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Monday, May 24, 2021

निकलें थे पैसा कमाने

निकलें थे पैसा कमाने 

अब धर्म बन गया है

किसी के लिए मर्ज़ 

किसी का ज़ख़्म बन गया है


कोई कहे ग्राहक सर्वोपरि 

कोई कहे शेयरहोल्डर

निकलें थे पैसा कमाने

अब गर्व बन गया है 


अपनी-अपनी मंशा सबकी

अपना-अपना शग़ल

निकलें थे पैसा कमाने

अब कर्म बन गया है 


कोई कहे प्यार मेरा

कोई कहे जुनून 

निकलें थे पैसा कमाने

अब सनम बन गया है 


कोई और कुछ जाने ना

ना करे मर जाए

निकलें थे पैसा कमाने

अब वहम बन गया है 


राहुल उपाध्याय । 24 मई 2021 । सिएटल 



Saturday, May 15, 2021

आते-जाते रास्तों में गीत भी बोओ कभी

मौत रही सस्ती हमेशा से ज़िंदगी ही है क़ीमती 

मान लो मेरी बात मुझसे राज़ी है हकीम भी 


आपकी बातें मेरी समझ में कुछ आतीं नहीं 

या तो आप या मैं ही हूँ शायद अफ़ीमची


हमारे हैं तंज वार और आप भी कुछ कम नहीं 

ख़ूब पटेगी हमारी और होगी खूब जंग भी 


गले मिलने से सारे घुल जाते हैं शिकवे

कौन जाने कब भला आएगी वो रूत भी


आते-जाते रास्तों में गीत भी बोओ कभी

क्या पता कब शाम हो और सुबह की न हो राह भी


राहुल उपाध्याय । 15 मई 2021 । सिएटल 




Tuesday, May 11, 2021

साथ हैं तो आप हैं

न कत्ल हुएँ

न शहीद हुएँ

साँस गई

और अज़ीज़ गएँ


हैं सुनसान रास्ते

दिल-दिमाग खाँसते 

आग का पता नहीं 

धुआँ बस नापते 

ग़रीब तो ग़रीब थे

अमीर भी ग़रीब हुएँ


माना कि इलाज नहीं

पर ऐसा भी नहीं 

कि बचाव नहीं

अलग-थलग रहते

तो होता कोई प्रभाव नहीं 


लेकिन 

इंसान ही ऐसा जीव है 

जो होता नहीं क्षीण है

एकता के बल पर

लेता हर जंग जीत है


एकता ही के दम पे

नील उतरे चाँद पे

कदम भले ही एक था

कंधे तो हज़ार थे


हाँ, भाई ही तो थे वो

(और राइट भी)

जो सबसे पहले

उड़े धरा छोड़ के


राम भी थे अकेले नहीं

थे सीता-लखन साथ में

गाँधी भी जब निकल पड़ें 

हज़ारों चलें साथ में 


आदमी की औक़ात क्या

जो जीते-लड़े बाघ से

चड़ के भी पेड़ पर

बचता कितनी बार ये


साथ हैं

तो आप हैं

मानवता का

विकास है


राहुल उपाध्याय । 11 मई 2021 । सिएटल 







ये फ़ोन नहीं रक़ीब है

ये फ़ोन नहीं रक़ीब है

जो आपके क़रीब है

हुई क्या ख़ता भला

जो हम जुदा

ये क़रीब है?


आपकी उँगलियों पे क्या 

नाचते हम न थे?

आपके रूखसार को क्या

चाहते हम न थे?


जो हम जुदा

ये क़रीब है?


कह के तो देखते

सोते-जागते हम भी साथ

आपकी ख़िदमत में क्या

भागते हम न थे?


क्यों हम जुदा

ये क़रीब है?


यूँ बार-बार उसे देखना

सहन हमें होता नहीं 

आपकी आँखों में क्या

झाँकते हम न थे?


क्यों हम जुदा

ये क़रीब है?


हाँ हम मुफ्त के थे

और ये क़ीमती

ख़ता हुई क़ीमत अपनी

माँगते हम न थे


क्या इसीलिए 

हम जुदा

ये क़रीब है


उतारती न नज़र से हमें 

तो जानते हम किस तरह

कि ये चाहतें, ये वलवले 

सब के सब मुहीब हैं

ज़िन्दगी के सलीब हैं


राहुल उपाध्याय । 11 मई 2021 । सिएटल 

वलवले = मन की उमंगें 

मुहीब = क्रूर, अत्याचारी, ज़ालिम बेरहम, भीषण, भयानक, कराल, विकट, डरावना, जिसे देखकर डर लगे

सलीब = सूली, पीड़ा, यातना, ज़ुल्म





Monday, May 10, 2021

मास्क ज़िन्दगी है


https://youtu.be/cm7Jse97D98 


प्लीज़ मास्क अप 

काटे नहीं कटते ये दिन ये रात

कहनी थी तुमसे जो दिल की बात

लो आज मैं कहता हूँ

प्लीज़ मास्क अप 

—-

चलो रे मास्क लगाओ जनाब 

रोग उन्मूलन की रूत आई

—

ज़िन्दगी मास्क की देन है

इसे हरदम लगाना पड़ेगा 

—

मास्क बिना चैन कहाँ रे

मास्क बिना चैन कहाँ रे

सोना नहीं चाँदी नहीं 

मास्क तो लगा

अरे बात मान ले

—

मास्क ज़िन्दगी है, 

मास्क औषधि है, औषधि है 

मास्क स्वीकार करो 

ये उम्र मास्क की है 

मास्क बिना क्या जीना

ये ही तो ज़िन्दगी है


राहुल उपाध्याय । 9 मई 2021 । सिएटल 










Tuesday, February 16, 2021

कहीं पॉर्री हो रही है

कहीं पॉर्री हो रही है

कहीं टॉमी की बातें 


किसान?

किसान किस खेत की मूली है?

और सुशांत?

ओ हेलो

हमें यह नहीं पता कि 

पुलवामा कब और कहाँ हुआ था

और तुम सुशांत की बात करते हो


हम तो मीम की गंगा में हाथ धोते हैं

हादसे सुर्ख़ियों में रहते हैं

हम स्क्रोल कर के 

मोती भाँप लेते हैं

कभी रोहित के शतक की वाह-वाह करते हैं

तो कभी भारती को ताने मारते हैं


सब का अपना-अपना शग़ल है

और यही जीवन है


राहुल उपाध्याय । 16 फ़रवरी 2021 । सिएटल 

Tuesday, February 9, 2021

मैं ग़ालिब हूँ, मैं मीर हूँ

मैं ग़ालिब हूँ, मैं मीर हूँ 

किसी के कमान का न तीर हूँ 


है सबका अपना वेद कोई

मैं खुद ही दवा खुद पीर हूँ


हैं दामन पे जो दाग मेरे

मैं उनसे हुआ अमीर हूँ 


ज़हर पीऊँ मुझे रास नहीं

मैं पीता ना कोई खीर हूँ


तुम मिले मुझे सब मिला

मैं मालामाल फ़क़ीर हूँ


राहुल उपाध्याय । 9 फ़रवरी 2021 । सिएटल 


Saturday, February 6, 2021

ज़िन्दगी है एक सुडोकू

ज़िन्दगी है एक सुडोकू

आसान है तो

नीरस है

बोरिंग है

मुश्किल है तो

हाथ खड़े कर देता हूँ 

आगे कुछ सूझता ही नहीं 

क्या करूँ 

क्या न करूँ 


हल है

लेकिन

हल जानने में

कोई रूचि भी नहीं 


देर-सबेर 

सबका 

वही अंत होता है

81 खाने हैं

नौ आड़ी

नौ खड़ी 

क़तारें हैं

सब में वही एक से नौ तक के अंक हैं


हल में वो मज़ा कहाँ 

जो करने में हैं


बस 

इतना आसान न हो कि

मन ऊब जाए

और इतना कठिन भी नहीं कि

करने का मन ही न करे


हाँ 

कोई साथी

मिल जाए

तो करने में

मज़ा और बढ़ जाता है


राहुल उपाध्याय । 6 फ़रवरी 2021 । सिएटल 







Monday, February 1, 2021

मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी में रोज़ 

कुछ न कुछ अच्छा होता है 

कभी बहुत अच्छा 

तो कई बार इतना अच्छा 

कि बताए ना बने 


कहूँ तो कोई माने ना 

माने तो समझे ना 

समझे तो जले बिना रह सके ना 


कभी कभी लगता है

यह सब एक दिवास्वप्न है 

मेरी ही रची एक दुनिया है 

जिसमें ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हैं 


कि फूल खिलते हैं

तो मेरे लिए 

चाँद-तारे निकलते हैं 

तो मेरे लिए 


अपनी बाँहों को 

इतना भरा कभी न देखा 

संगीत

इतना सुरीला कभी न सुना 

पोर-पोर से

इतना प्रेम कभी न फूटा


राहुल उपाध्याय । 1 फ़रवरी 2021 । सिएटल 


Friday, January 29, 2021

संगीत वही है, झुनझुने जुदा हैं

संगीत वही है

झुनझुने जुदा हैं

हममें-तुममें

वही तो छुपा है


घटा बरसा के

हमें वो खिलाए

बरसों से बरसा प्रेम 

कभी न घटा है


क़िस्मत की बात है

कि हाथों का हाथ है

इस बहस से कुछ हासिल 

न होगा न हुआ है


समंदर की प्यासी

सारी हैं नदियाँ 

उछलता-कूदता देखो

कारवाँ उधर ही चला है


प्यासी ये नदियाँ 

प्यास क्या बुझाएँ 

पानी को पानी को

पाने का नशा है


राहुल उपाध्याय । 29 जनवरी 2021 । सिएटल 


Tuesday, January 26, 2021

सीनाज़ोरी

सत्तर वर्ष में 

सत्यमेव जयते 

जय श्री राम में बदल गया


और दावा यह

कि सबका साथ

सबका विकास 


हद होती है

सीनाज़ोरी की!


राहुल उपाध्याय । 26 जनवरी 2021 । सिएटल 

Monday, January 18, 2021

हम सब ग़रीब हैं

बेटे ने अपने पिता से माँगा खिलौना 

पिता ने मना कर दिया 

दादा ने अपने बेटे से माँगा हाथ ख़र्च 

बेटे ने मना कर दिया 


हम सब ग़रीब हैं


कभी दादा थे पिता 

और पिता था एक बेटा

पिता भी कभी दादा होगा

बेटा भी कभी पिता होगा 


बदलेगा बहुत कुछ 

मगर नहीं बदलेगी ग़रीबी


पिता ने झूठ बोला 

स्कूल में दाख़िले के लिए 

बेटे ने झूठ बोला 

वीसा लेने के लिए 

माँ ने झूठ बोला 

कस्टम्स से अचार निकालने के लिए 


हम सब फ़रेबी हैं 


बदलेगा बहुत कुछ 

मगर नहीं बदलेंगे फ़रेबी


माँ ने हार चढ़ाया देवी को 

नानी ने दावत दी पंडितों को 

पिता ने पूंजी लगायी बेटे की पढ़ाई में बेटे ने लगाई सेविंग्स स्टॉक मार्केट में 


हम सब जुआरी हैं 


बदलेगा बहुत कुछ 

मगर नहीं बदलेंगे जुआरी 


पिता ने फैलाई झोली इंग्लैंड में 

चाचा ने फैलाई झोली मिडिल ईस्ट में बेटे ने फैलाई झोली यू-एस में 


हम सब भिखारी हैं


बदलेगा बहुत कुछ 

मगर नहीं बदलेंगे भिखारी 


दक्षिणी उजड़ा तूफ़ान में 

बिहार डूबा बाढ़ में 

गुजरात दबा भूकंप में 


हम सब बदनसीब हैं


बदलेगा बहुत कुछ 

मगर नहीं बदलेगी बदनसीबी


राहुल उपाध्याय । 2001 । सेन फ़्रांसिस्को 



Thursday, January 14, 2021

हुआ वस्ल और हम न फ़ना हुए

हुआ वस्ल और हम न फ़ना हुए

ज़िंदगी में कैसे-कैसे इम्तहां हुए


या कहूँ पुनर्जन्म इसे 

जो हम जुदा हुए 

 

होते एक तो निपट लेते हज़ारों से 

हैं दो तो ग़म भी दुगने अता हुए


ज़माने के खूँ से वाक़िफ़ हूँ मैं

अपने ही नहीं जो बेवफ़ा हुए


ग़म और मसर्रत पहलू जीवन के

अल्फ़ाज़ 'राहुल' ऐसे दफ़ा हुए 


राहुल उपाध्याय । 14 जनवरी 2021 । सिएटल 


वस्ल = मिलन

फ़ना = ख़त्म, विलीन

ख़ूँ = ख़ून 

मसर्रत = ख़ुशी 

अल्फ़ाज़ = लफ़्ज़ (शब्द) का बहुवचन 



Monday, January 11, 2021

हम लड़ते हुए दिख जाए

हम लड़ते हुए दिख जाए

तो कोई बड़ी बात नहीं 


हम हाथों में हाथ लिए

टहलते नज़र आ गए

तो ख़ैर नहीं 


बेइज़्ज़त होने का डर रहता है


असंख्य सवाल खड़े हो उठते हैं 


चूँकि 

दिक्कत यह है कि

लड़ाई एक से नहीं 

हज़ार से करो

और हज़ार बार करो

कोई आपत्ति नहीं 


प्यार?


राहुल उपाध्याय । 11 जनवरी 2021 । सिएटल 



Saturday, January 2, 2021

नाम

कमीना 

खलनायक 

गधा 

घोंचू 

चालबाज़ 

छलिया 

जंगली 

झंझटी 

टपोरी 

ठरकी 

डरावना 

ढींठ 

तिरस्कृत

थप्पड़ के काबिल 

दुश्मन 

धोखेबाज़ 

नाक में दम 

पापी 

फूहड़ 

बुरा 

भयंकर 

महारोग 

यमदूत 

रावण 

लुटेरा 

वहशत 

शुद्ध अत्याचार 

षड्यंत्री 

सितमगर

हत्यारा

क्षमा के योग्य नहीं 

त्रासदी 

ज्ञानहीन 


आप चाहे दे दें इसे कोई नाम 

पर न लगाए इस पर इल्ज़ाम 


हम ही सृजक 

हम ही संरक्षक 

हम ही संहारक 


अहं ब्रह्मास्मि 

अहं विष्णु अपि 

अहं शिवं च 


राहुल उपाध्याय । 2 जनवरी 2021 । सिएटल