2013
सिएटल ।
513-341-6798

Sunday, October 14, 2012

विदेश में आए, वी-डेश हुए


विदेश में आए, वी-डेश हुए
सपने सारे यूँ डेंट हुए

सोचा था आ के खूब कमाएंगे हम
टेलेंट हैं जितने, कैश कराएंगे हम
बंधन-प्रतिबंध में कुछ यूँ फंसें
कि टेलेंट सारे लेटेंट हुए

आने की दिल में बड़ी चाह थी
कमाने की सूझी बस यही राह थी
माना कि फूलों संग काँटें भी होंगे
लेकिन ये क्या कि सारे बसंत बे-सेंट हुए

जीते हैं हम, लेकिन हैं हारे हुए
किस्मत से बदकिस्मती के मारे हुए
गाड़ी है, बंगला है, डॉलर भी है
लेकिन होने को औरों के सरवेंट हुए

14 अक्टूबर 2012
सिएटल । 513-341-6798
=========
वी-डेश = v- employee, the one who is hired as a contractor as opposed to a full time employee who gets full benefits
डेंट = dent
टेलेंट = talent
कैश = cash
लेटेंट = latent
बे-सेंट=without scent, without fragrance
सर्वेंट = servent

Monday, November 28, 2011

कहीं दूर जब पासपोर्ट बन जाए

कहीं दूर जब पासपोर्ट बन जाए
जल्दी से उसमें वीसा लगाए
दूर-दराज के देश में जा के
कोई सपनों के दीप जलाए

कहीं तो ये दिल कभी जुड़ नहीं पाते
कहीं से निकल आए जन्मों के नाते
भली सी लड़की से ब्याह रचा के
ग्रीन-कार्ड की प्यास बुझाए
कहीं दूर जब...

कभी यूँहीं जब हुई ले-ऑफ़ की बातें
भर आई बैठे-बैठे बस यूँहीं आँखें
कहाँ पे आ के, फ़ंसे हम हाए
अधेड़ उम्र कुछ समझ न पाए
कहीं दूर जब...

कभी तो ये दिल कहे, चलो घर जाए
फिर कहे, अभी रूके, अभी और कमाए
कमा-कमा के बरस हैं गुज़रे
जाने की फिर भी न टिकट कटाए
कहीं दूर जब...

(योगेश से क्षमायाचना सहित)

Monday, October 26, 2009

हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

नाम भी, काम भी, कमाई भी
हाय! क्या चीज है एन-आर-आई भी

इसी को शायद कहते हैं ख़ुदा की नेमत
कि केक खाई भी और केक बचाई भी

बात-बात में ले आते हैं देश की बात
कभी करते हैं बड़ाई तो कभी बुराई भी

शाने-वतन में है कुछ इनका भी हाथ
कभी बढ़ाई तो कभी घटाई भी

कल तलक जो थे बाप-दादा के दुश्मन
आज उन्हीं के बन बैठे घर-जमाई भी

भूख बढ़ती है तो बढ़ती ही चली जाती है
जेब में है लाख मगर छूटती नहीं एक पाई भी

शौच का ढंग जो बदला तो बदली सोच भी साथ
हाय किस मिट्टी का बना है एन-आर-आई भी

कैसा भावुक है ये एन-आर-आई यारो
कभी देता है मुझे गाली तो कभी बधाई भी

सिएटल 425-898-9325
26 अक्टूबर 2009
(
फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, October 7, 2009

जीत गया भई जीत गया

जीत गया भई जीत गया
इंडिया वाला जीत गया
गोरों की जमात में
बंदा अपना दिख गया

नाम ही अपने कुछ ऐसे हैं
कि दूर से पहचान लेते हैं
ये दक्षिण का है
ये अहिंदी है
बिन बोले ताड़ लेते हैं

एक बार फिर वही जीता है
जो अंग्रेज़ी बोलना सीख गया

सीख गया भई सीख गया
इंडिया वाला सीख गया
आत्मसम्मान खो के वो
सम्मान पाना सीख गया

भाषा से विचार बनें
और विचार से आचार
जो माँ की बोली बोल न पाए
वो माँ से करेगा क्या प्यार

सोने चाँदी के टुकड़ों पे
माँ का दूध फिर आज बिक गया

बिक गया भई बिक गया
इंडिया वाला बिक गया
गरीबी और बेरोज़गारी में
माँ से माँ का लाल छीन गया

ज्ञान-विज्ञान की भाषा में
कहीं दिल की बात भी होती है?
लाख चांदनी रात में हो
रात तो रात ही होती है

वो जब समझेगा तब समझेगा
आज तो बंदा हिट गया

हिट गया भई हिट गया
इंडिया वाला हिट गया
दूर-दराज की रोशनी पे
नूर अपना मर-मिट गया

सिएटल 425-898-9325
7 अक्टूबर 2009

Friday, May 22, 2009

मैं कायर तो नहीं

मैं कायर तो नहीं
मगर जबसे घर छोड़ा मैंने
तबसे मुझमें कायरता आ गई
मैं गद्दार तो नहीं
मगर जबसे घर छोड़ा मैंने
तबसे मुझमें गद्दारी आ गई

डॉलर का नाम मैंने सुना था मगर
डॉलर क्या है ये मुझको नहीं थी ख़बर
मैं तो
चिपका रहा इससे जोंक की तरह
दुम हिलाता रहा
पालतू कुत्तों की तरह
मैं गरीब तो नहीं
मगर जबसे घर छोड़ा मैंने
तबसे मुझमें दीनता आ गई

सोचता हूँ अगर मैं बुरा मानता
हाथ अपने फ़ैला कर न यूँ भागता
घर पे रहता अन्य परिजनों की तरह
दर-दर न भटकता भीखमंगों की तरह
मैं बेशर्म तो नहीं
मगर जबसे घर छोड़ा मैंने
तबसे मुझमें बेशर्मी आ गई

रात-दिन फ़्री के चक्कर में रहता हूँ मैं
चाराने-आठाने के कूपन लिए फ़िरता हूँ मैं
लाईब्रेरी जा के डी-वी-डी लाता हूँ मैं
मंदिर जा के खाना खा आता हूँ मैं
मैं कंजूस तो नहीं
मगर जबसे घर छोड़ा मैंने
तबसे मुझमें कंजूसी आ गई

सिएटल 425-898-9325
22 मई 2009
(
आनंद बक्षी से क्षमायाचना सहित)
===========================================
डॉलर = dollar; कूपन = coupon; फ़्री = free; लाईब्रेरी = library; डी-वी-डी = DVD

Saturday, May 9, 2009

मैं अपनी माँ से दूर

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

हर हफ़्ते
मैं उसका हाल पूछता हूँ
और अपना हाल सुनाता हूँ

सुनो माँ,
कुछ दिन पहले
हम ग्राँड केन्यन गए थे
कुछ दिन बाद
हम विक्टोरिया-वेन्कूवर जाएगें
दिसम्बर में हम केन्कून गए थे
और जून में माउंट रेनियर जाने का विचार है

देखो न माँ,
ये कितना बड़ा देश है
और यहाँ देखने को कितना कुछ है
चाहे दूर हो या पास
गाड़ी उठाई और पहुँच गए
फोन घुमाया
कम्प्यूटर का बटन दबाया
और प्लेन का टिकट, होटल आदि
सब मिनटों में तैयार है

तुम आओगी न माँ
तो मैं तुम्हे भी सब दिखलाऊँगा

लेकिन
यह सच नहीं बता पाता हूँ कि
20 मील की दूरी पर रहने वालो से
मैं तुम्हें नहीं मिला पाऊँगा
क्यूंकि कहने को तो हैं मेरे दोस्त
लेकिन मैं खुद उनसे कभी-कभार ही मिल पाता हूँ

माँ खुश है कि
मैं यहाँ मंदिर भी जाता हूँ
लेकिन
मैं यह सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता हूँ
कि मैं वहाँ पूजा नहीं
सिर्फ़ पेट-पूजा ही कर पाता हूँ

बार बार उसे जताता हूँ कि
मेरे पास एक बड़ा घर है
यार्ड है
लाँन में हरी-हरी घास है
न चिंता है
न फ़िक्र है
हर चीज मेरे पास है
लेकिन
सच नहीं बता पाता हूँ कि
मुझे किसी न किसी कमी का
हर वक्त रहता अहसास है

न काम की है दिक्कत
न ट्रैफ़िक की है झिकझिक
लेकिन हर रात
एक नए कल की
आशंका से घिर जाता हूँ
आधी रात को नींद खुलने पर
घबरा के बैठ जाता हूँ

मैं लिखता हूँ कविताएँ
लोगो को सुनाता हूँ
लेकिन
मैं यह कविता
अपनी माँ को ही नहीं सुना पाता हूँ

लोग हँसते हैं
मैं रोता हूँ

मैं अपनी माँ से दूर अमेरिका में रहता हूँ
बहुत खुश हूँ यहाँ मैं उससे कहता हूँ

Thursday, April 23, 2009

हमने देखी थी

हमने देखी थी देश में पनपती अराजकता
आगे बढ़ कर उसे मिटाने का प्रयास न किया
सिर्फ़ संडास है कह के चले आए हम
हाथ तो धोए पर संडास साफ़ न किया

हम देशभक्त नहीं, करते देश से प्यार नहीं
थोड़ी दौलत, थोड़ी सहूलियत पे फ़िदा होते हैं
चाहे हिंदू हो, मुसलमां हो, या हो धर्म कोई
बन के एन-आर-आई, देश से विदा होते हैं

कभी बच्चे, कभी बीवी, कभी कैरियर की फ़िक्र
कभी किसी और ही स्वार्थ में डूबे रहते हैं
खास कुछ करते नहीं, हाँकते जोरो की मगर
एक एक बात में दस दस झूठ छुपे रहते हैं

सिएटल 425-445-0827
23 अप्रैल 2009
(
गुलज़ार से क्षमायाचना सहित)

Wednesday, April 22, 2009

घर छोड़ के हम आए हैं

घर छोड़ के हम आए हैं
तो रहना ही पड़ेगा
रह-रह के अपने आप को
छलना ही पड़ेगा

वो घर भी था अपना ही घर
ये घर भी है अपना
कह-कह के यही बात हमें
सच्चाई से है बचना
हर स्वार्थ को नकाब से
ढकना ही पड़ेगा

क्या सोचा था, क्या पाएंगे,
क्या पा के रहेंगे?
जो मांगा वो मिल जाए
तो क्या लौट सकेंगे?
हर रोज़ हमें ख़्वाब नया
बुनना ही पड़ेगा

क्या सोचते हैं, चाहते हैं
किस से कहेंगे?
इतने बड़े जहाँ में
किसे अपना कहेंगे?
मन मार के तनहाई में
घुटना ही पड़ेगा

जो चाँद पूजे, पत्थर पूजे
वो धर्म नहीं है
जो धन दे दे, धर्म वही,
कर्म वही है
फल पाने के लिए, जड़ों से
हटना ही पड़ेगा

है आज यहाँ काम
यहाँ नाम है अपना
कल को कोई
पूछेगा नहीं नाम भी अपना
डर-डर के हमें रात-दिन
खटना ही पड़ेगा

जाए न जाए कहीं
जग से जाएंगे
जाएंगे जग से लेकिन
सो के जाएंगे
हर ख़्वाब को नींद में
मिटना ही पड़ेगा

सिएटल 425-445-0827
28 मार्च 2009
(
शकील बदायुनी से क्षमायाचना सहित)

Monday, April 20, 2009

वापसी पे मनते दीपोत्सव नहीं

वो घड़ी
वो लम्हा
वो क्षण
मानव के इतिहास में है
स्वर्ण अक्षरों में दर्ज

मस्तिष्क में हैं अंकित
अभी तक उस जूते की छाप
जिसने एक ही कदम में
लिया था ब्रह्माण्ड को नाप

अर्घ देती थी जिसे
शादीशुदा नारी सभी
शिव की शोभा जिसे
कहते थे ज्ञानी-ध्यानी सभी
अच्छी तरह से याद है
दुनिया को
अभी तक वो घड़ी
जब जूतों तले रौंदी गई थी उसकी ज़मीं

लेकिन
वापसी की घड़ी
ठीक से याद नहीं

जो होता है दूर
वो लगता है चाँद
जो होता है पास
नहीं लगता है खास

जो होता है दूर
उसकी आती है याद
जो होता है पास
वो लगता है भार

त्रेतायुग और कलियुग में फ़र्क यही
जानेवाले किये जाते हैं सहर्ष विदा
वापसी पे मनते दीपोत्सव नहीं

सिएटल 425-445-0827
20 अप्रैल 2009

Sunday, February 8, 2009

मुझे सफ़ाई पसंद है

मुझे इस्तेमाल कर के फ़ेंक देना अच्छा लगता है
कितना साफ़-सुथरा सा हो जाता है घर
मैं औरों की तरह नहीं हूँ
कि घर में कबाड़ इकट्ठा किए जा रहे हैं
जैसे कि दूध खतम हो गया
तो बोतल में दाल भर ली
बिस्किट खतम हो गए
तो डब्बे में नमकीन भर लिया
अखबार पुराना हो गया
तो उससे किताब पर कवर चढ़ा लिया
या अलमारी में बिछा दिया

इतना भी क्या मोह?
कब तक पुरानी यादों को ढोता रहे कोई?

मुझे इस्तेमाल कर के फ़ेंक देना अच्छा लगता है
कितना साफ़-सुथरा सा हो जाता है घर
फ़ेंकता भी हूँ तो बड़े एहतियात के साथ
पर्यावरण की चिंता जो है
यहाँ कागज़
यहाँ काँच
यहाँ प्लास्टिक
और यहाँ माता-पिता
एक वक्त ये भी बहुत काम के थे
माँ दूध पिलाती थी
लोरी सुनाती थी
पिता गोद में खिलाते थे
कंधों पे बिठाते थे
और अब
माँ दिन भर छींकती है, कराहती है
पिता रात भर खांसते हैं, बड़बड़ाते हैं

मुझे इस्तेमाल कर के फ़ेंक देना अच्छा लगता है
कितना साफ़-सुथरा सा हो जाता है घर

सिएटल 425-445-0827
8 फ़रवरी 2009

Saturday, February 7, 2009

मेरी परीक्षा ले कर तो देखो

मैं कोई भीष्म पितामह तो नहीं
लेकिन इतना कमजोर भी नहीं
कि तुम फोन करो
और मैं फोन उठा लूँ
तुम
एक बार
फोन कर के तो देखो

मैं कोई तपस्वी तो नहीं
लेकिन इतना गया-गुज़रा भी नहीं
कि तुम मुस्कराओ
और मैं पिघल जाऊँ
तुम
एक बार
मुस्करा कर तो देखो

मैं कोई देशभक्त तो नहीं
लेकिन एक एन-आर-आई भी नहीं
कि तुम चंद सिक्के दो
और मैं देश छोड़ दूँ
तुम
एक बार
चंद सिक्के दे कर तो देखो

सिएटल.
7 फरवरी 2009

Tuesday, September 16, 2008

आपने कभी एन-आर-आई देखा है?

देखा है एन-आर-आई को कुछ इतना समीप से
धन-सम्पदा है लाख मगर लगते गरीब से

धन से है कितना मोह ज़रा देख लीजिए
तेल बेचने लगे हैं अपने घर के प्रदीप से

सोचा था लौट आएंगे वापस वो एक दिन
अभी तक भटक रहे हैं किसी बदनसीब से

मणि मिले तो चाट ले चमड़ी गोरों की
चाहे पड़े रहे परिजन लाचार निर्जीव से

स्वार्थ और लोभ की ये ज़िन्दा मिसाल हैं
समाज से कटे-कटे रहते हैं द्वीप से

इनकी वफ़ा की लाश को आओ विदा करें
दे कर के पासपोर्ट जो मिला है रकीब से

होता न राहुल एन-आर-आई तो होता क्या भला
एन-आर-आई न टंगे दिखते यूँ इक सलीब से

सिएटल,
16 सितम्बर 2008
(साहिर से क्षमायाचना सहित)
==========================
मिसाल = उदाहरण
रकीब = दुश्मन
सलीब = सूली

Tuesday, August 12, 2008

खुशहाली की नई मिसाल देखिए

खुशहाली की नई मिसाल देखिए
एन-आर-आई एक जनाब देखिए

जी-हज़ूरी करते हैं औरों की लेकिन
माँ-बाप से करवाते काम देखिए

जिस फ़ौज ने मार डाले पूर्वज इनके
उसी फ़ौज में भरती संतान देखिए

बहुत घमंड है इन्हें दान पे अपने
ख़ुद खोजते सस्ती दुकान देखिए

आत्मा बेच कर धन हैं कमाते
फलता-फूलता ये व्यवसाय देखिए

बैंक बैलेंस देख के इतराते हैं लेकिन
अपना एक भी नहीं पास देखिए

नेताजी माताजी तक तो सही है
ख़ुद पर सहते नहीं कटाक्ष देखिए

जब भी पढ़ते हैं राहुल की रचना
तमतमाता हुआ रुख़सार देखिए

सिएटल,
12 अगस्त 2008

=============
भरती = enlisted
रुख़सार = गाल

भारत छोड़ो आंदोलन

वतनफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे मन में है
विदेशी नागरिकता का ख़्वाब आज हमारे जन-जन में हैं

डॉक्टर नहीं, इंजीनियर नहीं
वकील नहीं, कलाकार नहीं
ऐसा कोई व्यवसायी नहीं
जो बिकने को तैयार नहीं
बिक गया अमरीका में कोई तो कोई बिक गया लंदन में है

सुबह नहीं, शाम नहीं
दिन नहीं, रात नहीं
ऐसा कोई वक़्त नहीं
जब न होती बात यही
कि सबसे सुखी संतान वही जो पलती विदेशी आंगन में है

हाय करे, हैलो करे
झुक झुक के नमस्कार करे
गौरी चमड़ी, काली कार
देख देख के जयजयकार करे
मृत होते आत्मसम्मान को हम ढक रहे सिक्कों के कफ़न में है

मैं नहीं, आप नहीं
भाई नहीं, बाप नहीं
ऐसा कोई व्यक्ति नहीं
जो करता धन का जाप नहीं
एक एक करके सब के सब खप गए इस ईधन में हैं

पूजा नहीं, पाठ नहीं
किसी का सत्कार नहीं
उंगलियों पे गिन सको
इतने भी संस्कार नहीं
न खुद्दारी है किसी भाई में न मान-मर्यादा किसी बहन में है

गाँव नहीं, शहर नहीं
गली नहीं, बस्ती नहीं
एक भी मुझे मिली नहीं
ऐसी कोई हस्ती कहीं
जो तल्लीन देश के, समाज के, विकास के चिंतन में है

पूरब नहीं, पश्चिम नहीं
उत्तर नहीं, दक्षिण नहीं
ऐसी कोई दिशा नहीं
जहाँ न हो लक्षण यही
कि हर एक शाख पे उल्लू बैठा आज इस उपवन में है

सिएटल,
12 अगस्त 2008

Friday, July 25, 2008

हम अमरीका में रहते हैं


हम अमरीका में रहते हैं
तीस हज़ार की गाड़ी है
और पांच-दस पैसे सस्ती कहीं गैस मिल जाए
इस चक्कर में मारे-मारे फिरते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
सात लाख का घर है
लेकिन माली के लिए पैसे नहीं हैं
मरे हुए सूखे पत्ते लॉन में फ़ड़फ़ड़ाते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
हज़ारों-लाखों की आय है
लेकिन मुफ़्त में खाना मिले
तो एक घंटे तक प्रवचन सुनते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
तीन हज़ार स्क्वेयर फ़ीट का घर है
और कोई अगर आ जाए
तो वे कहाँ रहेंगे यहीं सोचते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
एक कार-फ़ैक्स एकाउंट को
दस-दस लोग शेयर करते हैं
एक कॉस्टको कार्ड के लिए
दूसरा साथी ढूंढते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
कब किस कॉलिंग कार्ड पर
दस डॉलर का रिबेट मिलेगा
दु्निया भर से पूछते रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
घर में ढेर सारी आईस-क्रीम है
लेकिन बास्किन राबिन्स
एक फ़्री स्कूप दे दे तो
नुक्कड़ तक हम लाईन लगाए रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं
हम रुपयों के लिए यहाँ आए थे
और जैसे-जैसे वे हमें मिलते जाते हैं
हम उनके लिए और उतावले बने रहते हैं

हम अमरीका में रहते हैं

सिएटल,
25 जुलाई 2008
=========================
गैस = gas, gasoline, petrol
तीन हज़ार स्क्वेयर फ़ीट = 3000 sq. ft.
कार-फ़ैक्स एकाउंट = car-fax account
शेयर = share
कॉस्टको कार्ड = costco card
कॉलिंग कार्ड = calling card
रिबेट = rebate
आईस-क्रीम = ice cream
बास्किन राबिन्स = Baskin Robbins
फ़्री स्कूप = free scoop
उतावले = impatient

Sunday, June 29, 2008

वापसी

देश छोड़ कर
विदेश आना
बहुत आसान था

सब की शुभकामनाएं जो मेरे साथ थी
माँ-बाप-भाई-बहन की दुआएं मेरे साथ थी

खुद की काबिलियत पर भरोसा था
हाथों में शक्ति और मन में हौसला था
स्वर्ग सा सुंदर लगता था स्टूडियो
जबकि मुड़ कर देखो तो महज घोंसला था

जहाँ रूकता था अच्छा लगता था
जो मिलता था अच्छा लगता था
जबकि न किसी को जानता था
न किसी को पहचानता था

देश छोड़ कर
विदेश आना
बहुत आसान था

आज वापस लौट कर
अपने ही घर जाना
बहुत मुश्किल है

वो मेरे परिचित
जिन्होंने मुझे शुभकामनाएं दी थी
आज उनकी आँखों में प्रश्न होगें

वो मेरे अपने
जिन्होंने मुझे दुआएं दी थी
आज उनके सपने दफ़्न होगें

बोतल से प्याले में
शराब उड़ेलना जितना आसान है
प्याले से बोतल में
डालना उतना ही मुश्किल है

बोतल खोलना
प्याले भरना
स्वाभाविक है
अपेक्षित है
एक जश्न है

वापस पलट देना
एक ऐसा प्रश्न है
जिसका उत्तर न कोई मांगता है
और न ही दिया जा सकता है

बहुत किया विचार विमर्ष
तब निकला ये निष्कर्ष
बहता है जीवन जैसे बहे रिवर्स
चले फ़ॉरवर्ड नहीं चले रिवर्स

जो बीत गया सो बीत गया
जो जीत गया सो जीत गया
जो पार गया सो पार गया
जो हार गया सो हार गया

देश छोड़ कर
विदेश आना
बहुत आसान था

आज वापस लौट कर
अपने ही घर जाना
बहुत मुश्किल है

सिएटल,
29 जून 2008
=================
दफ़्न = दफ़न, buried
स्वाभाविक = natural
अपेक्षित = expected
जश्न = celebration
निष्कर्ष = result
रिवर्स = rivers, reverse