Monday, September 28, 2009

माताएँ खलनायकों की

रात को सोते समय
बेटे को सुनाता हूँ कहानी
राम के
कृष्ण के
उद्भव की कहानी

बहुत दिनों तक
सुनने के बाद
बेटा एक दिन बोला

कृष्ण की माँ थी देवकी
और यशोदा जी ने उन्हें पाला
राम की माँ थी कौशल्या
और कैकयी ने उन्हें निकाला

लेकिन
रावण की
कंस की
माँ के बारे में
क्यूँ नहीं कुछ बताया?

क्या कहूँ?
कैसे कहूँ?
कैसे उसे समझाऊँ
कि इस कोशिश में
कि कहानी सशक्त बन सके
कई खटकर्म किए हैं जाते
घटनाएँ जोड़ी जाती हैं
पात्र छाँटे जाते
खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते
तरह तरह के जामे
पहनाए उन्हें हैं जाते
नख-शिखा-दाढ़ी-मूँछ
सर-सींग लगाए हैं जाते

खलनायक पैदा नहीं होते
खलनायक बनाए हैं जाते

सिएटल 425-898-9325
विजय दशमी, 2009

Thursday, September 17, 2009

अर्जुन आँखें

हाईवे बने
और गाँव के गाँव
उजड़ गए
लोग
फ़र्राटे से
हवा से बातें करते-करते
उपर-उपर से निकल गए

जब से जी-पी-एस आया
समंदर, झील, तालाब, झरने
सब के सब ओझल होते जा रहे हैं

इस्कान का मंदिर
बच्चों का स्कूल
रंग बदलते पत्ते
सामने होते हुए भी
दिखाई नहीं देते

हमारी
अर्जुन आँखें
गड़ी रहती हैं
एल-सी-डी स्क्रीन के
एक
नीले
नुकीले
तीर पर

सिएटल 425-898-9325
17 सितम्बर 2009

Tuesday, September 15, 2009

गुल खिलाना है बाकी

अभी लाश नहीं हूँ
अभिलाषा है बाकी
चाहा है तुमको
तुम्हें पाना है बाकी

दिल में मेरे तुम
कब से बसे हो
आँखों से आँखें
मिलाना है बाकी

आते ही रहते हो
ख़्वाबों में हर दिन
रातों में उनका
आना है बाकी

सबसे हसीं तुम
जग में सनम हो
हाथों से तुमको
सजाना है बाकी

बागी नहीं
बागबां है राहुल
बागों में फिर से
गुल खिलाना है बाकी

सिएटल 425-898-9325
15 सितम्बर 2009
(अमरीका आने की 23 वीं वर्षगाँठ)

Monday, September 14, 2009

पहेलियाँ

पिछले वर्ष की तरह इस बार भी हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर प्रस्तुत हैं कुछ पहेलियाँ। पहेलियों के उत्तर से 'शुद्ध हिंदी' वालों को आपत्ति हो सकती है। क्योंकि कुछ शब्द या तो उर्दू के हैं या अंग्रेज़ी के - शुद्ध हिंदी के नहीं। या ये कहूँ कि उनकी जड़ संस्कृत में नहीं है। मैं ये समझता हूँ कि ऐसे शब्दों से हिंदी समृद्ध होती है, नष्ट नहीं। चाहे कितनी ही नदियाँ सागर में मिल जाए, सागर नष्ट नहीं होता, भ्रष्ट नहीं होता, प्रदूषित नहीं होता।

कैसे हल करें? उदाहरण स्वरूप
पहेली #19 से पहेली #26 और उनके हल देखें। कुछ उदाहरण नीचे भी देख लें।

(1)
जब भी कहीं लगा X XX(1, 2)
साधु-संतों को किया XXX (3)

(2)
यह बात सच सौ XXX है (3)
कि आरक्षण वालों ने कम XX X है (2,1)

(3)
जिन्हें सताते XXXX हैं (4)
क्या वे भक्त XX X X हैं? (2, 1, 1)

(4)
इठलाती हसीनाओं को कभी अपना X XX (1, 2)
क्या पता कब डस लें बन के XXX (3)

बोनस:
तुम्हारी बाहों ने दी थी मुझे XX XXX (2,3)
वो सच था या थी कोरी XXXX ? (3.5)

उदाहरण:
क -
जब तक देखा नहीं ??? (3)
अपनी खामियाँ नज़र ?? ?(2, 1)

उत्तर:
जब तक देखा नहीं आईना
अपनी खामियाँ नज़र आई ना

ख -
मफ़लर और टोपी में छुपा ?? ?? (2, 2)
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई ??? (3)

उत्तर:
मफ़लर और टोपी में छुपा सर दिया
जैसे ही गिरी बर्फ़ और आई सर्दियाँ

अधिक मदद के लिए अन्य पहेलियाँ यहाँ देखें:
http://mere--words.blogspot.com/search/label/riddles_solved

शुद्ध हिंदी के विषय पर आप मेरा एक लेख और एक कविता यहाँ देख सकते हैं:

शुद्ध हिंदी - एक आईने में - http://mere--words.blogspot.com/2007/12/blog-post_03.html
बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे - http://mere--words.blogspot.com/2008/06/blog-post_18.html

सद्भाव सहित,
राहुल

पहेली 31 का उत्तर

खाऊँ जो एक तो हो जाऊँ मैं चित्त
खा लूँ जो तीन तो हो जाऊँ मैं ठीक
खा के जिसे जवां होते शहीद
खाते उसे बच्चे खुशी से खरीद

कैसा ये जादू है? कैसी है ये माया?
समझा वही जो रंगोली देख पाया

=========================
इस पहेली का उत्तर इसकी अंतिम पंक्ति में छुपा हुआ है।

उत्तर: गोली

Sunday, September 13, 2009

तुम्हारे बिना

बागी ---
बागबां ---
बागों ---
गुल ---

ऐसा नहीं
कि गला रूंध गया
या कलम टूट गई
या शब्द नहीं मिलें

बल्कि
मैं यह दिखलाना चाहता हूँ कि
कितने बेमानी हैं शब्द
शब्दों के बिना

जैसे
मैं
तुम्हारे बिना

सिएटल 425-898-9325
13 सितम्बर 2009

Saturday, September 12, 2009

मेरे दिल पर जो लिखा है

ये मेरे दिल पर
जो तुमने
टाईप राईटर से लिखा है
उसे अगर बदलोगी
तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी

लिखोगी कुछ
पढ़ा कुछ जाएगा
नया-पुराना सब
गड्डमड्ड हो जाएगा

अगर बदलना चाहो
तो सिर्फ़ दो ही सूरते हैं
या तो मुझे भस्म कर दो
या फिर कोई ऐसी करेक्शन फ़्लूईड ले आओ
जो फिर से मुझे कोरा कर दे

सिएटल 425-898-9325
12 सितम्बर 2009

Friday, September 11, 2009

तुम्हारी सेहत

आओगे तुम तो, तुमसे करवाएंगे काम
बागों में बगीचों में तुमसे डलवाएंगे खाद
होटलों के गंदे कमरे तुमसे करवाएंगे साफ़
डाक्टरों की वर्दियाँ भी तुमसे करवाएंगे तैयार
लेकिन तुम्हारी सेहत का न कभी कोई होगा जिम्मेदार

वैध-अवैध के चक्कर में कुछ ऐसे फ़सें वैद्य-साहूकार
कि देशवासियों को छोड़ के करते दुनिया का उपचार
आज नाईजिरिया तो कल ईथियोपिया का करते जीर्णोंद्धार
और दूर-दराज के गाँव में जा के देते टीकों का उपहार
लेकिन तुम्हारी सेहत के न वे कभी बनते जिम्मेदार

वैध-अवैध का भेद न देखें, जब जम कर कर लेती सरकार
काम कराए और खूब कराए, कम वेतन पे साहूकार
जो भी चाहो हम से ले लो, पल पल ललचाते बाज़ार
पैसा-कौड़ी पास नहीं तो ले लो किश्तों पे उधार
लेकिन तुम्हारी सेहत का न कभी कोई होगा जिम्मेदार

बेटा वैध, बाप अवैध, जहाँ कहता हो संविधान
कागज़ के पुर्जो पे निर्भर जहाँ हो इंसानों की जान
दूसरों की ज़मी छीन के जहाँ पर बनते हो मकान
उस जहाँ के बाशिंदे क्या समझेंगे क्या होता है ईमान?
इसीलिए तुम्हारी सेहत का न कभी कोई होता जिम्मेदार

सिएटल 425-898-9325
11 सितम्बर 2009

Wednesday, September 9, 2009

नौ, नौ, नौ?

नौ, नौ, नौ?
नो, नो, नो!
बस
तीन साल,
तीन महीने,
और तीन दिन और
फिर
विश्व में होगा
एक भयंकर विस्फ़ोट

आएगी प्रलय
और
होगा सबका अंत
कहते हैं
टी-वी पे बैठे विद्वत् जन

अरे! गिनती गिनना अगरचे आवश्यक अवश्य
गूढ़ अर्थ तलाशना उनमें है एक व्यर्थ प्रपंच
कैलेंडरों में तिथियाँ आती-जाती रहीं सर्वदा
लेकिन कैलेंडर देख के कभी कुछ न घटा
न बिजली गिरी, न बरसी घटा
न आए भूकम्प, न उबली धरा
आज तक आए जब-जब संकट यहाँ
इंसा का हाथ मिला सदा हाथ पे धरा

सिएटल 425-898-9325
9 सितम्बर 2009

Tuesday, September 8, 2009

हर शाम

कुछ आते हैं उग
कुछ उगाता हूँ मैं
हर शाम
दर्द की फसल उगाता हूँ मैं

टेबल लैम्प की
पीली
मटमैली
रोशनी में
आँखें मूंदे
दर्द की उंगली थामे
मैं
पहुँच जाता हूँ
तुम तक
तुम तक
तुम तक
और
उस तक

न कोई है द्वंद
न कोई है तर्क
तुममें और उसमें
न कोई है फ़र्क

जाता हूँ सोने
भीग जाता है तकिया

उगता है सूरज
सब जाता है सूख

होते-होते शाम
कुछ आते हैं उग
कुछ उगाता हूँ मैं
हर शाम …

सिएटल 425-898-9325
8 सितम्बर 2009

Wednesday, September 2, 2009

तेरह महीने पहले

तेरह महीने पहले
जो कुछ घटा था
उससे
जीवन घटा नहीं
जीवन बढ़ा था

घटाएँ
घटाना नहीं
सीखाती हैं जोड़ना

सोचो भला
कैसे भरते जलाशय?
गरज-गरज कर
जो न बरसती घटाएँ?
बिना गरज के
कौन करता है ऐसे?
नि:स्वार्थ भाव से
दु:ख हरता है ऐसे?

तेरह महीने पहले
जो कुछ घटा था
उससे
जीवन घटा नहीं
जीवन बढ़ा था

सिएटल 425-898-9325
2 सितम्बर 2009

Tuesday, September 1, 2009

मैं भूल जाता हूँ अक्सर

तुम्हें भूलना
मैं भूल जाता हूँ अक्सर
और
कर लेता हूँ याद
जब-जब
ढलता है सूरज
जलता है दीपक
उड़ती हैं ज़ुल्फ़ें
खनकती है पायल
हँसते हैं बच्चे
घिरते हैं बादल

सोचता हूँ
एक प्रोग्राम बना लूँ
कैलेंडर में
एक रिमाईंडर लगा दूँ
जो हर दूसरे दिन
तुम्हें भुलाना है
मुझे याद दिला दे

सिएटल 425-898-9325
1 सितम्बर 2009