Friday, May 2, 2008

अनवरत चक्र

मैं हर पल चलायमान हूँ

निर्धारित गति से
निर्धारित दिशा में
हर पल
चलता ही रहता हूँ

मेरे चलने से
दुनिया के कई फ़ायदे हैं
मुझसे ही बंधे
इसके नियम कायदे हैं

मेरे चलने से
मेरा खुद का कोई फ़ायदा नहीं है
घूम-फिर कर
मैं वहीं लौट जाता हूँ
जहाँ से मैं पहले कभी चला था

घड़ी की एक सुई की तरह

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि
सेकंड को लगता है एक मिनट
और मुझे लगता है एक जीवन

सेकंड की सुई की तरह
मेरे ईर्द-गिर्द नम्बर
घटते-बढ़ते रहते हैं
लेकिन मेरा अस्तित्व
जैसे का तैसा रहता है
उपर-नीचे इधर-उधर
घूमने का क्रम बना रहता है

कहते हैं कि
कर्म के बदलने से
क्रम बदल सकते हैं
इस अनवरत चक्र से
बच के निकल सकते हैं

देख रहा हूँ पृथ्वी को
एक अरसा हो गया है
और उसके कर्म नहीं बदले हैं
365 दिन बाद
पहुँचती है ठीक वहीं
जहाँ से वो चली थी

अगर
गति इसने बदली
कर्म इसने बदले
क्रम इसका बदला
तो
अनर्थ हो जाएगा
तहस-नहस हो जाएगा
सब कुछ नष्ट हो जाएगा

लेकिन ध्यान से सोचो तो
उसी में मेरी मुक्ति है

पृथ्वी की सुनिश्चित गति
हमारी कामनाओं का फल है
हम माया के वशीभूत
इसकी सुरक्षा की कामना करते है
जब तक घर है
हम घर से बंधे रहते हैं
घर छूटते ही
मुक्त हम हो जाएगे

सिएटल,
2 मई 2008

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3 comments:

आलोक said...

बड़ते - बढ़ते

Pankaj Bhatia said...

Rahul ji.. this poem is too good. gives me shivers in spine.
"Karm se kram badalte hai" bahut khoob. Pata nahi is dharti ke logo ke kram kab badlenge.
Bahut dino baad apke blog visit kiya.. I was in India for a few weeks.

Popular India said...

aapki kavita achchhi lagi
Dhanyawad