Wednesday, May 14, 2008

दु:ख का सुख

धमाके की खबर जैसे ही दिखी थी
तुरत-फ़ुरत एक कविता लिखी थी
लेकिन फिर भी देर हो चुकी थी
मुझसे पहले कुछ कवि लिख चुके थे
वाह-वाह सबकी लूट चुके थे
बहती गंगा में हाथ धो चुके थे
दु:ख को सुख में बदल चुके थे

दुनिया सारी उम्मीद पर टिकी है
कहीं न कहीं तो फिर विपदा गिरेगी
एक न एक दिन इसे भुनवा के रहूंगा
रेडियो, टी-वी सब ऑन रखूंगा
खबर मिलते ही टूट पड़ूंगा

विस्फोट होगा, धमाका होगा
मेरे लिए एक तमाशा होगा
मेरे अमर हो जाने का
सबसे अच्छा बहाना होगा

सबसे पहले मैं ही भेजूँगा
सब की बधाई पा के रहूंगा
देखो न कितने रंग भरे हैं
खून, चीथड़े, भेड़िये जैसे शब्द रचे हैं
कुछ से दहाड़ रहा है वीर-रस
तो कुछ से टपक रही है करुणा
अपनी संवेदनशीलता का
अपने काव्य शिल्प का
सबसे लोहा मनवा के रहूंगा
दु:ख को सुख में बदल कर रहूंगा

राष्ट्र-गान लिखा जा चुका है
वीर-रस का मौसम नहीं है
कोई युद्ध भी तो होता नहीं है
यही तो मौका बस एक बचा है
जो सारे राष्ट्र को अपील करेगा
बच्चा-बच्चा इसे 'फ़ील' करेगा
लिख कर इसे मैं अमर बनूंगा
दु:ख को सुख में बदल कर रहूंगा

सिएटल,
14 मई 2008
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तुरत-फ़ुरत = quickly
विपदा = calamity
भुनवा = to cash it in (as in a cheque/check)
आँन = on
अपील = appeal
फ़ील = feel

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1 comments:

aniruddha said...

upadhyay ji
kamaal kamaal kamaal , kya bay hai kya khub likha hai. aapki is kavita ki tarif ke liye mere paas shabd nahi hai . thanks alot