Wednesday, November 7, 2007

मूर्ति पूजा


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

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बिक गया है जो
लुट गया है वो
तराना पुराना
हो गया है वो

पूजा जिनकी हो रही है आज
मंडप में जो कर रहे हैं राज
लाला की दुकान पर
बिक रहे थे वो
सुनार-कुम्हार के हाथों
पिट रहे थे वो

कौड़ियों के भाव
बिक जाते हैं जो
समृद्ध हमें करेंगे वो?
बिकना जिनके
मुकद्दर में हो
मोक्ष हमें दिलाएंगे वो?
पंडित के सुलाने से
सो जाते हैं जो
किस्मत हमारी जगाएंगे वो?
पलक झपकते ही
विसर्जित हो जाते हैं जो
भव सागर पार कराएंगे वो?

लालची का लोभ है
या प्रेमी का प्यार है
दुखियारे का दर्द है
या सतसंग का संस्कार है
शिल्पी का हुनर है
या भक्ति का चमत्कार है
दुनिया जिसे कहती हैं पत्थर
करती उसी का सत्कार है

आज एक और त्यौहार है
लगा रिवाज़ों का बाज़ार है
हम भी उसमें जुट गए
जहाँ सबसे लम्बी कतार है

भरा हुआ भंडार है
सम्पदा जहाँ अपार है
गरीब से गरीब भी
वहाँ दे रहा उपहार है

बिक गया है जो
लुट गया है वो
तराना पुराना
हो गया है वो

7 नवंबर 2007

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6 comments:

मीत said...

क्या बात है राहुल जी. बात बहुत पसंद आई. शुक्रिया.

और दीवाली की शुभकामनाएँ.

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.

दीपावली की शुभकामनायें.

Anonymous said...

It is easy to decry that which you do not understand, it is easy to denegrate the mother who you have barely understood or know. Woe to taht Mother and bigger woe to that child.
Ravindra

Dinesh Arya said...

Murti Puja....
Ek baar fir padhi,
anek ko forward kari,
Bahut pasand aayee.
Sukhe na aap ki kalam ki shyahee.

divya said...

man mandir ke ishwar ko nahi jaroorat kisi kee mera tumahara iska uska sabka sathi hai vo ......dhanyabad.

divya said...

man mandir ke ishwar ko nahi jaroorat kisi kee mera tumahara iska uska sabka sathi hai vo ......dhanyabad.