Monday, November 26, 2007

जन्म


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जन्म के पीछे कामुक कृत्य है
यह एक सर्वविदित सत्य है

कभी झुठलाया गया
तो कभी नकारा गया
हज़ार बार हमसे ये सच छुपाया गया

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

सोच के मंद मुस्करा देते थे वो
रंगीन गुब्बारे से बहला देते थे वो

बड़े हुए तो सत्य से पर्दे उठ गए
और बच्चों की तरह हम रुठ गए
जैसे एक सुहाना सपना टूट गया
और दुनिया से विश्वास उठ गया

ये मिट्टी है, मेरा घर नहीं
ये पत्थर है, कोई ईश्वर नहीं
ये देश है, मातृ-भूमि नहीं
ये ब्रह्मांड है, ब्रह्मा कहीं पर नहीं

एक बात समझ में आ गई
तो समझ बैठे खुद को ख़ुदा
घुस गए 'लैब' में
शांत करने अपनी क्षुदा

हर वस्तु की नाप तौल करे
न कर सके तो मखौल करे

वेदों को झुठलाते है हम
ईश्वर को नकारते है हम
तर्क से हर आस्था को मारते हैं हम

ईश्वर सामने आता नहीं
हमें कुछ समझाता नहीं

कभी शिष्टता के नाते
तो कभी उम्र के लिहाज से
'अभी तो खेलने खाने की उम्र है
क्या करेंगे इसे जान के?'

बादल गरज-बरस के छट जाते हैं
इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते है

सिएटल,
26 नवम्बर 2007
(मेरा जन्म दिन)

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3 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

वाह । भाव गहरे हैं, सोंचा ही नहीं था कि यह कविता का विषय हो सकता है, अनछुए सत्‍य पर लिखा है भाई, धन्‍यवाद ।

आरंभ
जूनियर कांउसिल

Raviratlami said...

यह कविता पढ़कर बचपन का वाकया याद आ गया. मोहल्ले में एक व्यक्ति दारू के नशे में अपने बच्चों को गरियाता था - स्साले मेरे पेशाब!

तब समझ नहीं आता था कि ये कैसी गाली देता है अपने ही बच्चों को!

बाल किशन said...

आपकी कविता जैसा Sanjeeva तिवारी ने कहा एक अनछुए सत्‍य को कहती है. बहुत ही सुंदर की लिखाई आपने.